Pakistan GDP Growth:पाकिस्तान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे चुनौतीपूर्ण आर्थिक दौर से गुजर रहा है। हालिया वैश्विक परिस्थितियों, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने इस्लामाबाद की कमर तोड़ दी है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में आए उछाल ने पाकिस्तान की अस्थिर अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में धकेल दिया है। लाहौर स्थित ‘फ्राइडे टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति अब उस नाजुक मोड़ पर पहुंच गई है जहां से वापसी की राह अत्यंत कठिन नजर आती है।
गिरते विकास दर और सामाजिक संकेतकों की चुनौती
पाकिस्तान की वर्तमान जीडीपी विकास दर महज 3.1 प्रतिशत पर सिमट कर रह गई है, जो इसकी विशाल आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए नाकाफी है। मानव विकास सूचकांक (HDI) के मामले में पाकिस्तान दुनिया के 193 देशों की सूची में 168वें स्थान पर खिसक गया है। आंकड़े बताते हैं कि देश की प्रति व्यक्ति आय केवल 1,812 डॉलर है और गरीबी दर 28.9 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति भयावह है; जहां वयस्क साक्षरता दर 60 प्रतिशत है, वहीं लगभग 2.52 करोड़ बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी दर, जो 15-24 आयु वर्ग में 12.8 प्रतिशत है, देश के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ी कर रही है। दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में ये सभी सूचकांक पाकिस्तान की प्रशासनिक और आर्थिक विफलता की कहानी बयां करते हैं।
बढ़ता व्यापार घाटा और विदेशी मुद्रा का संकट
आर्थिक अस्थिरता का एक मुख्य कारण पाकिस्तान का लगातार बढ़ता व्यापार घाटा है, जो वर्तमान में 10 अरब डॉलर के पार जा चुका है। निर्यात में लगातार गिरावट आ रही है और विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। स्टेट बैंक के पास उपलब्ध महज 16.5 अरब डॉलर का भंडार देश की आयात जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके ऊपर, पश्चिम एशिया के युद्ध ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। तेल की कीमतों में 55 रुपए प्रति लीटर और गैस की कीमतों में 20 प्रतिशत की हालिया वृद्धि ने महंगाई को बेकाबू कर दिया है। बिजली और परिवहन लागत में इस बढ़ोतरी का सीधा असर पाकिस्तान की 25 करोड़ आबादी की जेब पर पड़ रहा है, जिससे आम आदमी के लिए बुनियादी जरूरतें जुटाना भी दूभर हो गया है।
बजट का गणित और विकास की अनदेखी
पाकिस्तान के बजट का एक बड़ा हिस्सा विदेशी कर्ज के ब्याज भुगतान और रक्षा खर्चों की भेंट चढ़ जाता है। प्रशासनिक कार्यों और राज्यों के हिस्से को निकालने के बाद, विकास कार्यों के लिए सरकार के पास बजट का मात्र 20 प्रतिशत हिस्सा ही बचता है। बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश की कमी ने पाकिस्तान को उधारी के एक ऐसे दुष्चक्र में फंसा दिया है, जिससे निकलना बिना कड़े सुधारों के असंभव है। स्वच्छ पेयजल और बेहतर आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में वहां का जीवन स्तर लगातार गिरता जा रहा है।


