पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। 294 सीटों वाला यह राज्य भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के लिए बड़ी चुनौती है। यहां 50 से ज्यादा ऐसी सीटें हैं, जहां हिंदी भाषा बोलने वाले जीत-हार में बड़ी भूमिका निभाते हैं। यहां, बिहार, UP, झारखंड जैसे हिंदी भाषी राज्यों से आकर बसे लोगों की संख्या अधिक है। इन सीटों को जीतने के लिए भाजपा ने बिहार के करीब 150 नेताओं को तैनात किया है। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने भी इन इलाकों में बिहार के नेताओं को अपनी पार्टी से सांसद बनाकर बिहारी अस्मिता का कार्ड चला है। लड़ाई बंगाल में विधानसभा चुनाव की है, लेकिन मुकाबाल बिहार वर्सेज बिहार का है। भाजपा और टीएमसी बिहार के लोगों और हिंदी भाषियों को लुभाने की हर कोशिश कर रही है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में पढ़िए ममता बनर्जी की पार्टी TMC ने बिहार से आए लोगों को लुभाने के लिए क्या किया है? बिहार के किन नेताओं को आगे बढ़ाकर हिंदी भाषी समाज को अपने साथ लाने की कोशिश की है? भाजपा किस प्लान से चल रही है? पहले समझिए, हिंदी भाषियों का वोट पाने को भाजपा ने क्या किया? कोलकाता, आसनसोल और बर्धमान जैसे हिंदी भाषियों की अच्छी संख्या वाले क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के लिए भाजपा ने बिहार के विधायक, मंत्री समेत करीब 150 नेताओं को तैनात किया है। इन नेताओं के साथ चुनाव अभियान की कमान बिहार सरकार के मंत्री मंगल पांडेय संभाल रहे हैं। उनके साथ लगभग 12 विधायक, 12 से ज्यादा प्रदेश संगठन स्तर के नेता और युवा मोर्चा के 50 पदाधिकारी व मंडल अध्यक्ष हैं। इनका काम हिंदी भाषी लोगों को पार्टी से जोड़ना है। चुनाव प्रचार में दो प्रमुख चेहरे हैं, 1- नितिन नवीन, 2- मंगल पांडेय। नितिन नवीन: नितिन नवीन कायस्थ जाति से हैं। बंगाल में कायस्थ 3% से ज्यादा हैं। इस जाति के लोग हार-जीत में बड़ी भूमिका निभाते हैं। पश्चिम बंगाल में 37 साल कायस्थ मुख्यमंत्री (कांग्रेस के विधानचंद्र राय 14 साल और CPM के ज्योति बसु 23 साल) रहे हैं। मंगल पांडेय: भाजपा के बंगाल प्रभारी हैं। ब्राह्मण हैं। इसकी कोशिश बंगाल के सवर्ण वोट बैंक को भाजपा की ओर लाने के साथ ही हिंदी भाषी लोगों को भाजपा का वोटर बनाने की है। अब जानिए, भाजपा को जवाब देने के लिए ममता बनर्जी ने क्या किया?
विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा हिंदी भाषी लोगों को लुभाने की कोशिश की जानी थी। इसमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो बिहार से आए हैं। इसे देखते हुए ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव 2024 से पहले से ही तैयारी शुरू कर दी थी। उन्होंने बिहार के दो नेता शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद को आगे बढ़ाया। अपनी पार्टी के टिकट दिए। दोनों चुनाव लड़े और जीतकर सांसद बने। अब इन पर बिहारियों के वोट टीएमसी की तरफ लाने की जिम्मेदारी है। शत्रुघ्न सिन्हा: कायस्थ जाति से आने वाले शत्रुघ्न सिन्हा पश्चिम बर्धमान के आसनसोल से सांसद हैं। यह इलाका झारखंड की सीमा के पास है। यहां की 50 फीसदी आबादी हिंदी भाषी है। ये लोग मूल रूप से बिहार और झारखंड के हैं। आसनसोल लोकसभा में 7 विधान सभा सीटें पांडबेश्वर, रानीगंज, जमुरिया, आसनसोल दक्षिण, आसनसोल उत्तर, कुल्टी और बाराबनी हैं। आसनसोल, कोलकाता के बाद दूसरा सबसे बड़ा और घनी आबादी वाला इलाका है। यह अपने कोयला खदानों, रेलवे जंक्शन और लोहा- इस्पात केंद्रित उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। कीर्ति आजाद: ब्राह्मण जाति से आने वाले कीर्ति आजाद बर्धमान-दुर्गापुर से सांसद हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में 7 विधानसभा क्षेत्र (दुर्गापुर पश्चिम, दुर्गापुर पूर्वी, गलसी, बर्धमान उत्तर, बर्धमान दक्षिण, मंतेश्वर भातार और मानगोविंद) आते हैं। कीर्ति आजाद दरभंगा से बीजेपी के सांसद रह चुके हैं। वे कांग्रेस में भी रहे हैं। अब जानिए बंगाल में बिहारियों की ताकत–करीब 12 लाख बिहारी रहते हैं 2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल में 63 लाख से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। यहां करीब 12 लाख लोग बिहार से हैं। कोलकाता में बड़ी संख्या में हिंदी भाषी रहते हैं। इसके अलावा हावड़ा, हुगली और उत्तर 24 परगना में भी इनकी आबादी अच्छी-खासी है। बिहार के लोग यहां के जूट मिल और दूसरी कारखाने में काम करने आए और बस गए। उत्तर बंगाल में बिहार के किशनगंज, कटिहार और अररिया जिले के काफी लोग व्यापार करते हैं। उत्तर बंगाल, दक्षिण बंगाल और पश्चिम बंगाल में बंगाल को बांट कर देखें तो उत्तर बंगाल में सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग, कूच बिहार और मालदा हैं। दक्षिण में आसनसोल, दुर्गापुर, रानीपुर जैसे कोयलांचल का इलाका है, जो धनबाद के पास तक है। पश्चिम के इलाके में मेदनीपुर, खड़गपुर, कोलकाता और उत्तर 24 परगना के इलाके हैं। इन इलाकों में हिंदी भाषी जीत और हार में अहम भूमिका निभाते हैं। 20 सीटों पर किंगमेकर हैं हिंदी भाषी बंगाल में हिन्दुस्तानी (मतलब बाहरी) 35 से 40 सीटों पर जीत-हार तय करने की भूमिका में हैं। इनमें से 15-20 सीटों पर तो किंगमेकर हैं। हिंदी भाषियों के प्रभाव वाले इलाकों में औद्योगिक और बॉर्डर के पास के क्षेत्र हैं। इनमें आसनसोल व दुर्गापुर के रानीगंज, कुल्टी और बर्नपुर के इलाके हैं। कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में गार्डनरीच, ममोटियाब्रुज, बेहाला, मानिकतल्ला जैसे इलाके हैं। उत्तर 24 परगना में बरानगर, दमदम, बैरकपुर के इलाके हैं। हावड़ा- गुगली इंडस्ट्रियल इलाकों में हावड़ा के अलावा कई विधानसभा सीट पर हिन्दुस्तानियों का प्रभाव है। ममता बनर्जी ने बिहारियों को रिझा रहीं बंगाल में बंगाली बनाम बाहरी मुद्दा अहम है। इसके बावजूद ममता बनर्जी बिहारियों को रिझाने में लगी हैं। लंबे समय तक बंगाल में पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क कहते हैं, ‘ममता बनर्जी ने बिहारियों को प्रभावित करने के लिए संस्कृत विश्वविद्यालय बनवाया। छठ जैसे महापर्व को प्रमोट करने लगी हैं, लेकिन चुनाव में बंगाली बनाम बाहरी का कार्ड खेलती हैं। बहिरागत कहकर वह बंगाली अस्मिता जगाने की कोशिश करती रही हैं।’ बिहारियों को मौका दे रही भाजपा, मिल सकता है लाभ बंगाल चुनाव को बिहारी किस तरह से प्रभावित कर सकते हैं? इस सवाल पर ओम प्रकाश अश्क ने कहा, ‘ममता बनर्जी बिहारियों को प्रमोट करें तो बाजी मार सकती हैं, लेकिन उनको बंगाली और मुसलमानों को भी खुश रखना है। दूसरी तरफ इस बार बीजेपी बिहारियों को खासा मौका दे रही है। इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। बंगाल में बिहारियों से ली जाती है रंगदारी बंगाल में दो तरह का तबका है, एक बंगाली और दूसरा बिहारी। बिहारी में बिहार से आए लोगों के साथ ही झारखंड, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों से लोग भी शामिल हैं। यहां इन सभी को बिहारी या हिंदुस्तानी कहकर बुलाया जाता है। पत्रकार ओम प्रकाश अश्क कहते हैं, ‘हिंदी भाषी तबके का बड़ा वर्ग लोभ व भय से सत्ता से चिपका रहता है, लेकिन हिंदी भाषियों की बड़ी आबादी सत्ता विरोधी रही है।’ उन्होंने कहा, ‘हिंदी भाषियों या बिहारियों को अभी भी यहां घर बनाने, फ्लैट खरीदने, सीमेंट, बालू खरीदने तक में तोलाबाजी यानी रंगदारी देनी पड़ती है। लेफ्ट की सरकार थी तब दूध भी लेफ्ट के लोगों से लेने का दबाव हिंदी भाषियों पर रहता था। अभी टीएमसी के ग्रामीण सिपाहियों का काफी दबाव हिंदी भाषियों पर रहता है।’ बिहार के ये नेता भी बंगाल में लड़ रहे चुनाव शत्रुघ्न सिंहा, कीर्ति आजाद के अलावा बिहार के कई और नेता हैं जो बंगाल की राजनीति में धाक रखते हैं। जैसे- संतोष पाठक: बक्सर के संतोष पाठक पहले कांग्रेस में थे, अब बीजेपी ज्वाइन किया है। वह चुनाव लड़ सकते हैं। अर्जुन सिंह: उत्तर 24 परगना में एक्टिव अर्जुन सिंह आरा के रहने वाले हैं। बंगाल के बैरखपुर क्षेत्र में एक्टिव हैं। इनकी राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से हुई। बाद में टीएमसी में आए। 2014 से बीजेपी के साथ हैं। एक बार सांसद भी चुने गए। इस बार विधानसभा चुनाव बीजेपी से लड़ने की तैयारी में हैं। राजेश सिंह: बिहार के सारण के रहने वाले गोपाल सिंह उत्तर 24 परगना से कांग्रेस विधायक चुने जाते थे। उनके निधन के बाद उनके बेटे राजेश सिंह टीएमसी से जुड़कर राजनीति कर रहे हैं। कोलकाता से काउंसलर हैं। संतोष पाठक: कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए हैं। उन्हें पार्टी टिकट दे सकती है। रितेश तिवारी: भाजपा नेता है। टिकट की कोशिश में जुटे हैं।
अर्जुन सिंह: भाजपा नेता है। टिकट पाने की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। 294 सीटों वाला यह राज्य भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के लिए बड़ी चुनौती है। यहां 50 से ज्यादा ऐसी सीटें हैं, जहां हिंदी भाषा बोलने वाले जीत-हार में बड़ी भूमिका निभाते हैं। यहां, बिहार, UP, झारखंड जैसे हिंदी भाषी राज्यों से आकर बसे लोगों की संख्या अधिक है। इन सीटों को जीतने के लिए भाजपा ने बिहार के करीब 150 नेताओं को तैनात किया है। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने भी इन इलाकों में बिहार के नेताओं को अपनी पार्टी से सांसद बनाकर बिहारी अस्मिता का कार्ड चला है। लड़ाई बंगाल में विधानसभा चुनाव की है, लेकिन मुकाबाल बिहार वर्सेज बिहार का है। भाजपा और टीएमसी बिहार के लोगों और हिंदी भाषियों को लुभाने की हर कोशिश कर रही है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में पढ़िए ममता बनर्जी की पार्टी TMC ने बिहार से आए लोगों को लुभाने के लिए क्या किया है? बिहार के किन नेताओं को आगे बढ़ाकर हिंदी भाषी समाज को अपने साथ लाने की कोशिश की है? भाजपा किस प्लान से चल रही है? पहले समझिए, हिंदी भाषियों का वोट पाने को भाजपा ने क्या किया? कोलकाता, आसनसोल और बर्धमान जैसे हिंदी भाषियों की अच्छी संख्या वाले क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के लिए भाजपा ने बिहार के विधायक, मंत्री समेत करीब 150 नेताओं को तैनात किया है। इन नेताओं के साथ चुनाव अभियान की कमान बिहार सरकार के मंत्री मंगल पांडेय संभाल रहे हैं। उनके साथ लगभग 12 विधायक, 12 से ज्यादा प्रदेश संगठन स्तर के नेता और युवा मोर्चा के 50 पदाधिकारी व मंडल अध्यक्ष हैं। इनका काम हिंदी भाषी लोगों को पार्टी से जोड़ना है। चुनाव प्रचार में दो प्रमुख चेहरे हैं, 1- नितिन नवीन, 2- मंगल पांडेय। नितिन नवीन: नितिन नवीन कायस्थ जाति से हैं। बंगाल में कायस्थ 3% से ज्यादा हैं। इस जाति के लोग हार-जीत में बड़ी भूमिका निभाते हैं। पश्चिम बंगाल में 37 साल कायस्थ मुख्यमंत्री (कांग्रेस के विधानचंद्र राय 14 साल और CPM के ज्योति बसु 23 साल) रहे हैं। मंगल पांडेय: भाजपा के बंगाल प्रभारी हैं। ब्राह्मण हैं। इसकी कोशिश बंगाल के सवर्ण वोट बैंक को भाजपा की ओर लाने के साथ ही हिंदी भाषी लोगों को भाजपा का वोटर बनाने की है। अब जानिए, भाजपा को जवाब देने के लिए ममता बनर्जी ने क्या किया?
विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा हिंदी भाषी लोगों को लुभाने की कोशिश की जानी थी। इसमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो बिहार से आए हैं। इसे देखते हुए ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव 2024 से पहले से ही तैयारी शुरू कर दी थी। उन्होंने बिहार के दो नेता शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद को आगे बढ़ाया। अपनी पार्टी के टिकट दिए। दोनों चुनाव लड़े और जीतकर सांसद बने। अब इन पर बिहारियों के वोट टीएमसी की तरफ लाने की जिम्मेदारी है। शत्रुघ्न सिन्हा: कायस्थ जाति से आने वाले शत्रुघ्न सिन्हा पश्चिम बर्धमान के आसनसोल से सांसद हैं। यह इलाका झारखंड की सीमा के पास है। यहां की 50 फीसदी आबादी हिंदी भाषी है। ये लोग मूल रूप से बिहार और झारखंड के हैं। आसनसोल लोकसभा में 7 विधान सभा सीटें पांडबेश्वर, रानीगंज, जमुरिया, आसनसोल दक्षिण, आसनसोल उत्तर, कुल्टी और बाराबनी हैं। आसनसोल, कोलकाता के बाद दूसरा सबसे बड़ा और घनी आबादी वाला इलाका है। यह अपने कोयला खदानों, रेलवे जंक्शन और लोहा- इस्पात केंद्रित उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। कीर्ति आजाद: ब्राह्मण जाति से आने वाले कीर्ति आजाद बर्धमान-दुर्गापुर से सांसद हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में 7 विधानसभा क्षेत्र (दुर्गापुर पश्चिम, दुर्गापुर पूर्वी, गलसी, बर्धमान उत्तर, बर्धमान दक्षिण, मंतेश्वर भातार और मानगोविंद) आते हैं। कीर्ति आजाद दरभंगा से बीजेपी के सांसद रह चुके हैं। वे कांग्रेस में भी रहे हैं। अब जानिए बंगाल में बिहारियों की ताकत–करीब 12 लाख बिहारी रहते हैं 2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल में 63 लाख से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। यहां करीब 12 लाख लोग बिहार से हैं। कोलकाता में बड़ी संख्या में हिंदी भाषी रहते हैं। इसके अलावा हावड़ा, हुगली और उत्तर 24 परगना में भी इनकी आबादी अच्छी-खासी है। बिहार के लोग यहां के जूट मिल और दूसरी कारखाने में काम करने आए और बस गए। उत्तर बंगाल में बिहार के किशनगंज, कटिहार और अररिया जिले के काफी लोग व्यापार करते हैं। उत्तर बंगाल, दक्षिण बंगाल और पश्चिम बंगाल में बंगाल को बांट कर देखें तो उत्तर बंगाल में सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग, कूच बिहार और मालदा हैं। दक्षिण में आसनसोल, दुर्गापुर, रानीपुर जैसे कोयलांचल का इलाका है, जो धनबाद के पास तक है। पश्चिम के इलाके में मेदनीपुर, खड़गपुर, कोलकाता और उत्तर 24 परगना के इलाके हैं। इन इलाकों में हिंदी भाषी जीत और हार में अहम भूमिका निभाते हैं। 20 सीटों पर किंगमेकर हैं हिंदी भाषी बंगाल में हिन्दुस्तानी (मतलब बाहरी) 35 से 40 सीटों पर जीत-हार तय करने की भूमिका में हैं। इनमें से 15-20 सीटों पर तो किंगमेकर हैं। हिंदी भाषियों के प्रभाव वाले इलाकों में औद्योगिक और बॉर्डर के पास के क्षेत्र हैं। इनमें आसनसोल व दुर्गापुर के रानीगंज, कुल्टी और बर्नपुर के इलाके हैं। कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में गार्डनरीच, ममोटियाब्रुज, बेहाला, मानिकतल्ला जैसे इलाके