‘छोटे गांव के लड़के ने बड़ा कमाल कर दिया’:शहीद सीताराम की शहादत पर गांव के लोगों को गर्व; 1KM लंबी अंतिम यात्रा में लगते रहे नारे

‘छोटे गांव के लड़के ने बड़ा कमाल कर दिया’:शहीद सीताराम की शहादत पर गांव के लोगों को गर्व; 1KM लंबी अंतिम यात्रा में लगते रहे नारे

‘गांव के प्राइमरी स्कूल में ही मैंने अपने बेटे सीताराम का एडमिशन कराया था। गांव का माहौल पढ़ाई के लिए ठीक नहीं था। मैं बाहर मजदूरी करता था। सीताराम शुरुआत में मेरी मजदूरी और पढ़ाई का महत्व वहीं समझते थे। उनका पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता था। सीताराम की मां एक बार तो मुझे कहने लगी कि आप अपने साथ इसे भी ले जाया कीजिए। जब सीताराम ने ये बात सुनी तो संकोच में पड़ गए। मुझसे कहा कि पापा मैं आगे पढ़ाई करूंगा और गरीबी के दलदल से खुद भी निकलूंगा, आप लोगों को भी निकालूंगा।’ समस्तीपुर के बाजितपुर करनौल गांव के रहने वाले शहीद 40 साल के सीताराम यादव के पिता सूरज राय ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ये बातें कही। दरअसल, बुधवार की शाम सीताराम यादव जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में शहीद हो गए। शहीद का शुक्रवार को समस्तीपुर में गंगा के सरारी घाट के किनारे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। शहीद सीताराम यादव के माता-पिता ने क्या कहा? शहीद के दोस्तों और गांव के लोगों ने उनके बारे में क्या बताया? शहीद सीताराम का बचपन कैसा था? पढ़िए, पूरी रिपोर्ट। पहले शहीद के अंतिम संस्कार से जुड़ी तस्वीरें देखिए… सबसे पहले पढ़िए, अंतिम संस्कार के दौरान लोगों की बातचीत बुधवार को शहीद हुए सीताराम यादव का पार्थिव शरीर गुरुवार को समस्तीपुर लाया गया। शुक्रवार सुबह शहीद के घर पर पहले लोगों ने शहीद के अंतिंम दर्शन किए। इसके बाद उनके घर से शमशान घाट के लिए अंतिम यात्रा निकाली गई। शहीद का पार्थिव शरीर तिरंगा लिपटे कॉफिन में ट्रक पर रखा गया। इसके बाद अंतिम यात्रा बाजितपुर करनैल गांव से गंगा घाट के लिए निकले। करीब एक किलोमीटर तक लोग पैदल, बाइक से सेना के ट्रक के पीछे चलते रहे। सभी बाइक सवार और पैदल चल रहे लोगों के हाथों में तिरंगा था। समस्तीपुर में गंगा के सरारी घाट पर जब शहीद सीताराम यादव का अंतिम संस्कार किया जा रहा था, जब साथी जवान राइफल से शहीद की शहादत को सलामी दे रहे थे, तभी गंगा घाट के किनारे में मौजूद गांव के युवा ‘जबतक सूरज चांद रहेगा सीताराम तेरा नाम रहेगा’ का नारा लगा रहे थे, वहीं कुछ बुजुर्ग आपस में बातचीत कर रहे थे। वे बोल रहे थे कि छोटे से गांव के लड़के ने बड़ा कमाल कर दिया। गर्व से छाती चौड़ी हो गई। गरीबी में गुजरा शहीद का बचपन, पिता ने शेयर किया किस्सा शहीद सीताराम का बचपन गरीबी में गुजरा था। पिता सूरज राय ने बताया कि पहले मैं गांव में ही खेतिहर मजदूर के रूप में काम करता था। परिवार बढा तो मैं परिवार के सदस्यों के भरण पोषण के लिए कोलकाता चला गया। उन्होंने बताया कि मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं, इस वजह से मुझे कभी बेहतर या अच्छा काम नहीं मिला। उन्होंने बताया कि कोलकाता में कई दिनों के प्रयास के बाद मुझे एक प्राइवेट कंपनी में सामान ढोने का काम मिला। साथ में हाथ से ठेला चलाने की नौकरी मिली। इसी काम से थोड़े बहुत पैसे आते थे, जिसे मैं अपनी पत्नी को घर भेजता था, ताकि बच्चों की पढ़ाई बेहतर तरीके से हो सके। सूरज राय ने बताया कि सीताराम का मन पढ़ाई में नहीं लगता था, लेकिन जब मैंने अपनी गरीबी का किस्सा उन्हें सुनाया और मोटिवेट किया तो सीताराम ने मुझसे वादा किया कि मैं आपको इस गरीबी से निकालूंगा। वे बताते हैं कि गांव के ही प्राइमरी और मिडिल स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद सीताराम ने साल 2000 में गांव के ही जनता उच्च विद्यालय बाजितपुर करनैल से 10वीं की परीक्षा पास की। 2002 में एएनडी कॉलेज पटोरी से इंटर करने के दौरान ही सीताराम का सिलेक्शन सेना के लिए हो गया। पहले हम लोगों का मकान खपड़ैल का था, लेकिन नौकरी लगने के बाद सीताराम ने इस मकान को ठीक से बनवाया। बाद में समस्तीपुर शहर के मोहनपुर में जमीन लेकर मकान बनवाया। जहां सीताराम की पत्नी, बेटी और दोनों बेटे रहते हैं। बेटी श्रुति कुमारी जेई की तैयारी कर रही है। बड़ा बेटा अनुज कुमार 14 साल का है, जो दोनों पैर से दिव्यांग है, जबकि छोटा बेटा सुशांक कुमार तीसरी में पढ़ाई करता है। ‘क्रिकेट के दौरान झगड़ा होता था, सीताराम बीच-बचाव कर सुलझाते थे’ शहीद जवान सीताराम के बचपन के दोस्त सौरवेंदु शरण ने बताया कि हम दोनों बचपन के दोस्त हैं। हम दोनों ने ही गांव के प्राइमरी स्कूल से एक साथ पढ़ाई की है। हाईस्कूल की पढाई एक साथ पूरी की। पटोरी कॉलेज में इंटर में एक साथ एडमिशन कराया, एक साथ पास भी हुए। बाद में सीताराम का सेना के लिए सिलेक्शन हो गया। बचपन की कहानी शेयर करते हुए सौरवेंदु शरण ने बताया कि पढ़ाई में सीताराम सामान्य स्टूडेंट थे, लेकिन शुरू से उनकी सेना में जाने की इच्छा थी। सीताराम रोजाना सुबह दौड़ने निकल जाते थे। वे बताते हैं कि जब गांव में क्रिकेट खेलने के दौरान दो टीमों के बीच झगड़ा हो जाता था तो सीताराम ही बीच-बचाव कर खेल की भावना से दोनों टीमों को अलग कर खेल आगे बढ़ाते थे। सौरवेंदु शरण ने बताया कि होली से पहले सीताराम के साढू के घर शादी थी, जिसमें वह आये हुए थे। कम दिनों की छुट्‌टी थी, जिस कारण गांव नहीं आ पाए। फोन पर बातचीत के दौरान सीताराम ने बताया था कि अप्रैल में गांव आऊंगा। लेकिन देखिए अब मेरे दोस्त का पार्थिव शरीर गांव आया है। ‘गांव के प्राइमरी स्कूल में ही मैंने अपने बेटे सीताराम का एडमिशन कराया था। गांव का माहौल पढ़ाई के लिए ठीक नहीं था। मैं बाहर मजदूरी करता था। सीताराम शुरुआत में मेरी मजदूरी और पढ़ाई का महत्व वहीं समझते थे। उनका पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता था। सीताराम की मां एक बार तो मुझे कहने लगी कि आप अपने साथ इसे भी ले जाया कीजिए। जब सीताराम ने ये बात सुनी तो संकोच में पड़ गए। मुझसे कहा कि पापा मैं आगे पढ़ाई करूंगा और गरीबी के दलदल से खुद भी निकलूंगा, आप लोगों को भी निकालूंगा।’ समस्तीपुर के बाजितपुर करनौल गांव के रहने वाले शहीद 40 साल के सीताराम यादव के पिता सूरज राय ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ये बातें कही। दरअसल, बुधवार की शाम सीताराम यादव जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में शहीद हो गए। शहीद का शुक्रवार को समस्तीपुर में गंगा के सरारी घाट के किनारे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। शहीद सीताराम यादव के माता-पिता ने क्या कहा? शहीद के दोस्तों और गांव के लोगों ने उनके बारे में क्या बताया? शहीद सीताराम का बचपन कैसा था? पढ़िए, पूरी रिपोर्ट। पहले शहीद के अंतिम संस्कार से जुड़ी तस्वीरें देखिए… सबसे पहले पढ़िए, अंतिम संस्कार के दौरान लोगों की बातचीत बुधवार को शहीद हुए सीताराम यादव का पार्थिव शरीर गुरुवार को समस्तीपुर लाया गया। शुक्रवार सुबह शहीद के घर पर पहले लोगों ने शहीद के अंतिंम दर्शन किए। इसके बाद उनके घर से शमशान घाट के लिए अंतिम यात्रा निकाली गई। शहीद का पार्थिव शरीर तिरंगा लिपटे कॉफिन में ट्रक पर रखा गया। इसके बाद अंतिम यात्रा