बेगूसराय जिले से न्यायपालिका की तत्परता और पुलिसिया जांच की विफलता का एक बड़ा मामला सामने आया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश (तृतीय) ब्रजेश कुमार सिंह की अदालत ने बहुचर्चित मुरारी हत्याकांड में महज 15 दिनों के अंदर सुनवाई पूरी करते हुए अपना फैसला सुना दिया है। साक्ष्य और ठोस सुबूतों के अभाव में अदालत ने मृतक की पत्नी मौसम कुमारी और दो अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। फुलवरिया थाना कांड संख्या 147/25 की सुनवाई के दौरान 24 फरवरी 2026 को आरोप गठित हुए और 15 दिनों में सुनवाई पूरी हुई। जिसमें पत्नी मौसम कुमारी, प्रिंस कुमार उर्फ छोटू और आशीष कुमार उर्फ कन्हैया को बरी किया गया है। जानिए क्या है पूरा मामला मुरारी कुमार सिंह अपने ससुराल मधुरापुर (फुलवरिया थाना क्षेत्र) में 2023 से रहकर दवा का कारोबार करते थे। 20 सितंबर 2025 की सुबह करीब 8 बजे घर से निकले थे, लेकिन शाम तक वापस नहीं लौटे। उनका मोबाइल भी स्विच ऑफ आ रहा था। बाद में उनकी लाश बरामद हुई, जिसके बाद इलाके में सनसनी फैल गई। मृतक की सास मंजू देवी ने थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने अपनी ही बेटी मौसम कुमारी और उसके सहयोगियों पर हत्या का संदेह जताया था। पुलिस ने जांच के बाद दावा किया था कि यह मामला प्रेम प्रसंग से जुड़ा है और पत्नी ने अपने प्रेम संबंधों में बाधा बनने के कारण सहयोगियों के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। सुनवाई के दौरान अपर लोक अभियोजक राम प्रकाश यादव ने अभियोजन पक्ष की ओर से 9 गवाहों को पेश किया। इनमें मृतक के भाई रंजीत कुमार, नंदन कुमार, मंजू देवी (सूचिका), चंदन कुमार, रवि कुमार एवं शिव नारायण सिंह तथा डॉ. सुशील कुमार गोयनका एवं दो आईओ विनीत कुमार और विजय सहनी की भी गवाही कराई गई। प्रत्यक्ष संलिप्तता के बारे में गवाही नहीं सुनवाई के दौरान सबसे बड़ी बाधा यह रही कि किसी भी गवाह ने आरोपियों को हत्या करते हुए नहीं देखा था। गवाहों ने केवल यह कहा कि मुरारी कुमार अपनी पत्नी के प्रेम प्रसंग की बात किया करता था, लेकिन घटना के समय आरोपियों की मौजूदगी या प्रत्यक्ष संलिप्तता के बारे में कोई ठोस गवाही नहीं मिली। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य पेश करने में विफल रहा। 24 फरवरी को आरोप गठित होने के बाद जिस तेजी से सुनवाई हुई। उसने पुलिस की चार्जशीट और जांच की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए। ठोस सुबूत नहीं होने के कारण कोर्ट ने तीनों आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया। इस फैसले के बाद कानूनी गलियारों में चर्चा है कि 15 दिनों में सुनवाई पूरी होना न्यायपालिका की सक्रियता को दर्शाता है, लेकिन यह मामला उन परिवारों के लिए एक सबक भी है। जहां गवाह ऐन वक्त पर मुकर जाते हैं या पुलिस केवल परिस्थितिजनक साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) के भरोसे केस छोड़ देती है। पुलिस साबित नहीं कर सकी पुलिस ने दावा किया था कि मुरारी की पत्नी मौसम कुमारी का प्रिंस कुमार और आशीष कुमार के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा था। बाधा बनने के कारण पत्नी ने साजिश रचकर अपने ही पति को रास्ते से हटवा दिया। लेकिन पुलिस की सबसे बड़ी विफलता लास्ट सीन थ्योरी को साबित नहीं कर पाना रहा। पुलिस प्रेम-प्रसंग को साबित करने वाले डिजिटल साक्ष्य कॉल डिटेल्स या मैसेज या किसी प्रत्यक्षदर्शी को कोर्ट में मजबूती से खड़ा नहीं कर सकी। जिसके कारण 24 फरवरी को शुरू हुई कानूनी लड़ाई महज दो हफ्तों में खत्म हो गई और तीनों आरोपी मौसम कुमारी, प्रिंस कुमार उर्फ छोटू और आशीष कुमार उर्फ कन्हैया बड़ी हो