भोपाल गैस पीड़ितों के इलाज के लिए बने बीएमएचआरसी में एक बार फिर जरूरी दवाओं की उपलब्धता पर गंभीर सवाल उठे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने निगरानी समिति को ईमेल के जरिए शिकायत भेजकर आरोप लगाया है कि मरीजों को समय पर जीवनरक्षक दवाएं नहीं मिल रहीं, जिससे उनकी स्थिति और बिगड़ रही है। गैस पीड़ित संगठनों ने भी अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि “NA” लिखकर मरीजों को बाहर से दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि अस्पताल की जिम्मेदारी दवा उपलब्ध कराने की है। भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा ने निगरानी समिति के चेयरमैन जस्टिस वीके अग्रवाल को सोमवार को ईमेल भेजकर बीएमएचआरसी में दवाओं की कमी का मुद्दा उठाया है। शिकायत में कहा है कि अस्पताल में आवश्यक और जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। जिससे गैस पीड़ितों को लगातार परेशानी झेलनी पड़ रही है। ग्लूकोमा मरीज को नहीं मिली जरूरी दवा ईमेल में एक मामले का जिक्र करते हुए बताया गया कि हबीब नाम के मरीज को एक्यूट ग्लूकोमा की समस्या है। डॉक्टर ने उन्हें ब्रिमोनिडीन दवा लिखी थी, जो आंखों की रोशनी बचाने के लिए बेहद जरूरी होती है। आरोप है कि यह दवा दो सप्ताह तक उपलब्ध नहीं कराई गई और अस्पताल ने इसे स्थानीय स्तर पर खरीदने की भी कोशिश नहीं की। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी दवा में थोड़ी भी देरी स्थायी नुकसान का कारण बन सकती है। अन्य मरीजों को भी दवा से वंचित रखने का आरोप शिकायत में रायसेन से आए दो बुजुर्ग गैस पीड़ितों रामकिशन और रामकली का भी जिक्र किया गया है। 19 मार्च को न्यूरोलॉजी ओपीडी में दिखाने के बाद उन्हें लिखी गई कुछ दवाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं। फार्मासिस्ट ने पर्ची पर “NA” लिखकर उन्हें बाहर से दवा लेने को कह दिया। संगठन का आरोप- जिम्मेदारी से बच रहा प्रबंधन गैस पीड़ित संगठनों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है। जब भी दवा उपलब्ध नहीं होती, पर्ची पर “NA” लिख दिया जाता है और प्रबंधन अपनी जिम्मेदारी से बच जाता है। उनका आरोप है कि अस्पताल के पास यह तक रिकॉर्ड नहीं होता कि रोज कितने मरीजों को दवा नहीं मिल रही। लोकल पर्चेज और अमृत फार्मेसी पर भी सवाल संगठनों ने कहा कि अस्पताल में लोकल पर्चेज (LP) का प्रावधान है और अमृत फार्मेसी भी इसी उद्देश्य से खोली गई थी कि जरूरत पड़ने पर दवा वहीं से खरीदकर मरीज को दी जाए। लेकिन आरोप है कि यह व्यवस्था कागजों तक ही सीमित है और मरीजों को खुद दवा खरीदनी पड़ती है। निगरानी समिति से तीन प्रमुख मांगें की गई हैं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश फिर भी नहीं हुआ सुधार शिकायत में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा है कि गैस पीड़ितों को मुफ्त और पर्याप्त इलाज मिलना उनका संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में दवाओं की कमी सीधे तौर पर उनके अधिकारों का उल्लंघन है। संगठनों का कहना है कि इससे जवाबदेही तय होगी और मरीजों को समय पर इलाज मिल सकेगा। वहीं, मामले में बीएमएचआरसी के पीआरओ रितेश पुरोहित से संपर्क किया गया, लेकिन उनका पक्ष सामने नहीं आ सका।


