बेगूसराय में साल 1988 में हुए ट्रिपल मर्डर केस में कोर्ट ने फैसला सुनाया है। 38 सालों के लंबे इंतजार के बाद अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-3 बृजेश कुमार सिंह की अदालत ने दोषियों को सजा सुनाई है। 7 आरोपी को सजा हुई है। जिसमें 5 को उम्रकैद हुई है। जबकि, 2 आरोपी को बरी कर दिया गया है। घटना 10 अगस्त 1988 की है। तत्कालीन साहेबपुर कमाल थाना (अब डंडारी थाना) के प्रतारपुर गांव में सुबह के करीब 7 बजे पुरानी रंजिश को लेकर हिंसक वारदात को अंजाम दिया गया था। हथियारों से लैस हमलावरों ने गांव में तांडव मचाते हुए तीन लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। 3 हत्या के बाद घर में लगाई थी आग मृतकों की पहचान महावीर यादव, राम पदारथ यादव और निरंजन यादव के रूप में हुई थी। इस हमले में न केवल तीन जानें गईं, बल्कि दो महिलाएं पन्ना देवी और पार्वती देवीभी गंभीर रूप से घायल हुई थी। इतना ही नहीं हमलावरों ने घर में आगजनी भी की थी। मृतक महावीर यादव के बेटे सुरेंद्र यादव ने इस मामले में केस दर्ज कराया था। पुलिस ने इस मामले में 26 लोगों को नामजद आरोपी बनाया था। लेकिन इतनी लंबी रही कि सुनवाई के दौरान 12 आरोपियों की मौत हो गई। अंतिम फैसला आने तक केवल 14 आरोपी ही जीवित बचे थे।अभियोजन पक्ष की ओर से 12 गवाहों ने अपनी गवाही दी, जिन्होंने घटना का समर्थन किया और दोषियों की पहचान की। 5000 रुपये का जुर्माना भी लगा न्यायालय ने सबूत और गवाहों के आधार पर 14 जीवित आरोपियों में से 12 को दोषी करार दिया और 2 को बरी कर दिया। लाल बहादुर यादव, विनय यादव, गणेश यादव, जनार्दन यादव और कलमी यादव को धारा 302/34 के तहत सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इन पर 5000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना नहीं भरने पर 1 साल की अतिरिक्त सजा काटनी होगी। रामदेव यादव और ध्यानी यादव को धारा 307/147 के तहत 7 साल के सश्रम कारावास और 4000 रुपये जुर्माने की सजा मिली है। गरीब दास यादव, अंगद यादव, जोगी यादव, रामचंद्र यादव और रफू यादव को डेढ़ साल की सजा और 2000 रुपये जुर्माना की सजा सुनाई गई। दो आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया। मामले में सरकार की ओर से पैरवी करने वाले अपर लोक अभियोजक (APP) राम प्रकाश यादव ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए किसी धर्मयुद्ध से कम नहीं था। जैसे महाभारत में अर्जुन को अपनों के खिलाफ ही शस्त्र उठाने पड़े थे, वैसे ही मेरे लिए भी अपने ग्रामीणों के खिलाफ सबूत पेश करना कठिन था, लेकिन मैंने ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया। उन्होंने बताया कि 10 कोर्ट बदले, लेकिन न्याय की उम्मीद नहीं टूटी। 38 साल की इस लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान यह मामला करीब 10 अलग-अलग अदालतों से होकर गुजरा। कई बार बहस हुई, गवाहियां हुईं, लेकिन अंत में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-3 (एडीजे-3) बृजेश कुमार सिंह की अदालत ने इस मामले को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया। बेगूसराय में साल 1988 में हुए ट्रिपल मर्डर केस में कोर्ट ने फैसला सुनाया है। 38 सालों के लंबे इंतजार के बाद अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-3 बृजेश कुमार सिंह की अदालत ने दोषियों को सजा सुनाई है। 7 आरोपी को सजा हुई है। जिसमें 5 को उम्रकैद हुई है। जबकि, 2 आरोपी को बरी कर दिया गया है। घटना 10 अगस्त 1988 की है। तत्कालीन साहेबपुर कमाल थाना (अब डंडारी थाना) के प्रतारपुर गांव में सुबह के करीब 7 बजे पुरानी रंजिश को लेकर हिंसक वारदात को अंजाम दिया गया था। हथियारों से लैस हमलावरों ने गांव में तांडव मचाते हुए तीन लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। 3 हत्या के बाद घर में लगाई थी आग मृतकों की पहचान महावीर यादव, राम पदारथ यादव और निरंजन यादव के रूप में हुई थी। इस हमले में न केवल तीन जानें गईं, बल्कि दो महिलाएं पन्ना देवी और पार्वती देवीभी गंभीर रूप से घायल हुई थी। इतना ही नहीं हमलावरों ने घर में आगजनी भी की थी। मृतक महावीर यादव के बेटे सुरेंद्र यादव ने इस मामले में केस दर्ज कराया था। पुलिस ने इस मामले में 26 लोगों को नामजद आरोपी बनाया था। लेकिन इतनी लंबी रही कि सुनवाई के दौरान 12 आरोपियों की मौत हो गई। अंतिम फैसला आने तक केवल 14 आरोपी ही जीवित बचे थे।अभियोजन पक्ष की ओर से 12 गवाहों ने अपनी गवाही दी, जिन्होंने घटना का समर्थन किया और दोषियों की पहचान की। 5000 रुपये का जुर्माना भी लगा न्यायालय ने सबूत और गवाहों के आधार पर 14 जीवित आरोपियों में से 12 को दोषी करार दिया और 2 को बरी कर दिया। लाल बहादुर यादव, विनय यादव, गणेश यादव, जनार्दन यादव और कलमी यादव को धारा 302/34 के तहत सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इन पर 5000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना नहीं भरने पर 1 साल की अतिरिक्त सजा काटनी होगी। रामदेव यादव और ध्यानी यादव को धारा 307/147 के तहत 7 साल के सश्रम कारावास और 4000 रुपये जुर्माने की सजा मिली है। गरीब दास यादव, अंगद यादव, जोगी यादव, रामचंद्र यादव और रफू यादव को डेढ़ साल की सजा और 2000 रुपये जुर्माना की सजा सुनाई गई। दो आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया। मामले में सरकार की ओर से पैरवी करने वाले अपर लोक अभियोजक (APP) राम प्रकाश यादव ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए किसी धर्मयुद्ध से कम नहीं था। जैसे महाभारत में अर्जुन को अपनों के खिलाफ ही शस्त्र उठाने पड़े थे, वैसे ही मेरे लिए भी अपने ग्रामीणों के खिलाफ सबूत पेश करना कठिन था, लेकिन मैंने ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया। उन्होंने बताया कि 10 कोर्ट बदले, लेकिन न्याय की उम्मीद नहीं टूटी। 38 साल की इस लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान यह मामला करीब 10 अलग-अलग अदालतों से होकर गुजरा। कई बार बहस हुई, गवाहियां हुईं, लेकिन अंत में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-3 (एडीजे-3) बृजेश कुमार सिंह की अदालत ने इस मामले को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया।


