गोमती नगर स्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के प्रेक्षागृह में बुधवार शाम महाभारत के सबसे जटिल और त्रासदीपूर्ण नायक कर्ण की गाथा ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान और अवासखर सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 15 दिवसीय नाट्य कार्यशाला के समापन पर महाकवि भास के संस्कृत नाटक ‘कर्णभारम्’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। नाटक की शुरुआत महाभारत युद्ध के सोलहवें दिन से होती है। द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद कर्ण कौरव सेना का सेनापति बनता है। जब कर्ण अपने सारथी शल्य के साथ रणभूमि की ओर बढ़ता है, तो उसके चेहरे पर वीरता से ज्यादा मानसिक द्वंद्व और पीड़ा साफ नजर आती है। संवादों के माध्यम से वह अपने जीवन के संघर्ष, अपमान और दुविधाओं को साझा करता है। फ्लैशबैक दृश्यों ने बांधे रखा ध्यान नाटक के फ्लैशबैक दृश्यों ने दर्शकों को अंत तक जोड़े रखा। परशुराम द्वारा कर्ण को दिया गया श्राप, कुंती का मोह और कृष्ण द्वारा कर्ण को पांडव पक्ष में लाने का प्रयास—इन सभी दृश्यों ने कर्ण के अडिग चरित्र और उसके भीतर के द्वंद्व को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। दानवीर कर्ण का भावुक चरम सबसे मार्मिक दृश्य तब आया जब इंद्र ब्राह्मण वेश में आकर कर्ण से उसका कवच और कुंडल मांगते हैं। अपनी मृत्यु निश्चित जानते हुए भी कर्ण मुस्कुराते हुए सब कुछ दान कर देता है। अंतिम दृश्य में जब रथ का पहिया धंसने पर निहत्थे कर्ण पर अर्जुन बाण चलाता है, तो पूरा प्रेक्षागृह सन्नाटे में डूब गया। मृत्यु के क्षण में भी कर्ण का सोने का दांत दान करना उसकी महानता को दर्शाता है। कलाकारों ने डाली जान मंचन में मनोज तिवारी ने कर्ण की भूमिका में प्रभावशाली अभिनय किया। शल्य के रूप में सुरेश श्रीवास्तव, परशुराम के रूप में उन्नत बहादुर सिंह, कुंती की भूमिका में संतोषी और कृष्ण के रूप में केशव ने भी अपने किरदारों को जीवंत किया। निर्देशन संतोष कुमार प्रजापति का रहा, जबकि संगीत और प्रकाश संयोजन ने पूरे माहौल को और अधिक सजीव बना दिया।