बाजितपुर करनैल गांव से गंगा घाट के लिए निकले। करीब एक किलोमीटर तक लोग पैदल, बाइक से सेना के ट्रक के पीछे चलते रहे। सभी बाइक सवार और पैदल चल रहे लोगों के हाथों में तिरंगा था। समस्तीपुर में गंगा के सरारी घाट पर जब शहीद सीताराम यादव का अंतिम संस्कार किया जा रहा था, जब साथी जवान राइफल से शहीद की शहादत को सलामी दे रहे थे, तभी गंगा घाट के किनारे में मौजूद गांव के युवा ‘जबतक सूरज चांद रहेगा सीताराम तेरा नाम रहेगा’ का नारा लगा रहे थे, वहीं कुछ बुजुर्ग आपस में बातचीत कर रहे थे। वे बोल रहे थे कि छोटे से गांव के लड़के ने बड़ा कमाल कर दिया। गर्व से छाती चौड़ी हो गई। गरीबी में गुजरा शहीद का बचपन, पिता ने शेयर किया किस्सा शहीद सीताराम का बचपन गरीबी में गुजरा था। पिता सूरज राय ने बताया कि पहले मैं गांव में ही खेतिहर मजदूर के रूप में काम करता था। परिवार बढा तो मैं परिवार के सदस्यों के भरण पोषण के लिए कोलकाता चला गया। उन्होंने बताया कि मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं, इस वजह से मुझे कभी बेहतर या अच्छा काम नहीं मिला। उन्होंने बताया कि कोलकाता में कई दिनों के प्रयास के बाद मुझे एक प्राइवेट कंपनी में सामान ढोने का काम मिला। साथ में हाथ से ठेला चलाने की नौकरी मिली। इसी काम से थोड़े बहुत पैसे आते थे, जिसे मैं अपनी पत्नी को घर भेजता था, ताकि बच्चों की पढ़ाई बेहतर तरीके से हो सके। सूरज राय ने बताया कि सीताराम का मन पढ़ाई में नहीं लगता था, लेकिन जब मैंने अपनी गरीबी का किस्सा उन्हें सुनाया और मोटिवेट किया तो सीताराम ने मुझसे वादा किया कि मैं आपको इस गरीबी से निकालूंगा। वे बताते हैं कि गांव के ही प्राइमरी और मिडिल स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद सीताराम ने साल 2000 में गांव के ही जनता उच्च विद्यालय बाजितपुर करनैल से 10वीं की परीक्षा पास की। 2002 में एएनडी कॉलेज पटोरी से इंटर करने के दौरान ही सीताराम का सिलेक्शन सेना के लिए हो गया। पहले हम लोगों का मकान खपड़ैल का था, लेकिन नौकरी लगने के बाद सीताराम ने इस मकान को ठीक से बनवाया। बाद में समस्तीपुर शहर के मोहनपुर में जमीन लेकर मकान बनवाया। जहां सीताराम की पत्नी, बेटी और दोनों बेटे रहते हैं। बेटी श्रुति कुमारी जेई की तैयारी कर रही है। बड़ा बेटा अनुज कुमार 14 साल का है, जो दोनों पैर से दिव्यांग है, जबकि छोटा बेटा सुशांक कुमार तीसरी में पढ़ाई करता है। ‘क्रिकेट के दौरान झगड़ा होता था, सीताराम बीच-बचाव कर सुलझाते थे’ शहीद जवान सीताराम के बचपन के दोस्त सौरवेंदु शरण ने बताया कि हम दोनों बचपन के दोस्त हैं। हम दोनों ने ही गांव के प्राइमरी स्कूल से एक साथ पढ़ाई की है। हाईस्कूल की पढाई एक साथ पूरी की। पटोरी कॉलेज में इंटर में एक साथ एडमिशन कराया, एक साथ पास भी हुए। बाद में सीताराम का सेना के लिए सिलेक्शन हो गया। बचपन की कहानी शेयर करते हुए सौरवेंदु शरण ने बताया कि पढ़ाई में सीताराम सामान्य स्टूडेंट थे, लेकिन शुरू से उनकी सेना में जाने की इच्छा थी। सीताराम रोजाना सुबह दौड़ने निकल जाते थे। वे बताते हैं कि जब गांव में क्रिकेट खेलने के दौरान दो टीमों के बीच झगड़ा हो जाता था तो सीताराम ही बीच-बचाव कर खेल की भावना से दोनों टीमों को अलग कर खेल आगे बढ़ाते थे। सौरवेंदु शरण ने बताया कि होली से पहले सीताराम के साढू के घर शादी थी, जिसमें वह आये हुए थे। कम दिनों की छुट्‌टी थी, जिस कारण गांव नहीं आ पाए। फोन पर बातचीत के दौरान सीताराम ने बताया था कि अप्रैल में गांव आऊंगा। लेकिन देखिए अब मेरे दोस्त का पार्थिव शरीर गांव आया है।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *