सिद्धपीठ सियाराम किला, झुनकी घाट पर आयोजित पंचदिवसीय श्रीराम कथा का भावपूर्ण समापन हुआ। यह आध्यात्मिक आयोजन पीठाधीश्वर महंत करुणानिधान शरण के सान्निध्य एवं संयोजन में संपन्न हुआ, जिसमें दूर-दूर से आए श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर नजर आए। समस्त तीर्थ अयोध्या में आकर विराजमान होते हैं समापन सत्र में कथा व्यास डॉ. स्वामी प्रभंजनानंद शरण ने रामजन्मोत्सव के आध्यात्मिक महत्व का मार्मिक विवेचन किया। कहा कि इस पावन अवसर पर समस्त तीर्थ अयोध्या में आकर विराजमान होते हैं। ऐसे में जो श्रद्धालु सरयू स्नान कर श्रीराम कथा का श्रवण करते हैं, उन्हें समस्त तीर्थों का पुण्यफल सहज ही प्राप्त हो जाता है।
कथा व्यास प्रभंजनानंद शरण ने कहा कि “निरंतरता एव सफलता का मूलमंत्र है।” अभ्यास से जड़ बुद्धि वाला व्यक्ति भी प्रज्ञावान बन सकता है, बशर्ते साधना में निरंतरता बनी रहे। उन्होंने आत्मतुलना से बचने की सीख देते हुए कहा कि व्यक्ति को कभी भी अपने भाग्य की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ईश्वर भाग्य की रूपरेखा अवश्य बनाते हैं, किंतु उसमें कर्मरूपी रंग मनुष्य स्वयं भरता है। उन्होंने प्रसन्नता को जीवन का परम स्वर्ग बताते हुए कहा कि निराशा और उदासीनता ही वास्तविक नरक हैं। मनुष्य सुख की कामना तो करता है, किंतु उसके अनुरूप आचरण नहीं अपनाता। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिद्धि का आशय भौतिक वैभव नहीं, बल्कि परम तत्व की प्राप्ति है। आगे कहा कि सदाचरण एवं शक्ति का सदुपयोग ही व्यक्ति को पूजनीय बनाता है।कथा के दौरान भगवान श्रीराम जन्म प्रसंगों का अत्यंत भावपूर्ण एवं विद्वतापूर्ण वर्णन किया गया, जिसे श्रवण कर श्रोता भक्ति भाव में झूम उठे। समापन पर आरती एवं प्रसाद वितरण हुआ। इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत प्रहलाद शरण ने किया।विकास ने सहयोग किया।


