वर्ष 1992 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के बाद हर साल 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जा रहा है, लेकिन 2026 तक आते-आते जल संकट की स्थिति में उम्मीदों के मुताबिक सुधार नहीं दिख रहा। खासकर जैसलमेर जैसे मरुस्थली क्षेत्र में यह संकट और गहरा होता नजर आ रहा है, जहां पानी की हर बूंद जीवन का आधार है।
जल संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए देशभर में अभियान चलाए जा रहे हैं। स्कूलों में प्रतियोगिताएं, सोशल मीडिया पर संदेश और सरकारी कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं, लेकिन इनका प्रभाव अधिकतर जागरूकता तक ही सीमित रह जाता है।
सरकारी योजनाएं कागजों से बाहर निकलने को अब भी तरस रही
व्यवहारिक स्तर पर पानी बचाने की आदत अभी भी समाज में व्यापक रूप से विकसित नहीं हो पाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट का सबसे बड़ा कारण स्वयं मानव है। अंधाधुंध भूजल दोहन, जल का दुरुपयोग और पारंपरिक स्रोतों की उपेक्षा ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। एक ओर जल की कमी है, वहीं दूसरी ओर उपलब्ध संसाधनों का भी समुचित उपयोग नहीं हो रहा। जैसलमेर जैसे क्षेत्र में, जहां वर्षा सीमित है, वहां जल संरक्षण के प्रयासों को केवल अभियान नहीं बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बनाना आवश्यक है।
यह है हकीकत
30 साल से अधिक समय से चल रहा जागरूकता अभियान
- भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा
वर्षा जल का पर्याप्त संग्रहण नहीं -पारंपरिक जल स्रोतों की अनदेखी
एक्सपर्ट व्यू : बदलनी होगी धारणा
इतिहासवेत्ता ऋषिदत्त पालीवाल का कहना है कि लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी है, जबकि वास्तविकता यह है कि जब तक हर व्यक्ति स्वयं प्रयास नहीं करेगा, तब तक कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती। जैसलमेर में जल संकट केवल प्राकृतिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रबंधन से जुड़ा मुद्दा भी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है।


