जीवन में ब्रह्म और माया युगल तत्व हैं। ब्रह्म है और उसकी कामना है। कामना ही मन का बीज है। वही कर्म के द्वारा वृक्ष रूप में प्रतिफलित होता है। कामना की आकृति नहीं होती। स्त्री ही पुरुष की कामना का निमित्त बनती है। सौम्या होने से ऋत रूप ही है। पुरुष का वरण करके उसे आवरित करती है। पुरुष के आग्नेय भाव में आहुत होने चली जाती है। आहुत होकर अपना स्थूल अस्तित्व (अपरा प्रकृति) गौण मानकर, सूक्ष्म स्तर पर रूपान्तरित हो जाती है। विवाह में उसका सूक्ष्म स्तर जीवन्त हो जाता है। स्थूल गौण रहता है। स्थूल तो सौम्य होने से काम आ जाता है। अब उसका आग्नेय संकल्प कार्यरत दिखाई पड़ता है। शेष जीवन में वही कार्यरत रहता है।
होना तो पुरुष में भी यही चाहिए। उसके सूक्ष्म का सौम्य स्वरूप हिलोरे लेना चाहिए, किन्तु अधिकांशत: अभाव ही वहां व्याप्त होता है। वह सोम का स्वागत नहीं कर पाता। हां, स्वभाव यदि सात्विक है तो भी शुरुआत अच्छी हो सकती है। परिवार का अन्न भी मन के निर्माण में भूमिका निभाता है। सात्विक, धार्मिक कर्मों से अर्जित अन्न, प्रसाद रूप अन्न ही सात्विक, निर्मल मन का निर्माण करता है। वैसी ही कामना उठती है उस मन में। अन्न ही माया है। अन्न का स्वामी चन्द्रमा ही मन का स्वामी कहलाता है। मन ही व्यक्तित्व का दर्पण बनता है।
स्वयं का आकलन भी मन में उठने वाले विचारों से ही हो सकता है। मेरी कामना का स्वरूप ही मेरा व्यक्तित्व है। कामना पैदा होने का एक कारण जहां अन्न होता है, वहीं दूसरा कारण मेरे प्रारब्ध भी होते हैं। इसको ईश्वरीय कामना कहा जाता है। ईश्वरीय कामना को टाला नहीं जा सकता। हां, उसमें गतिरोध पैदा किया जा सकता है, किन्तु उसका प्रभाव भी विपरीत ही पड़ता है।
यहां भी सत्यवती ही श्रेष्ठ उदाहरण है। ईश्वरीय कामना ने उसको महर्षि पाराशर से जोड़ दिया था। उसने स्वीकार नहीं किया। पुन: पितृ गृह चली गई और राजमाता बनने के सपने देखने लग गई जैसा कि उसके पिता ने कहा था। राजमाता बन भी गई, किन्तु वही कुलनाश का हेतु बनी। अन्त में हारकर वन को चली गई, जहां ईश्वर उसे भेजना चाहता था।
पूरी उम्र व्यक्ति की कामना और विवेक के बीच एक द्वन्द्व चलता ही रहता है, जो उसे अशान्त किये रहता है। उसकी अपेक्षाएं और महत्वाकांक्षाएं भूमिका निभाती हैं। आसक्ति अन्य बड़ा कारण है विचलन का। मन के भीतर के द्वन्द्व भिन्न होते हैं। मन के बाहर के, विश्व पटल के (लोकैषणा के) द्वन्द्व भिन्न होते हैं। जब तक व्यक्ति जीवन को लक्षित नहीं कर लेता, द्वन्द्व से घिरा ही रहता है।
एक स्थिति व्यक्ति के अद्र्धांग के स्वरूप की भी होती है। पौरुष भाव की अधिकता से महत्वाकांक्षाएं और अपेक्षाएं दोनों ही बलवती होती हैं। इसी भाव की अति व्यक्ति को आक्रामक बनाती है। चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष। इसमें व्यक्ति की प्रकृति की भूमिका रहती है। तामसी प्रकृति आक्रामकता को बढ़ा देती है। स्त्री में पौरुष भाव अधिक हो जाने से उसकी संवेदना का ह्रास होता जाता है। उसकी कोमलता का स्थान दृढ़ता तथा बुद्धि की प्रखरता ले लेती है। तब उसका व्यवहार लचीला नहीं रहता। बच्चों पर भी नहीं।
ईश्वर भी परीक्षा लेता है। अलग-अलग समय, स्थान और स्वरूप में। माया का मौन शब्दहीन प्रहार, स्त्री-पुरुष दोनों पर एक जैसा होता है। प्रहार जीवात्मा पर होता है, शरीर पर नहीं। यदि पुरुष का स्त्रैण भाव निर्बल है तो जहां भी जाएगा, स्त्री उसको आकर्षित करेगी ही। यही उसका परीक्षण काल है। उसका पौरुष आक्रामक भी हो सकता है अथवा स्त्री को आकर्षित भी कर सकता है। दोनों ही स्थितियों में एक नए कर्म का बन्ध हो पड़ेगा। दोनों ही बिना आकर्षित हुए चले गए तो बन्ध नहीं होगा। कई बार ऐसा भी हो सकता है कि चले जाने के बाद भी स्मृति बनी रहती है, कामना शान्त नहीं होती। चूंकि यह वासना का क्षेत्र है अत: जैसे ही इस प्रकार का अवसर मिलता है तो स्मृति जाग जाती है। पुन: व्यक्ति निर्णय करके ही अपना स्वरूप प्रकट करेगा।
