5 करोड़ रुपए के घाटे का बजट पारित:दरभंगा नगर निगम का बजट बना विवाद का कारण, पार्षद बोले- ये अनदेखी है

5 करोड़ रुपए के घाटे का बजट पारित:दरभंगा नगर निगम का बजट बना विवाद का कारण, पार्षद बोले- ये अनदेखी है

दरभंगा नगर निगम में करीब 5 करोड़ रुपये के घाटे वाला बजट पारित हुआ है। इसके बाद जनप्रतिनिधियों ने नाराजगी जताते हुए इसे प्रशासनिक विफलता और जनहित की अनदेखी करार दिया है। पार्षदों का कहना है कि जब शहर पहले से जलजमाव, पेयजल संकट, कचरा प्रबंधन की बदहाल स्थिति और सड़क-नाला निर्माण की धीमी गति जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे समय में घाटे का बजट यह दर्शाता है कि निगम के पास न तो राजस्व बढ़ाने की ठोस योजना है और न ही व्यय को संतुलित करने की स्पष्ट रणनीति। नगर निगम की ओर से वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए प्रस्तुत प्रस्तावित बजट बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007, बिहार नगरपालिका लेखा नियमावली 2014 और महापौर और नगर आयुक्त के निर्देशों के अनुरूप तैयार किया गया है। सशक्त स्थायी समिति की 7 मार्च की बैठक में संशोधन के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया। आंकड़ों से स्पष्ट है कि आय की तुलना में व्यय अधिक रखा गया है, जिससे निगम की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। मामले को और गंभीर बनाते हुए यह सामने आया है कि 14वें, 15वें एवं 5वें वित्त आयोग के साथ-साथ ‘जल-जीवन-हरियाली’ जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के तहत प्राप्त कुल 24 करोड़ 63 लाख 51 हजार रुपये की राशि का समय पर उपयोग नहीं किया जा सका। राशि जल निकासी, पेयजल आपूर्ति, हरित क्षेत्र विस्तार और शहरी आधारभूत संरचना के विकास के लिए दी गई थी। राशि का उपयोग न हो पाना और वापस होना निगम की कार्यक्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। ऐच्छिक कोष को भी दोगुना करने की मांग बजट बैठक के दौरान एक और अहम प्रस्ताव ने बहस को तेज कर दिया। स्थायी समिति सदस्य नारद यादव ने पार्षदों के ऐच्छिक कोष की राशि को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये करने का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही महापौर और उपमहापौर के ऐच्छिक कोष को भी दोगुना करने की मांग की गई। इस प्रस्ताव को लेकर बैठक में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं, जहां कुछ पार्षदों ने इसे विकास कार्यों के लिए जरूरी बताया, वहीं कई ने इसे वित्तीय दबाव के बीच अनुचित प्राथमिकता करार दिया। बजट पर चर्चा के दौरान पार्षदों ने कई खामियां गिनाईं। उनका आरोप है कि होल्डिंग टैक्स वसूली में सुधार, नए आय स्रोत विकसित करने और वित्तीय अनुशासन लागू करने जैसे अहम मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है। वहीं, खर्च की प्राथमिकताओं में भी असंतुलन देखने को मिला, जहां आवश्यक जनहित योजनाओं के बजाय गैर-प्राथमिक मदों पर अधिक ध्यान दिया गया। वार्डों के बीच योजनाओं के असमान वितरण का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा। कई पार्षदों ने आरोप लगाया कि कुछ वार्डों को विकास योजनाओं से वंचित रखा गया, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा हो रहा है। बजट निर्माण प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और जनप्रतिनिधियों की सीमित भागीदारी को लेकर भी असंतोष व्यक्त किया गया। इस दौरान पार्षद पूजा मंडल ने आपत्ति दर्ज कराते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की। बैठक में नफीशुल हक रिंकू, राजीव सिंह, नवीन सिन्हा, मुकेश महासेठ, सुचित्रा रानी, शंकर प्रसाद जायसवाल, राकेश रोशन चौधरी और मंजू देवी समेत कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। पार्षदों ने निगम प्रशासन से मांग की है कि घाटे को कम करने के लिए तत्काल ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए। साथ ही जलजमाव, पेयजल, सफाई और सड़क जैसी बुनियादी समस्याओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देने, सभी वार्डों में समान रूप से विकास योजनाएं लागू करने और बजट प्रक्रिया को पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाने की जरूरत बताई गई। जनप्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह वित्तीय अव्यवस्था आने वाले समय में शहर के समग्र विकास को प्रभावित करेगी और आम लोगों की समस्याएं और बढ़ेंगी। दरभंगा नगर निगम में करीब 5 करोड़ रुपये के घाटे वाला बजट पारित हुआ है। इसके बाद जनप्रतिनिधियों ने नाराजगी जताते हुए इसे प्रशासनिक विफलता और जनहित की अनदेखी करार दिया है। पार्षदों का कहना है कि जब शहर पहले से जलजमाव, पेयजल संकट, कचरा प्रबंधन की बदहाल स्थिति और सड़क-नाला निर्माण की धीमी गति जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे समय में घाटे का बजट यह दर्शाता है कि निगम के पास न तो राजस्व बढ़ाने की ठोस योजना है और न ही व्यय को संतुलित करने की स्पष्ट रणनीति। नगर निगम की ओर से वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए प्रस्तुत प्रस्तावित बजट बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007, बिहार नगरपालिका लेखा नियमावली 2014 और महापौर और नगर आयुक्त के निर्देशों के अनुरूप तैयार किया गया है। सशक्त स्थायी समिति की 7 मार्च की बैठक में संशोधन के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया। आंकड़ों से स्पष्ट है कि आय की तुलना में व्यय अधिक रखा गया है, जिससे निगम की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। मामले को और गंभीर बनाते हुए यह सामने आया है कि 14वें, 15वें एवं 5वें वित्त आयोग के साथ-साथ ‘जल-जीवन-हरियाली’ जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के तहत प्राप्त कुल 24 करोड़ 63 लाख 51 हजार रुपये की राशि का समय पर उपयोग नहीं किया जा सका। राशि जल निकासी, पेयजल आपूर्ति, हरित क्षेत्र विस्तार और शहरी आधारभूत संरचना के विकास के लिए दी गई थी। राशि का उपयोग न हो पाना और वापस होना निगम की कार्यक्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। ऐच्छिक कोष को भी दोगुना करने की मांग बजट बैठक के दौरान एक और अहम प्रस्ताव ने बहस को तेज कर दिया। स्थायी समिति सदस्य नारद यादव ने पार्षदों के ऐच्छिक कोष की राशि को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये करने का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही महापौर और उपमहापौर के ऐच्छिक कोष को भी दोगुना करने की मांग की गई। इस प्रस्ताव को लेकर बैठक में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं, जहां कुछ पार्षदों ने इसे विकास कार्यों के लिए जरूरी बताया, वहीं कई ने इसे वित्तीय दबाव के बीच अनुचित प्राथमिकता करार दिया। बजट पर चर्चा के दौरान पार्षदों ने कई खामियां गिनाईं। उनका आरोप है कि होल्डिंग टैक्स वसूली में सुधार, नए आय स्रोत विकसित करने और वित्तीय अनुशासन लागू करने जैसे अहम मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है। वहीं, खर्च की प्राथमिकताओं में भी असंतुलन देखने को मिला, जहां आवश्यक जनहित योजनाओं के बजाय गैर-प्राथमिक मदों पर अधिक ध्यान दिया गया। वार्डों के बीच योजनाओं के असमान वितरण का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा। कई पार्षदों ने आरोप लगाया कि कुछ वार्डों को विकास योजनाओं से वंचित रखा गया, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा हो रहा है। बजट निर्माण प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और जनप्रतिनिधियों की सीमित भागीदारी को लेकर भी असंतोष व्यक्त किया गया। इस दौरान पार्षद पूजा मंडल ने आपत्ति दर्ज कराते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की। बैठक में नफीशुल हक रिंकू, राजीव सिंह, नवीन सिन्हा, मुकेश महासेठ, सुचित्रा रानी, शंकर प्रसाद जायसवाल, राकेश रोशन चौधरी और मंजू देवी समेत कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। पार्षदों ने निगम प्रशासन से मांग की है कि घाटे को कम करने के लिए तत्काल ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए। साथ ही जलजमाव, पेयजल, सफाई और सड़क जैसी बुनियादी समस्याओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देने, सभी वार्डों में समान रूप से विकास योजनाएं लागू करने और बजट प्रक्रिया को पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाने की जरूरत बताई गई। जनप्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह वित्तीय अव्यवस्था आने वाले समय में शहर के समग्र विकास को प्रभावित करेगी और आम लोगों की समस्याएं और बढ़ेंगी।  

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