हैं। उत्तर 24 परगना में बरानगर, दमदम, बैरकपुर के इलाके हैं। हावड़ा- गुगली इंडस्ट्रियल इलाकों में हावड़ा के अलावा कई विधानसभा सीट पर हिन्दुस्तानियों का प्रभाव है। ममता बनर्जी ने बिहारियों को रिझा रहीं बंगाल में बंगाली बनाम बाहरी मुद्दा अहम है। इसके बावजूद ममता बनर्जी बिहारियों को रिझाने में लगी हैं। लंबे समय तक बंगाल में पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क कहते हैं, ‘ममता बनर्जी ने बिहारियों को प्रभावित करने के लिए संस्कृत विश्वविद्यालय बनवाया। छठ जैसे महापर्व को प्रमोट करने लगी हैं, लेकिन चुनाव में बंगाली बनाम बाहरी का कार्ड खेलती हैं। बहिरागत कहकर वह बंगाली अस्मिता जगाने की कोशिश करती रही हैं।’ बिहारियों को मौका दे रही भाजपा, मिल सकता है लाभ बंगाल चुनाव को बिहारी किस तरह से प्रभावित कर सकते हैं? इस सवाल पर ओम प्रकाश अश्क ने कहा, ‘ममता बनर्जी बिहारियों को प्रमोट करें तो बाजी मार सकती हैं, लेकिन उनको बंगाली और मुसलमानों को भी खुश रखना है। दूसरी तरफ इस बार बीजेपी बिहारियों को खासा मौका दे रही है। इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। बंगाल में बिहारियों से ली जाती है रंगदारी बंगाल में दो तरह का तबका है, एक बंगाली और दूसरा बिहारी। बिहारी में बिहार से आए लोगों के साथ ही झारखंड, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों से लोग भी शामिल हैं। यहां इन सभी को बिहारी या हिंदुस्तानी कहकर बुलाया जाता है। पत्रकार ओम प्रकाश अश्क कहते हैं, ‘हिंदी भाषी तबके का बड़ा वर्ग लोभ व भय से सत्ता से चिपका रहता है, लेकिन हिंदी भाषियों की बड़ी आबादी सत्ता विरोधी रही है।’ उन्होंने कहा, ‘हिंदी भाषियों या बिहारियों को अभी भी यहां घर बनाने, फ्लैट खरीदने, सीमेंट, बालू खरीदने तक में तोलाबाजी यानी रंगदारी देनी पड़ती है। लेफ्ट की सरकार थी तब दूध भी लेफ्ट के लोगों से लेने का दबाव हिंदी भाषियों पर रहता था। अभी टीएमसी के ग्रामीण सिपाहियों का काफी दबाव हिंदी भाषियों पर रहता है।’ बिहार के ये नेता भी बंगाल में लड़ रहे चुनाव शत्रुघ्न सिंहा, कीर्ति आजाद के अलावा बिहार के कई और नेता हैं जो बंगाल की राजनीति में धाक रखते हैं। जैसे- संतोष पाठक: बक्सर के संतोष पाठक पहले कांग्रेस में थे, अब बीजेपी ज्वाइन किया है। वह चुनाव लड़ सकते हैं। अर्जुन सिंह: उत्तर 24 परगना में एक्टिव अर्जुन सिंह आरा के रहने वाले हैं। बंगाल के बैरखपुर क्षेत्र में एक्टिव हैं। इनकी राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से हुई। बाद में टीएमसी में आए। 2014 से बीजेपी के साथ हैं। एक बार सांसद भी चुने गए। इस बार विधानसभा चुनाव बीजेपी से लड़ने की तैयारी में हैं। राजेश सिंह: बिहार के सारण के रहने वाले गोपाल सिंह उत्तर 24 परगना से कांग्रेस विधायक चुने जाते थे। उनके निधन के बाद उनके बेटे राजेश सिंह टीएमसी से जुड़कर राजनीति कर रहे हैं। कोलकाता से काउंसलर हैं। संतोष पाठक: कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए हैं। उन्हें पार्टी टिकट दे सकती है। रितेश तिवारी: भाजपा नेता है। टिकट की कोशिश में जुटे हैं।
अर्जुन सिंह: भाजपा नेता है। टिकट पाने की कोशिश कर रहे हैं।