ऐसी ही स्थिति विभिन्न इन्द्रियों की कामनाओं के क्षेत्रों में बनेगी। प्रत्येक इन्द्रिय के अनेकानेक विषय होते हैं। किसी भी विषय की पुनरावृत्ति ही राग पैदा करती है। यह राग मन से चिपककर बार-बार विषय की कामना करता है। हर परिस्थिति में निर्णायक भूमिका पुरुष भाव की ही होती है, चाहे पुरुष शरीर में हो अथवा स्त्री शरीर में। ऋत होने से स्त्रैण भाव में मन रूप केन्द्र ही नहीं होता।
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।। (गीता 6/34)
मूल में माया ही गतिमान होती है। सुसूक्ष्म होने से स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ती। उसे पुरुष की कमजोरी दूर से ही पता चल जाती है। उसका इंगित सामने माया को स्पन्दित कर देता है। वह प्रतीक्षा करती है। जैसे मछुआरा जाल फेंककर प्रतीक्षा करता है। उसे हार का डर नहीं होता, किन्तु हार जाने पर पुन: आक्रमण नहीं करती। ऐसा होता कम ही है। उसका संकल्प दृढ़ होता है। उसे सृष्टि को अपने नियंत्रण में रखना है। पुरुष इस भ्रम में प्रसन्न रहता है कि वह भोक्ता है, जबकि सच्चाई इसके ठीक विपरीत होती है।
स्त्री की भाषा गूढ़ होती है। दोनों धरातल पर एक साथ बात करती है। शब्द ही पुरुष की पकड़ में आते हैं। ध्वनि के साथ संकेत ही स्त्री के अभिनय की प्रभावशीलता है। इसमें भी एक भावनात्मक गहनता होती है। इसी के सहारे गर्भस्थ सन्तान को संस्कारित भी करती है। स्त्री संकोचधर्मा होती है। अत: छिपाना-चोरी करना भी इसी में शामिल रहता है। पिता के समक्ष सन्तान की ढाल बन जाती है, उनकी रक्षा में। छलनी की तरह छान-छानकर जानकारी छोड़ती है ताकि विषय की गंभीरता को टाला जा सके। पिता के स्वरूप को छानती है। पिता की प्रतिष्ठा को बनाये रखना भी आवश्यक होता है।
नई पीढ़ी को सूक्ष्म का ज्ञान अत्यल्प होता है। नशे की बढ़ती मार ने सूक्ष्म (दिव्य) स्वरूप को विदा ही कर दिया। स्थूल देह का आदान-प्रदान रह गया। प्रेम-विवाह के संकल्प भी देह के आगे नहीं जाते। उधर पुरुष वर्ग में सौम्यता का अभाव उसके संबंध को क्षणिक बना रहा है। सौम्यता के अभाव में उसका प्रेमाचार क्षीण हो गया। यह एक बड़ा परिवर्तन आता जा रहा है। स्त्री का विवर्त का लक्ष्य शिथिल होता जा रहा है।
एक अन्य सिद्धान्त भी ध्यान देने योग्य है—चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:। (गीता 4/13) ये चारों वर्ण और तीनों गुण भी प्रकृति के साथ ही जुड़ते हैं। स्त्री ऋत रूप होने से उसके गुण-कर्म पुरुष वाले ही हो जायेंगे। विवाह पूर्व स्त्री एवं उसके परिवार को भावी सम्बन्ध की जानकारी ही नहीं होती। लड़के का भविष्य तो स्पष्ट रहता है। विवाह में स्त्री जिस वर्ण के पुरुष में आहुत होती है, वही उसका भी वर्ण हो जाता है। वैसे ही संस्कारों से जुड़ जाती है। आज तो स्वयं विवाह ही अप्रासंगिक होने लगे हैं। एक कहावत है कि ‘भार्या-दास-पुत्र जिसके पास रहते हैं, उसी के हो जाते हैं।‘ अत: मां सर्वप्रथम पुत्र को पिता की प्रतिकृति बनाने का प्रयास करती है। वैसे तो ‘पिता वै जायते पुत्र:’ की श्रुति है ही। फिर स्त्री मां को एक भय नियति का भी होता है। पति न रहे, छोड़ दे, तो उसका ध्यान कौन रखेगा। यहां एक बड़ा तथ्य दिखाई पड़ता है—सुख में स्त्री का झुकाव अपरा प्रकृति (स्थूल शरीर) की ओर अधिक रहता है, किन्तु दु:ख अथवा अभाव की स्थिति में परा प्रकृति या सूक्ष्म स्तर पर जीने लगती है। शरीर रहते हुए भी स्थूल पटल पर नहीं होती। इस स्थिति को तो पूर्ण पुरुष भाव में ही रहने वाला ‘पूर्ण पुरुष’ ही समझ सकेगा, माया को पहचान सकेगा।
माया को समझने की आवश्यकता है। जागरूकता की अवस्था में ही यह संभव है, जहां माया को जीत सकते हैं। चूंकि धर्म सदा व्यक्तिगत होता है, माया झूठ, मिथ्या, अधर्म आधारित होती है। दीपक भी होती है, प्रकाश और अंधकार भी होती है। चेतना एक स्तर पर माया को भी आवरित रखती है। एक चेतना अवधि ज्ञान का कारण है (जैन मत)। अनासक्त भाव ही माया मुक्ति है। शत्रु के प्रति भी समभाव हो जाता है।
माया की विशेषता है जीव भाव का आह्वान अपने सूक्ष्म स्तर से करती है। शरीर में अवतरित होकर पशु कर्म के लिए ब्रह्मांश के साथ पिता के अंशों को भी आवरित करके शरीर में लाने के लिए यत्न करती है। पुरुष से लेकर फल समाज को बांटती है। परोक्षप्रिया के अनुसार माया पशु भाव / विवर्त भाव में मौन रहती है।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com


