बीसीजी रिपोर्ट : अंतिम, यूएस में भारतवंशियों का कितना दमखम?:सत्ता से दूर, अमेरिका के निचले सदन में 1%, सीनेट में कोई भारतवंशी नहीं

बीसीजी रिपोर्ट : अंतिम, यूएस में भारतवंशियों का कितना दमखम?:सत्ता से दूर, अमेरिका के निचले सदन में 1%, सीनेट में कोई भारतवंशी नहीं

जहां पैसे और नॉलेज की बात आती है तो भारतीय मूल के अमेरिकी अपनी जनसंख्या से कहीं आगे हैं, लेकिन जब सत्ता और प्रतिनिधित्व की बात होती है, तो वहां वे अपनी जनसंख्या के अनुपात तक भी नहीं पहुंचे हैं। यानी यह समुदाय अमेरिका को बनाने में तो बड़ी भूमिका निभा रहा है, लेकिन अमेरिका की दिशा तय करने में उसकी भूमिका अभी बहुत छोटी है। बीसीजी और इंडियास्पोरा द्वारा तैयार रिपोर्ट ‘अमेरिका में भारतवंशियों के दमखम की कहानी’ के आखिरी हिस्से में पढ़िए, अमेरिका की सत्ता में भारतवंशियों का कितना वजन है? अमेरिका में भारतवंशियों की राजनीतिक यात्रा 1955 में एक सांसद से शुरू होकर 6 सांसदों तक ही पहुंच पाई है। मतलब अमेरिकी संसद में अब भी भारतवंशियों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। उच्च सदन सीनेट में तो एक भी भारतवंशी नहीं है। 2024 के चुनावों के बाद निचले सदन में भारतवंशियों की संख्या बढ़कर 6 हो गई। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने काश पटेल को एफबीआई डायरेक्टर बनाया है। डॉक्टर जय भट्टाचार्य को नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया है। श्रीराम कृष्णन को सरकार के लिए एआई नीति मार्गदर्शन के लिए अहम भूमिका सौंपी गई, जो भारतवंशियों की बढ़ती मौजूदगी दर्शाता है। संसद; 435 सीटों में 6 पर ही भारतवंशी – अमेरिकी संसद के निचले सदन (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) की कुल 435 सीटों में से केवल 6 सीटों (1.4%) पर भारतवंशी।
– 2012 से पहले केवल दो भारतवंशी पहुंचे थे। 1955 में दलीप सिंह सौंद और 2004 में बॉबी जिंदल। 2012 में अमी बेरा के बाद धीरे-धीरे यह संख्या अब आधा दर्जन हो पाई है।
– उच्च सदन यानी सीनेट में इस वक्त एक भी भारतवंशी नहीं है। 100 सीनेटर होते हैं, 50 राज्यों से 2-2, निचले सदन से पास बिल में सीनेट की मुहर जरूरी।
– कमला हैरिस 2016 में पहली भारतीय-अमेरिकी उच्च सदन की सदस्य बनीं। 2020 में उपराष्ट्रपति बनने के बाद उच्च सदन में कोई भारतवंशी नहीं है। शीर्ष सरकारी एजेंसियों में… सिर्फ 3% – हेल्थकेयर और साइंस के क्षेत्र में भारतवंशियों का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन ‘सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल’ (सीडीसी) और ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ (एनएसएफ) जैसी अमेरिका की शीर्ष सरकारी एजेंसियों के उच्च पदों पर केवल 3% भारतवंशी।
– मतलब ये कि काम करने की जगह पर तो भारतवंशियों की हिस्सेदारी 10% है, पर फैसले लेने वाली जगह पर 3% ही है।
– किस शोध को पैसा मिले, किस विश्वविद्यालय को अनुदान मिले, किस तकनीक पर निवेश हो… ये सब यही संस्थान तय करते हैं।
– इन पदों पर भारतीय-अमेरिकी कम होने से उनके समुदाय की जरूरतें, उनके शोध के विषय व प्राथमिकताएं पीछे रह जाती हैं। जबकि चुनाव में ये बड़े गेम चेंजर हैं – अमेरिका के कुल योग्य वोटर्स में भारतवंशियों की हिस्सेदारी भले ही 1% है, लेकिन वे ‘स्विंग स्टेट्स’ (चुनावों में निर्णायक माने जाने वाले राज्य) में अपना खासा प्रभाव रखते हैं। ये वोटर अब इमिग्रेशन रिफॉर्म, नागरिक अधिकारों और भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों जैसे मुद्दों पर मुखर होकर मतदान कर रहे हैं। – रिपोर्ट कहती है कि ये मतदाता करीबी मुकाबलों में परिणाम तय करने या पलटने में बहुत अहम।
– 2024 के रिपब्लिकन प्राथमिक चुनाव में निक्की हेली और विवेक रामास्वामी, दोनों भारतीय मूल के उम्मीदवार थे। डेमोक्रेट में कमला हैरिस राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी थीं। ये इस समुदाय की राजनीतिक अहमियत बताता है। आईएमएफ, डब्ल्यूएचओ और वर्ल्ड बैंक में अपनी छाप छोड़ी भारतीय मूल के पेशेवर वैश्विक संस्थानों में महत्वपूर्ण नेतृत्व निभा रहे हैं। आईएमएफ में गीता गोपीनाथ ने कोविड में आर्थिक पुनरुद्धार और टीकाकरण रणनीतियों को दिशा दी। आईएमएफ के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने 2008 के वित्तीय संकट की पहले से चेतावनी देकर वैश्विक वित्तीय नीति को प्रभावित किया। विश्व बैंक में इंदरमीत गिल और ममता मूर्ति ने विकास नीतियों को नए विचारों के साथ मजबूत किया। 2023 से अध्यक्ष अजय बंगा जलवायु परियोजनाओं व गरीबी उन्मूलन पर ध्यान दे रहे हैं। डब्ल्यूएचओ में सौम्या स्वामीनाथन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में वैश्विक सहयोग मजबूत किया।

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