मार्च, 1985 की शाम… 30 सी- 51, सरदार पटेल मार्ग, जयपुर… तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष भैरोंसिंह शेखावत और श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी साथ बैठे थे। मेरा दोनों से परिचय था। उन्होंने मुझे देखा तो पास बुलाया। शेखावत जी ने मुझसे पूछा, ‘आप पत्रकार नहीं बन सकते क्या?’ इसका जवाब मुझसे पहले कुलिश जी ने दिया, ‘क्यों नहीं! कल सुबह केसरगढ़ (पत्रिका मुख्यालय) आ जाएं।’ अगली सुबह ठीक समय पर मैं पहुंच गया और पत्रकार बन गया। इसके बाद जीवन को दिशा देने में जो सर्वाधिक योगदान है, वह कुलिश जी का है।
1997 तक मैं पत्रिका में रहा। इस दौरान देश के राजनीतिक सामाजिक हालात ने जो मोड़ लिया, कुलिश जी के कारण ही में उन घटनाओं का साक्षी बन सका। राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क का माध्यम कुलिश जी ही बने। वे कभी अखबार के पूंजीपति मालिक नहीं समझे गए, बल्कि उन्होंने पत्रकार भाव को जाग्रत रखते हुए समय की धारा को प्रभावित किया। जहां लोकसभा-राज्यसभा में सीट के लिए बड़े मीडिया समूहों के मालिक तत्पर नजर आए, उन्होंने उधर झांका तक नहीं। अखबार और राजनेताओं के संबंधों पर उनकी सोच स्पष्ट थी, ‘जिंदा मक्खी नहीं निगली जा सकती, सच तो लिखना ही पड़ेगा।’

खबरों की बेबाकी और तथ्यपूर्णता मैंने कुलिश जी से ही सीखी। मेरी पुस्तक ‘कारसेवा से कारसेवा तक’ का नामकरण कुलिश जी ने ही किया और कवर की डिजाइन खुद हाथ से तैयार की। पांच हजार पुस्तकों की कुल विक्रय राशि मुझे दी, जिससे मेरा घर बना। पुस्तक मुद्रित भी उन्होंने करवाई और कॉपीराइट मेरे नाम किया। ऐसे थे कुलिश जी।
-गोपाल शर्मा, विधायक, सिविल लाइंस, जयपुर


