राजस्थानियों को अब गुजरात के अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा, ‘मां’ योजना के आंकड़ों ने चौंकाया, मंत्री खींवसर ने बताया बड़ा कारण

राजस्थानियों को अब गुजरात के अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा, ‘मां’ योजना के आंकड़ों ने चौंकाया, मंत्री खींवसर ने बताया बड़ा कारण

Mukhyamantri Ayushman Arogya (MAA) Yojana: जयपुर: मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य (मां) योजना में इंटरस्टेट पोर्टेबिलिटी लागू होने के बाद इलाज का दायरा राज्य की सीमाओं से बाहर निकल गया है। अब मरीज अपनी सुविधा और भरोसे के अस्पताल में दूसरे राज्य में भी कैशलेस इलाज करा रहे हैं।

योजना के पहले तीन महीनों के आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के मरीजों का सबसे ज्यादा रुझान गुजरात की ओर रहा है, जबकि हरियाणा दूसरे स्थान पर है। आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात में राजस्थान के 849 मरीजों ने करीब दो करोड़ रुपए का इलाज कराया, जो अन्य राज्यों की तुलना में लगभग तीन गुना से ज्यादा है।

हरियाणा में 223 मरीजों सहित मध्यप्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश भी टॉप-5 में शामिल हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमावर्ती जिलों के मरीजों के लिए नजदीकी राज्य में बेहतर या सुलभ चिकित्सा सुविधाएं एक बड़ा कारण है।

यह ट्रेड एकतरफा नहीं है। हरियाणा और गुजरात समेत अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए राजस्थान आ रहे हैं। जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल में हर साल बड़ी संख्या में मरीज हरियाणा सहित पड़ोसी राज्यों से इलाज के लिए आते हैं। इससे प्रदेश के सरकारी और निजी अस्पतालों की सेवाओं पर भरोसा भी झलकता है।

सीमावर्ती जिलों का ‘नेचुरल मूवमेंट’

श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, अलवर, भरतपुर, बांसवाड़ा और डूंगरपुर जैसे सीमावर्ती जिलों के मरीज भौगोलिक निकटता के चलते पड़ोसी राज्यों के अस्पतालों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई मामलों में दूरी कम होने के साथ-साथ विशेषज्ञ सेवाएं और बेड की उपलब्धता भी निर्णय को प्रभावित करती है।

पत्रिका में प्रकाशित खबरें…

  • राजस्थानियों को नहीं मिल का मुजात के अस्पतालों में लाभ
  • ध्यान दे सरकार…इलाज में बिक रहे रोगियों के घर-बार
  • दूसरे राज्यों के लिए राजस्थान मेहरबान, हमारा वहां इम्तिहान

इन बीमारियों का इलाज

पोर्टेबिलिटी के तहत दिल की बीमारी (पीटीसीए), किडनी के मरीजों के लिए क्रॉनिक हीमोडायलिसिस, गुर्दे की पथरी, लेप्रोस्कोपिक सर्जरी और सिजेरियन डिलीवरी जैसे मामलों में सबसे ज्यादा इलाज हुआ। खासकर दिल और किडनी से जुड़े मामलों में मरीजों ने बड़े शहरों के अस्पतालों का रुख किया।

यह है प्रक्रिया

मरीज को अपना आयुष्मान कार्ड संबंधित अस्पताल में दिखाना होता है। अस्पताल सॉफ्टवेयर के जरिए कार्ड का सत्यापन करता है और राज्य स्वास्थ्य एजेंसी से स्वीकृति मिलने पर कैशलेस इलाज शुरू हो जाता है। शर्त यही है कि अस्पताल योजना से अधिकृत हो।

विकल्प बढ़े, दबाव भी

यह प्रतिस्पर्धा राज्यों को अपनी स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर करने के लिए भी प्रेरित करेगी। ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि अब इलाज ‘जहां भरोसा, वहीं रास्ता’ की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
-गजेंद्र सिंह खींवसर, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री

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