सार्वजनिक शौचालय व कचराघर के लिए मापदंड तय क्यों नहीं?

सार्वजनिक शौचालय व कचराघर के लिए मापदंड तय क्यों नहीं?

डॉ. विवेक एस. अग्रवाल, पर्यावरण विषयों के जानकार

कचरे के संदर्भ में प्रचलित कहावत ‘नॉट इन माय बैकयार्ड,’ अर्थात् ‘बस मेरा घर-अहाता स्वच्छ रहे,’ को हाल में दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रस्तुत एक याचिका पर हुए निर्णय ने परिवर्तित संदर्भ में घर के अतिरिक्त उसके अगल-बगल की सफाई तक विस्तारित कर दिया है। किंतु बत्तीस वर्ष पूर्व इसी कहावत को लेकर दायर जनहित याचिका के पश्चात निरंतर प्रयासों तथा विगत ग्यारह वर्षों से अधिक समय से चल रहे स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद आमजन में सफाई को लेकर चिंता ‘स्व’ से आगे बढ़कर ‘मेरा मोहल्ला एवं शहर स्वच्छ रहे’ तक नहीं पहुंच पाई है।

इस विषय पर दिखावटी चिंता तो अत्यधिक है, परंतु स्वच्छता बनाए रखने की अपेक्षा अब भी मुख्यत: सरकार या स्थानीय निकायों से ही की जाती है। आज भी स्वच्छता को सरकार का दायित्व मानते हुए कचरा उत्पन्न करने वाला व्यक्ति प्राय: निष्क्रिय बना रहता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही घर के पास स्थित कूड़ाघर अथवा मूत्रालय की गंदगी को लेकर दिए गए एक महत्वपूर्ण आदेश में इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन और स्वच्छ वातावरण के अधिकार का उल्लंघन माना है।

वर्ष 1994 में दायर जनहित याचिका में सार्वजनिक स्थलों पर फैले कचरे से जनस्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को लेकर न्यायपालिका से हस्तक्षेप की मांग की गई थी। उस समय नागरिकों के अव्यवस्थित ढंग से कचरा फेंके जाने के कारण उत्पन्न गंदगी से निजात पाने के लिए कचरा संग्रहण, भंडारण, परिवहन और निस्तारण की व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया था। इसके विपरीत, हाल की याचिका स्थापित व्यवस्था को हटाने से संबंधित थी। इन तीस वर्षों में कचरा प्रबंधन अपने नए सोपान पर है। व्यक्तिगत स्वच्छता की अपेक्षा अब घर से बाहर आसपास तक विस्तारित होना सकारात्मक संकेत है, किंतु कई महत्वपूर्ण पहलू अब भी उपेक्षित हैं। सबसे पहले यह विचारणीय है कि क्या कोई बसावट बिना कचरा उत्पादन की कल्पना के हो सकती है? संभवतया नहीं। यदि यह असंभव है तो फिर नई बसावटों में कचरा प्रबंधन, स्वच्छता और सार्वजनिक शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं का समुचित प्रावधान क्यों नहीं किया जाता?

आज भी अधिकांश शहरों में मास्टर प्लान बनाते समय इन विषयों को प्राथमिकता नहीं मिलती। नीति निर्धारकों, अफसरों, विशेषज्ञों समेत जनता की मास्टरप्लान में रुचि मूलत: सड़कों, पार्कों और आवासीय स्थलों तक ही सीमित रहती है। कचराघर एवं सार्वजनिक शौचालय के लिए तय मानदंड नहीं अथवा वास्तविकता से परे होने के कारण विकसित नहीं हो पाते। इनका विकास कालांतर में बढ़ती आबादी और व्यवसायीकरण के बीच ही करने की कोशिश की जाती है, जब स्थानाभाव के चलते जहां जगह मिले इन्हें बिना नागरिकों की सहमति के स्थापित कर दिया जाता है।

वैज्ञानिक आधार न होने के कारण, यह सुविधा के स्थान पर असुविधा के केंद्र बन जाते हैं और उनके विरुद्ध न्यायालय की शरण लेने की आवश्यकता पड़ती है। किसी भी शहर में कूड़ाघरों-शौचालयों की स्थापना अपरिहार्य है। उनका विरोध होने की अपेक्षा उनके संधारण में शिथिलता होने पर निगमायुक्त से लेकर अंतिम छोर तक के कार्यकर्ता को जवाबदेह बनाना ज्यादा तार्किक होता। इस संदर्भ में नागपुर समेत अनेक शहरों द्वारा बिन फ्री पद्धति के क्रियान्वयन का अनुसरण भी सहायक होगा। कई शहरों में स्वच्छता के लिए मार्शल लगाए जाने की पहल हुई है और अन्य में की जा रही है। इसके तहत,प्राधिकृत मार्शल खुले में मूत्र, शौच या कचरा फेंकने वालों को तुरंत दंडित कर सकेंगे।

मार्शल नियुक्ति से पूर्व नगरीय शासन को तार्किक रूप से व्यवस्था उपलब्ध करना सुनिश्चित करना चाहिए। महत्वपूर्ण विषय यह है कि कचरा प्रबंधन या स्वच्छता के लिए आवश्यक व्यवस्था को शहरों एवं बसावटों की आयोजना का अनिवार्य अंग बनाना होगा, अन्यथा विस्तार होते रहेंगे, आवासी त्रस्त हो बेहतर जीवन की गुहार लगाने को बाध्य होंगे। विडम्बना यह है कि उत्तरदायी कर्मियों को दोषी नहीं ठहराया जाता। यदि दोषीकर्मियों को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी बनाने संबंधी प्रावधान हों तो व्यापक सुधार आएगा।

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