गए। बेगूसराय जिले से न्यायपालिका की तत्परता और पुलिसिया जांच की विफलता का एक बड़ा मामला सामने आया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश (तृतीय) ब्रजेश कुमार सिंह की अदालत ने बहुचर्चित मुरारी हत्याकांड में महज 15 दिनों के अंदर सुनवाई पूरी करते हुए अपना फैसला सुना दिया है। साक्ष्य और ठोस सुबूतों के अभाव में अदालत ने मृतक की पत्नी मौसम कुमारी और दो अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। फुलवरिया थाना कांड संख्या 147/25 की सुनवाई के दौरान 24 फरवरी 2026 को आरोप गठित हुए और 15 दिनों में सुनवाई पूरी हुई। जिसमें पत्नी मौसम कुमारी, प्रिंस कुमार उर्फ छोटू और आशीष कुमार उर्फ कन्हैया को बरी किया गया है। जानिए क्या है पूरा मामला मुरारी कुमार सिंह अपने ससुराल मधुरापुर (फुलवरिया थाना क्षेत्र) में 2023 से रहकर दवा का कारोबार करते थे। 20 सितंबर 2025 की सुबह करीब 8 बजे घर से निकले थे, लेकिन शाम तक वापस नहीं लौटे। उनका मोबाइल भी स्विच ऑफ आ रहा था। बाद में उनकी लाश बरामद हुई, जिसके बाद इलाके में सनसनी फैल गई। मृतक की सास मंजू देवी ने थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने अपनी ही बेटी मौसम कुमारी और उसके सहयोगियों पर हत्या का संदेह जताया था। पुलिस ने जांच के बाद दावा किया था कि यह मामला प्रेम प्रसंग से जुड़ा है और पत्नी ने अपने प्रेम संबंधों में बाधा बनने के कारण सहयोगियों के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। सुनवाई के दौरान अपर लोक अभियोजक राम प्रकाश यादव ने अभियोजन पक्ष की ओर से 9 गवाहों को पेश किया। इनमें मृतक के भाई रंजीत कुमार, नंदन कुमार, मंजू देवी (सूचिका), चंदन कुमार, रवि कुमार एवं शिव नारायण सिंह तथा डॉ. सुशील कुमार गोयनका एवं दो आईओ विनीत कुमार और विजय सहनी की भी गवाही कराई गई। प्रत्यक्ष संलिप्तता के बारे में गवाही नहीं सुनवाई के दौरान सबसे बड़ी बाधा यह रही कि किसी भी गवाह ने आरोपियों को हत्या करते हुए नहीं देखा था। गवाहों ने केवल यह कहा कि मुरारी कुमार अपनी पत्नी के प्रेम प्रसंग की बात किया करता था, लेकिन घटना के समय आरोपियों की मौजूदगी या प्रत्यक्ष संलिप्तता के बारे में कोई ठोस गवाही नहीं मिली। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य पेश करने में विफल रहा। 24 फरवरी को आरोप गठित होने के बाद जिस तेजी से सुनवाई हुई। उसने पुलिस की चार्जशीट और जांच की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए। ठोस सुबूत नहीं होने के कारण कोर्ट ने तीनों आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया। इस फैसले के बाद कानूनी गलियारों में चर्चा है कि 15 दिनों में सुनवाई पूरी होना न्यायपालिका की सक्रियता को दर्शाता है, लेकिन यह मामला उन परिवारों के लिए एक सबक भी है। जहां गवाह ऐन वक्त पर मुकर जाते हैं या पुलिस केवल परिस्थितिजनक साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) के भरोसे केस छोड़ देती है। पुलिस साबित नहीं कर सकी पुलिस ने दावा किया था कि मुरारी की पत्नी मौसम कुमारी का प्रिंस कुमार और आशीष कुमार के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा था। बाधा बनने के कारण पत्नी ने साजिश रचकर अपने ही पति को रास्ते से हटवा दिया। लेकिन पुलिस की सबसे बड़ी विफलता लास्ट सीन थ्योरी को साबित नहीं कर पाना रहा। पुलिस प्रेम-प्रसंग को साबित करने वाले डिजिटल साक्ष्य कॉल डिटेल्स या मैसेज या किसी प्रत्यक्षदर्शी को कोर्ट में मजबूती से खड़ा नहीं कर सकी। जिसके कारण 24 फरवरी को शुरू हुई कानूनी लड़ाई महज दो हफ्तों में खत्म हो गई और तीनों आरोपी मौसम कुमारी, प्रिंस कुमार उर्फ छोटू और आशीष कुमार उर्फ कन्हैया बड़ी हो गए।


