…तो आज सम्पूर्ण विश्व में सत्य अहिंसा का बोलबाला होता

…तो आज सम्पूर्ण विश्व में सत्य अहिंसा का बोलबाला होता

मुरैना. भगवान महावीर स्वामी ने जो सिद्धांत हमें दिए, उन सिद्धांतो को हमने हृदय से स्वीकार नहीं किया। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतो का हमने प्रचार प्रसार नहीं किया। यदि हमने भगवान महावीर के सिद्धांतो को हृदय से स्वीकार किया होता, उनके सिद्धांतों का प्रचार प्रसार किया होता तो आज सम्पूर्ण विश्व में सत्य अहिंसा का बोलबाला होता। उक्त उदगार आचार्य निर्भयसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

आचार्य निर्भय सागर महाराज ने जैन दर्शन को समझाते हुए कहा कि जैन धर्म भावना प्रधान धर्म है। जैसी हमारी भावना होती है, जैसे हमारे अंतरंग में विचार आते है, उसी के अनुरूप हमें परिणाम मिलते हैं। हमें अपने अंतरंग में कभी भी अशुभ अथवा गलत विचार नहीं लाने चाहिए। सदैव हमें शुभ विचारों को अंतरंग में रखना चाहिए। हमें अच्छी भावना रखते हुए प्राणी मात्र के कल्याण हेतु प्रयत्नशील रहना चाहिए। हम लोगों ने जैन धर्म के सिद्धांतो को एक समुदाय विशेष के सिद्धांत मानकर अपने तक ही सीमित कर लिया। अच्छा होता यदि हम उनके सिद्धांतों को जन जन तक पहुंचाने का प्रयास करते। हम सभी केवल मंदिर के अंदर ही अपने तीर्थंकरों के कल्याणक मनाते हैं, पंचकल्याणक करते हैं, जयंतियां मनाते हैं, किंतु उनके जीवन चरित्र के बारे में, उनके सिद्धांतों के संदर्भ में अथवा उनकी चर्या के संबंध में कोई भी प्रचार प्रसार नहीं करते। हम सभी का कर्तव्य है कि भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांतो को जन जन तक पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील रहें। महाराज ससंघ का मुरैना नगर में भव्य मंगल आगमन हुआ। गुरुदेव निर्भयसागर महाराज ने अपने शिष्यों मुनि सुदत्त सागर, मुनि भूदत्त सागर, क्षुल्लक चंद्रदत्त सागर, क्षुल्लक यशोदत्त सागर के साथ श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर में धर्म प्रभावना करने के पश्चात पद बिहार करते हुए मुरैना पधारे। जैन समाज के साधर्मी बंधुओं ने नगर सीमा में पहुंचकर आचार्य के श्री चरणों में श्रीफल भेंटकर आचार्य संघ की अगवानी की।

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