इलाज मुफ्त, लेकिन अधूरे इलाज और जागरूकता की कमी से खतरा बरकरार
उदयपुर. किसी जमाने में टीबी एक खतरनाक बीमारी कहलाती थी। सरकार और स्वास्थ्य विभाग के साझा प्रयासों से इस पर काफी हद तक काबू पाया जा चुका है। इस बीच एमडीआर टीबी एक नई चुनौती बनकर उभरी है। साधारण टीबी पर जीत डॉट्स के माध्यम से पाई जा सकती है, एमडीआर टीबी पर इन दवाओं का असर नहीं होना इसे खतरनाक बनाती है। जिले में टीबी मरीजों की पहचान और इलाज में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन मरीजों द्वारा बीच में इलाज छोड़ना और सामाजिक जागरूकता की कमी अब भी बड़ी चुनौती है।
एमडीआर-टीबी: बढ़ता खतरा
एमडीआर-टीबी टीबी का एक खतरनाक रूप है, इसमें सामान्य दवाइयां असर नहीं करतीं। यह स्थिति तब बनती है जब मरीज दवाएं बीच में छोड़ देते हैं, गलत तरीके से सेवन करते हैं या पूरा कोर्स नहीं करते। इसके अलावा पहले से संक्रमित मरीज के संपर्क में आना भी जोखिम बढ़ाता है। डॉक्टरों का कहना है कि एमडीआर-टीबी का इलाज लंबा और जटिल होता है, इसलिए सामान्य टीबी के मरीजों को विशेष सावधानी बरतनी जरूरी है।जीत का आंकड़ा 98 प्रतिशत पहुंचा
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में टीबी नोटिफिकेशन का लक्ष्य 9400 रखा गया था, जिसमें से 9231 मामलों की पहचान की जा चुकी है। यह उपलब्धि करीब 98 प्रतिशत तक पहुंचती है, जो सकारात्मक संकेत है। इसमें 6341 मरीज सरकारी क्षेत्र से और 2890 मरीज निजी क्षेत्र से जुड़े हैं। इससे स्पष्ट है कि निजी अस्पतालों की भागीदारी भी बढ़ी है। एक ओर स्वास्थ्य विभाग टीबी मुक्त भारत अभियान को गति दे रहा है, वहीं दूसरी ओर एमडीआर-टीबी (मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी) जैसी गंभीर समस्या नई चुनौती बनकर उभर रही है।
इलाज जारी, लेकिन अधूरा छोड़ना चिंता का कारण
वर्तमान में जिले में कुल 6898 टीबी मरीज दर्ज हैं, इनमें से 6804 मरीजों को इलाज पर रखा गया है। हालांकि, केवल 3760 मरीज ही नियमित रूप से उपचार ले रहे हैं, जबकि 94 मरीज ऐसे हैं जिनका इलाज शुरू ही नहीं हो पाया है। यह स्थिति बताती है कि मरीजों तक समय पर पहुंच और फॉलोअप में अब भी सुधार की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी का पूरा इलाज 6 से 9 महीने तक चलता है, लेकिन कई मरीज बीच में ही दवाएं छोड़ देते हैं, इससे बीमारी और गंभीर हो जाती है और संक्रमण्र का खतरा बढ़ जाता है।
निक्षय मित्र योजना: सहयोग बढ़ा, लेकिन गैप बरकरार
सरकार की ‘निक्षय मित्र’ योजना के तहत टीबी मरीजों को पोषण सहायता देने की पहल की गई है। जिले में 1574 निक्षय मित्र रजिस्टर्ड हैं, इनमें से 1440 ने मरीजों को गोद लेने पर सहमति दी है। वर्ष 2025 में 4212 मरीजों में से 4543 को पोषण किट वितरित की गई। इसके बावजूद कई मरीज ऐसे हैं, जिन्हें नियमित पोषण सहायता नहीं मिल पा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा है, जहां पहुंच और देखदेख में कमी है।
233 हुई जिले में टीबी मुक्त पंचायतें
जिले में कुल 585 ग्राम पंचायतों में टीबी मुक्त अभियान चलाया जा रहा है। वर्ष 2024 में 97 पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित किया गया था, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 233 हो गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल घोषणा से काम नहीं चलेगा, बल्कि लगातार निगरानी और नए मामलों की रोकथाम जरूरी है।
इस तरह होता एमडीआर टीबी का उपचार
वर्तमान में एमडीआर टीबी के इलाज के लिए बीपीएएलएम रेजिमेन उपलब्ध है। मरीज को बेडाक्विलीन, प्रेटोमैनिड, लाइनजोलिड और मोक्सीफ्लॉक्सासिन दवाइयां 6 से 9 माह तक दी जाती हैं। इसके अलावा 9 से 11 माह की शॉर्टर ऑल-ओरल बेडाक्विलीन बेस्ड रेजिमेन तथा 18 माह की ऑल-ओरल लॉन्गर रेजिमेन भी उपलब्ध हैं। इन सभी उपचार पद्धतियों का चयन मरीज की एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के आधार पर किया जाता है, ताकि मरीज को उसकी स्थिति के अनुसार सबसे उपयुक्त और प्रभावी इलाज मिल सके।
फैलने के ये हैं कारण
हवा के जरिए संक्रमण : टीबी मरीज के खांसने, छींकने या बोलने पर हवा में बैक्टीरिया फैलते हैं, जिन्हें आसपास के लोग सांस के साथ अंदर ले लेते हैं।
लंबे समय तक संपर्क : संक्रमित व्यक्ति के साथ लगातार और करीब रहने (घर, कार्यस्थल) से संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
कमजोर इम्यूनिटी : जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है (कुपोषण, अन्य बीमारियां), उनमें टीबी का संक्रमण जल्दी फैलता है और सक्रिय हो जाता है।—
एमडीआर-टीबी
टीबी का गंभीर रूप है, इसमें सामान्य दवाएं काम नहीं करतीं। मरीजों को घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसका इलाज राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत मुफ्त उपलब्ध है। जरूरी यह है कि मरीज समय पर इलाज शुरू करें, दवाइयों का पूरा कोर्स लें और नियमित जांच कराते रहें। खांसते या छींकते समय मुंह ढंकना और संक्रमण से बचाव के उपाय अपनाना बेहद जरूरी है।
डॉ मनोज आर्य, अधीक्षक टीबी एंड चेस्ट हॉस्पिटल


