अहमदाबाद. भारत के तीन-चौथाई आबादी वाले 57% जिलों में ‘बेहद उच्च’ गर्मी का जोखिम सामने आया है। इनमें गुजरात के 26 जिले बेहद उच्च जोखिम, 6 जिले उच्च जोखिम और 1 जिला मध्यम जोखिम श्रेणी में है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के शोध में यह तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार भारतीय शहर और जिले जटिल और अनियमित जलवायु पैटर्न का सामना कर रहे हैं। ऐसे में गर्मी से निपटने के लिए त्वरित और प्रभावी योजनाओं के निर्माण व क्रियान्वयन की जरूरत है।
सीईईडब्ल्यू का अध्ययन 35 संकेतकों के आधार पर भारत के 734 जिलों के लिए गर्मी के जोखिम का पहला समग्र मूल्यांकन पेश करता है। यह बताता है कि 1982 से 2022 तक जलवायु परिवर्तन ने हीट हैजर्ड (गर्मी के खतरों) के रुझानों में किस तरह से बदलाव किया है। इस मूल्यांकन में देश के 417 जिले ‘उच्च’ और ‘अत्यधिक उच्च’ जोखिम श्रेणी में, जबकि 201 जिले ‘मध्यम’ जोखिम की श्रेणी में आए हैं।
तीन प्रमुख रुझान रेखांकित
सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन तीन प्रमुख रुझानों को रेखांकित करता है। इनमें बहुत गर्म रातों में चिंताजनक रूप से वृद्धि होना, पूरे उत्तर भारत में विशेष रूप से सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में सापेक्षिक आर्द्रता में बढ़ोतरी होना और दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद, भोपाल व भुवनेश्वर जैसे घनी बसावट वाले शहरी व आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जिलों में गर्मी के प्रभाव में बढ़ोतरी होना शामिल है।
हीट एक्शन प्लान नियमित रूप से अपडेट करें
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में विस्तृत डेटा का उपयोग करते हुए हीट एक्शन प्लान को नियमित रूप से अपडेट करने, इसमें रात्रिकालीन गर्मी व आर्द्रता की समस्या का सामना करने के उपायों को शामिल करने के सुझाव दिए गए है। इसके लिए राज्यों को ‘राज्य आपदा शमन कोष’ को इस्तेमाल करने की भी छूट है, क्योंकि 2024 से लू भी पात्र आपदा में शामिल है।
गुजरात के 10 शहरों का हीट एक्शन प्लान तैयार
सीईईडब्ल्यू के फेलो डॉ. विश्वास चितले ने बताया कि देश में सबसे पहले 2016-17 में अहमदाबाद का हीट एक्शन प्लान तैयार किया गया था। अब गुजरात के 10 शहरों का हीट एक्शन प्लान तैयार किया है। इनमें इडर, पालनपुर, वेरावल, भावनगर, सूरत, वलसाड, राधनपुर, नवसारी, जूनागढ़ और भुज शामिल हैं।
उन्होंने दीर्घकालिक समाधान के तौर पर पैरामेट्रिक हीट इंश्योरेंस, अर्ली वार्निंग सिस्टम, नेट-जीरो कूलिंग शेल्टर और कूल रूफ जैसे उपायों को जरूरी बताया। महाराष्ट्र, ओडिशा, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्य पहले ही जलवायु व स्वास्थ्य डेटा को स्थानीय योजनाओं में शामिल कर रहे हैं।
पानी के पुन: उपयोग पर जोर
कार्यशाला में सीईईडब्ल्यू के फेलो नितिन बस्सी ने बताया कि बढ़ती गर्मी के साथ भूजल दोहन बढ़ता है और जल संकट गहराता है। उन्होंने ताजे पानी पर निर्भरता कम करने के लिए उपचारित जल के गैर-पेय उपयोग को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। वर्तमान में देश में निकलने वाले प्रयुक्त जल का केवल 28 प्रतिशत (करीब 20.24 बिलियन लीटर प्रतिदिन) ही उपचारित होता है। इसके पुन: उपयोग को बढ़ाने से 2047 तक देश में एक लाख से अधिक रोजगार सृजित हो सकते हैं।


