राजस्थान के टोंक जिले का दूनी कस्बा… 28 जून 2014 की रात इस कस्बे की यादों में हमेशा के लिए डर बनकर दर्ज हो गई। उस रात वार्ड नंबर 7 की संकरी गलियों में सब कुछ सामान्य था। लोग अपने घरों में सो चुके थे। गर्मी की रात थी। हवा धीमी थी और सन्नाटा गहरा। उसी सन्नाटे के बीच अपने छोटे से घर में अकेली सो रही थीं बुजुर्ग भूरी बेगम। एक ऐसी महिला, जिनकी जिंदगी बेहद साधारण थी। उस रात उनका घर किसी खौफनाक साजिश का निशाना बनने वाला था। आधी रात में अचानक उस घर की खामोशी टूटती है। दरवाजे की हल्की आहट…फिर दबे पांव अंदर घुसते कुछ साये। कोई चीख बाहर तक नहीं पहुंची, कोई पड़ोसी नहीं जागा। लेकिन घर के अंदर जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मिंदा करने वाला था। सुबह जब पड़ोसियों ने दरवाजा खुला देखा तो उन्हें कुछ अजीब लगा। आवाज देने पर कोई जवाब नहीं मिला। अंदर जाकर जो दृश्य सामने आया, उसने पूरे इलाके को हिला दिया। भूरी बेगम खून से लथपथ पड़ी थीं। उनका गला कटा हुआ था… और सबसे भयावह बात, उनके दोनों पैर शरीर से अलग पड़े थे। खबर आग की तरह फैल गई। दूनी कस्बा सन्न रह गया। सवाल सिर्फ हत्या का नहीं था, बल्कि उस क्रूरता का था जिसने हर किसी को अंदर तक डरा दिया। आखिर कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है? क्या यह पुरानी दुश्मनी थी? जमीन का विवाद? या फिर कोई अन्य रंजिश? पुलिस मौके पर पहुंची, घर को सील किया गया और जांच शुरू हुई। पहली नजर में ही यह साफ था कि हत्या बेहद योजनाबद्ध तरीके से की गई थी। अकेली रहती थी बुजुर्ग महिला
घर में ज्यादा सामान बिखरा नहीं था, जिससे यह साफ था कि यह सामान्य चोरी नहीं थी। मगर फिर सवाल उठा- अगर लूट नहीं थी, तो इतनी बेरहमी क्यों? पुलिस ने आसपास के लोगों से पूछताछ शुरू की। पड़ोसियों ने बताया कि भूरी बेगम का किसी से झगड़ा नहीं था। वह शांत स्वभाव की महिला थीं। अकेली रहती थीं। इससे मामला और उलझ गया। एक से ज्यादा अपराधी होने के संकेत मिले
जांच टीम को घटनास्थल से कुछ ऐसे निशान मिले जो संकेत दे रहे थे कि अपराधी एक से ज्यादा थे। पैरों के पास खून के छींटों का पैटर्न, जमीन पर घसीटने के निशान और दरवाजे की स्थिति, सब कुछ बताता था कि हत्या अचानक नहीं बल्कि इरादे के साथ की गई थी। पुलिस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल था- आखिर हत्यारों का मकसद क्या था? अंधेरा होते ही घरों के दरवाजे बंद होने लगे थे
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, कस्बे में अफवाहें फैलने लगीं। कोई कहता तांत्रिक कारण है, कोई इसे गैंग का काम बता रहा था। रात होते ही लोग दरवाजे जल्दी बंद करने लगे। बुजुर्ग महिलाएं डरने लगीं। बच्चों को बाहर खेलने से रोका जाने लगा। दूनी कस्बा डर के साये में जीने लगा। वारदात से पहले संदिग्ध लोग दिखे थे
पुलिस को एक छोटी सी जानकारी मिली। घटना से कुछ दिन पहले इलाके में कुछ संदिग्ध लोग घूमते देखे गए थे। उनकी पहचान किसी को नहीं पता थी। क्या वे बाहर से आए थे? क्या उन्होंने पहले से रेकी की थी? भूरी बेगम को पहले से जानते थे? हर सवाल एक नए रहस्य को जन्म दे रहा था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने केस को और उलझा दिया। रिपोर्ट में साफ था कि हत्या सिर्फ मारने के लिए नहीं की गई थी, बल्कि शरीर के साथ छेड़छाड़ भी की गई थी। यह सुनकर पुलिस भी हैरान रह गई। अब मामला साधारण अपराध से कहीं ज्यादा गंभीर बन चुका था। दिन बीतते गए, लेकिन हत्यारे पकड़ में नहीं आए। कस्बे में डर बढ़ता गया और पुलिस पर दबाव भी। मीडिया ने इसे ‘दूनी का सबसे खौफनाक मर्डर’ कहना शुरू कर दिया। हर कोई जानना चाहता था- आखिर किसने की भूरी बेगम की हत्या? और क्यों? जांच की दिशा अचानक बदलती है जब पुलिस को एक ऐसे गिरोह के बारे में सूचना मिलती है, जो पहले भी बेहद क्रूर वारदातों में शामिल रहा था। लेकिन क्या वही इस हत्या के पीछे थे? या यह सिर्फ एक संयोग था? रहस्य गहराता जा रहा था… और सच अभी भी अंधेरे में छिपा था। कल राजस्थान क्राइम फाइल्स फाइल्स पार्ट-2 में पढ़िए आगे की कहानी…


