Antimicrobial Resistance: रोज खा रहे हैं जहर? अंडे, दूध और चिकन पर बड़ा खुलासा, आपकी थाली में पहुंच रहा है एंटीबायोटिक

Antimicrobial Resistance: रोज खा रहे हैं जहर? अंडे, दूध और चिकन पर बड़ा खुलासा, आपकी थाली में पहुंच रहा है एंटीबायोटिक

Antimicrobial Resistance: India Karuna Collaborative की एक नई रिपोर्ट ने एक ऐसी सच्चाई सामने रखी है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।जानवरों के साथ होने वाला व्यवहार सीधे हमारी सेहत और पर्यावरण को प्रभावित करता है। रिपोर्ट साफ कहती है कि अगर हम सोचते हैं कि animal welfare (जानवरों की भलाई) से हमारा कोई लेना-देना नहीं है, तो यह गलत है। क्योंकि जो अंडे, चिकन और दूध हम रोज खाते हैं, उनमें उसी सिस्टम का असर दिखता है।

अंडों में छिपा खतरा

आजकल ज्यादातर अंडे बड़े-बड़े पोल्ट्री फार्म में पैदा होते हैं, जहां मुर्गियों को बहुत छोटे पिंजरों में रखा जाता है। इन पिंजरों का साइज लगभग A4 पेपर जितना होता है। हजारों मुर्गियां एक ही शेड में ठूंस-ठूंस कर रखी जाती हैं। ऐसे माहौल में अगर एक मुर्गी बीमार होती है, तो बीमारी तेजी से फैलती है। इसी वजह से फार्म में लगातार एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं। समस्या ये है कि ये दवाओं के असर खत्म होने का जो वेटिंग टाइम होता है, वह अक्सर फॉलो नहीं किया जाता। इसका मतलब है कि अंडों में एंटीबायोटिक के अंश (residue) रह जाते हैं, जो हमारे शरीर में जाकर नुकसान कर सकते हैं। साथ ही गंदगी के कारण Salmonella infection का खतरा भी बढ़ जाता है, जो फूड पॉइजनिंग की बड़ी वजह है।

चिकन में भी वही कहानी

जो चिकन हम खाते हैं, उसे ब्रॉयलर कहा जाता है। इन्हें भी बेहद छोटे और गंदे माहौल में पाला जाता है। ये मुर्गियां ठीक से चल भी नहीं पातीं। इनमें भी बीमारी रोकने के लिए लगातार एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में करीब 70% एंटीबायोटिक्स जानवरों के पालन में इस्तेमाल हो रही हैं। इससे एक बड़ी समस्या पैदा हो रही है जिसे Antimicrobial Resistance कहते हैं, यानि दवाइयां असर करना बंद कर देती हैं।

दूध भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक जो दूध हम रोज पीते हैं, उसकी जांच उतनी सख्त नहीं होती। डेयरी फार्म में गाय-भैंस को भी अक्सर गंदे और तंग माहौल में रखा जाता है। इससे उन्हें Mastitis जैसी बीमारी हो जाती है, जो 45% तक पशुओं में पाई जाती है। इस बीमारी में दूध में पस (pus cells) तक मिल सकते हैं। इंटरनेशनल नियमों के हिसाब से दूध में एक लिमिट होती है, लेकिन भारत में घरेलू खपत के लिए ऐसे सख्त नियम लागू नहीं हैं।

क्या है समाधान?

रिपोर्ट कहती है कि हमें अपने खाने के चुनाव पर ध्यान देना होगा। फ्री-रेंज अंडे थोड़े बेहतर होते हैं, लेकिन अभी भारत में इनकी संख्या बहुत कम है। इसके अलावा प्लांट-बेस्ड फूड (शाकाहारी विकल्प) और नई तकनीक से बने प्रोटीन भी अच्छे विकल्प हो सकते हैं, जो सेहत और पर्यावरण दोनों के लिए बेहतर हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *