Indira Gandhi Canal जयपुर। पंजाब से इंदिरा गांधी नहर (राजस्थान फीडर) के जरिए राजस्थान आ रहे पानी पर पंजाब और राजस्थान सरकार आमने-सामने हो गई है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राजस्थान पर 1.44 लाख करोड़ रुपए का बकाया होने का दावा करते हुए कहा है कि राजस्थान या तो पैसा दे या पंजाब से पानी लेना बंद करे।
वहीं, राजस्थान सरकार ने इस मांग को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ किया है कि अंतरराज्यीय नदी जल पर किसी तरह की रॉयल्टी या फीस का कोई कानूनी आधार नहीं है। दोनों राज्यों के आमने-सामने आने से मुद्दा अब राजनीतिक रंग लेता नजर आ रहा है।
पंजाब सरकार जहां इसे ऐतिहासिक समझौते और बकाया अधिकार का मामला बता रही है, वहीं राजस्थान ने इसे राष्ट्रीय संसाधन और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा विषय बताया है। इस मामले में पंजाब सरकार ने राजस्थान सरकार को पत्र लिखकर बैठक करने के लिए कहा है।
पंजाब सरकार – ‘1920 का हक, 1960 की दलील नहीं चलेगी’
सीएम मान का कहना है कि 1920 में ब्रिटिश काल के दौरान बीकानेर महाराजा और बहावलपुर रियासत के बीच हुए समझौते के तहत राजस्थान को राजस्थान फीडर के जरिए बीकानेर-श्रीगंगानगर तक 18000 क्यूसेक पानी दिया जाता रहा, जिसके बदले प्रति एकड़ फीस तय थी। यह भुगतान 1960 तक होता रहा, लेकिन सिंधु जल समझौते के बाद राजस्थान ने पैसा देना बंद कर दिया, जबकि पानी लेना जारी रखा। मान ने तर्क दिया कि यदि राजस्थान सिंधु समझौते में भुगतान का प्रावधान नहीं होने की बात करता है, तो उसे 1920 के समझौते के आधार पर पानी लेना भी बंद करना चाहिए। या तो 1920 का समझौता समाप्त किया जाए या फिर पंजाब से पानी लेना बंद करें।
राजस्थान सरकार – ‘पानी राष्ट्रीय संसाधन, रॉयल्टी का कोई कानूनी आधार नहीं’
रॉयल्टी या सीनियरेज की मांग का कोई विधिक आधार नहीं है। वर्ष 1920 का समझौता केवल औपनिवेशिक काल की सीमित प्रशासनिक व्यवस्था था, जिससे जल पर किसी प्रकार का स्वामित्व या रॉयल्टी का अधिकार सिद्ध नहीं होता। स्वतंत्रता के बाद अंतरराज्यीय नदियों का नियंत्रण केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और नदी जल को राष्ट्रीय संसाधन माना गया है। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 1955 और 1981 के जल बंटवारा समझौतों के तहत राजस्थान को निर्धारित मात्रा में पानी आवंटित किया गया है, जिनमें किसी प्रकार की रॉयल्टी का प्रावधान नहीं है। वर्तमान में जल वितरण बीबीएमबी के माध्यम से केंद्र की निगरानी में होता है, ऐसे में किसी राज्य की ओर से अलग से शुल्क मांगना उचित नहीं है। यदि रॉयल्टी का सिद्धांत लागू किया जाता है तो इससे देशभर में अंतरराज्यीय जल विवाद और अधिक बढ़ सकते हैं।
आगे क्या
यदि यह मामला राजनीतिक या सियासी उद्देश्य से नहीं उठाया गया है तो इसमें केन्द्र सरकार दखल दे सकती है। राजस्थान भी केन्द्रीय जल आयोग के सामने इस पर आपत्ति दर्ज कराए। राजस्थान सतलुज-यमुना लिंक नहर के जरिए पानी की मांग करता रहा है, इस दावे पर सियासी असर पड़ सकता है।
समझौते में पानी के बदले फीस तय
राजस्थान फीडर से बीकानेर-गंगानगर पानी जाता है। 1920 के समझौते के तहत पानी के बदले फीस तय की गई थी और 1960 तक यह जारी भी रहा। इसके बाद बिना किसी वैध आधार के पैसा देना बंद कर दिया। इसके बाद सिंधु जल समझौता हुआ, जिसमें इस फीस का जिक्र नहीं किया। राजस्थान या तो बकाया पैसा दे या पानी लेना बंद कर दे।
-भगवंत मान, मुख्यमंत्री, पंजाब (पंजाब में मीडिया को बताया)
राजस्थान को विधिसम्मत जल आवंटन हुआ
पंजाब के मुख्यमंत्री ने जो रॉयल्टी (फीस) की मांग की है, वह पूरी तरह निराधार है। अंतरराज्यीय नदियों का जल राष्ट्रीय संसाधन है, जिस पर किसी एक राज्य का स्वामित्व नहीं हो सकता। 1955 और 1981 के समझौतों के तहत राजस्थान को विधिसम्मत जल आवंटन हुआ है। ऐसे में अलग से किसी शुल्क की मांग न तो कानूनी है और न ही व्यावहारिक।
-सुरेश सिंह रावत, जल संसाधन मंत्री, राजस्थान


