101 दीपों से होगी महाआरती; इंद्र के कठोर तपस्या करने पर समुद्र से इसी तिथि को प्रकट हुईं थीं लक्ष्मीजी

101 दीपों से होगी महाआरती; इंद्र के कठोर तपस्या करने पर समुद्र से इसी तिथि को प्रकट हुईं थीं लक्ष्मीजी

नवरात्र की पंचमी तिथि सोमवार को राजस्थान की एकमात्र लक्ष्मी पीठ प्रचीन महालक्ष्मी मंदिर, चांदी की टकसाल में चैत्र नवरात्र महोत्सव के अंतर्गत लक्ष्मी पंचमी मनाई जाएगी। माता महालक्ष्मी के स्वरूप की विशेष पूजा होगी। लक्ष्मी पंचमी की पूर्व संध्या पर माता लक्ष्मी का भव्य शृंगार किया गया। पं. विक्रम कुमार शर्मा ने बताया कि मंदिर में चैत्र नवरात्र महोत्सव प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। इस दौरान माता महालक्ष्मी की विशेष पूजा आराधना की जाती है। अष्टमी पर 51 कन्याओं का पूजन किया जाएगा। महानवमी केदिन मंदिर में 101 दीपक से महाआरती और मनोकामना हवन भी किया जाएगा। घरों व दुकानों पर श्रीयंत्र की होगी विशेष साधना चैत्र शुक्ल पक्ष पंचमी जिसे श्री पंचमी भी कहा जाता है। महिलाएं व पुरुष माता लक्ष्मी के लिए उपवास रखते हैं और घरों व दुकानों में श्रीयंत्र की विशेष साधना की जाती है। इस बार लक्ष्मी पंचमी पर कृतिका नक्षत्र और विष्कुंभ योग रहेगा। साथ ही रात्रि में सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण रहेगा। बंशीधर ज्योतिष पंचांग के ज्योतिषाचार्य दामोदर शर्मा ने बताया कि शादी व अन्य शुभ कार्यों की खरीदारी इस दिन से शुरू की जा सकेगी। सोमवार सुबह 9:33 बजे से 11:03 बजे तक शुभ का चौघड़िया रहेगा और दोपहर में 2:04 बजे से 3:34 बजे तक चर का और 3:34 से 5:04 बजे तक लाभ का चौघड़िया और 5:04 से शाम 6:35 बजे तक अमृत का चौघड़िया रहेगा। इसके बाद 6:35 बजे से रात 8:05 बजे तक चर का चौघड़िया रहेगा। इसके बाद सर्वार्थ सिद्धि व रवि योग का निर्माण होगा। दक्षिण भारत में दिवाली की तर्ज पर मनाई जाती है लक्ष्मी पंचमी ; दस महाविद्या ज्योतिष केंद्र के ज्योतिषाचार्य मनोज पारीक ने बताया कि श्री यंत्र की विधिवत पूजा से मां लक्ष्मी और भगवती ललिता त्रिपुर सुंदरी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि श्री यंत्र स्वयं शिव और शक्ति का स्वरूप है। श्री यंत्र को ‘यंत्रराज’ और ‘देवद्वार’ भी कहा जाता है। दक्षिण भारत में लक्ष्मी पंचमी दीपावली की तर्ज पर मनाई जाती है। घर, दुकान या मकान की नींव में प्राण-प्रतिष्ठित श्री यंत्र स्थापित किया जाए, तो वहां सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इंद्र को स्वर्ग में स्थाई लक्ष्मी के वास का दिया था वरदान : लक्ष्मी पंचमी तिथि के लिए माना जाता है कि देवराज इंद्र की तपस्या से प्रसन्न हो कर माता महालक्ष्मी चैत्र शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि पर ब्रह्मांड के समुद्र से प्रकट हुई थीं और भगवान इंद्र को स्वर्ग में स्थाई लक्ष्मी के वास का वरदान दिया था। इसी वजह से चैत्र माह शुक्ल पक्ष पंचमी को लक्ष्मी पंचमी के रूप मे मनाया जाता है।

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