दिसंबर 2025। चुनाव नतीजे के 10 दिन बाद विधानसभा का शीतकालीन सत्र चल रहा था। सभी विधायक शपथ ले लिए थे। इस बीच अचानक कांग्रेस के नए विधायकों के साथ NDA के बड़े नेताओं की सीक्रेट मीटिंग की बात लीक हो गई। मीटिंग के बाद ये चर्चा होने लगी कि कांग्रेस के विधायक कभी भी टूट कर NDA के किसी दल का दामन थाम सकते हैं। तब सभी इस बात से हैरान थे कि 202 विधायकों की बंपर जीत के बाद NDA आखिर 6 विधायकों वाली कांग्रेस में सेंधमारी क्यों करेगी? लेकिन, तब किसी को इस बात की भनक नहीं थी कि NDA ने मार्च में होने वाले राज्यसभा चुनाव की तैयारी दिसंबर में शुरू कर दी थी। अब नतीजे सामने हैं। दैनिक भास्कर के एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में समझिए कैसे जरूरी नंबर्स कम होने के बाद भी बीजेपी ने अपने प्रदेश महामंत्री शिवेश राम को 5वां कैंडिडेट बनाकर दांव खेला। किस तरह कांग्रेस के विधायकों को तोड़ा गया। NDA के मिशन 5-0 के सूत्रधार कौन-कौन हैं। क्यों कांग्रेस के विधायक ही टूटे? सबसे पहले समझिए हुआ क्या… सोमवार को राज्यसभा की 5 सीटों के लिए चुनाव हुआ। इसमें 6 कैंडिडेट मैदान में थे। NDA की तरफ से 5 कैंडिडेट CM नीतीश कुमार, BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, RLM के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा, केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर और BJP के प्रदेश महामंत्री शिवेश राम। जबकि RJD की तरफ से अमरेंद्र धारी सिंह को उम्मीदवार बनाया गया था। एक विधायक को जीताने के लिए 41 विधायकों के वोट की जरूरत थी। NDA के 202 विधायक हैं। ऐसे में 5 सीट जीतने के लिए 3 विधायक कम पड़ रहे थे। जबकि AIMIM और BSP का समर्थन मिलने के बाद RJD के कैंडिडेट की जीत आसान लग रही थी। लेकिन, चुनाव से पहले एकजुट दिख रहे विपक्ष को झटका तब लगा जब कांग्रेस के 3 विधायक और RJD के एक विधायक वोट डालने ही नहीं पहुंचे। ऐसा नहीं कि ये सब अचानक हुआ। एक-एक चीज पूरी प्लानिंग के तहत हुई। अब इस ऑपरेशन के किरदार को समझिए सम्राट की लीडरशिप में NDA के बड़े नेताओं ने फिल्डिंग सेट की आखिर चुनाव के तुरंत बाद ऑपरेशन लोटस सफल कैसे हुआ? इसके लिए हमने महागठबंधन और NDA के 10 से ज्यादा विधायक और प्रदेश स्तर के कई नेताओं से बात की और समझा। बातचीत में एक बात कॉमन निकली कि इसकी तैयारी दिसंबर से ही शुरू कर दी गई थी। इसमें एक नेता नहीं, बल्कि NDA के कई बड़े नेता शामिल रहे। महागठबंधन की एक पार्टी के विधायक ने भास्कर को बताया कि उनकी पहली मीटिंग जदयू नेता और मंत्री अशोक चौधरी के आवास पर हुई थी। उन्हें प्रलोभन दिया गया था कि उस पार्टी का अब कोई फ्यूचर नहीं है। उसे छोड़कर NDA के पाले में आ जाएं। विधायकों को तोड़ने के लिए उनकी जाति के नेता भी लगे हुए थे। इसके अलावा नेताओं के पुराने संबंध को भुनाया गया। इतना ही नहीं, इलाकावार भी नेताओं को जिम्मेदारी दी गई थी। इन सबकी अगुआई डिप्टी CM सम्राट चौधरी कर रहे थे। नेताओं के साथ फाइनल डील सम्राट ही कर रहे थे। इनकी कोशिश ज्यादा विधायकों को तोड़ने की थी, लेकिन कुछ विधायकों के सामने इनकी दाल नहीं गल पाई। सीनियर IAS भी डील में शामिल रहे, योजनाओं का प्रलोभन दिया गया इस ऑपरेशन में केवल नेताओं को नहीं लगाया गया था, बल्कि सीनियर स्तर के IAS भी इस पूरे डील में शामिल रहे हैं। कांग्रेस के एक विधायक ने भास्कर को बताया कि उनसे लगातार दो बार सीनियर IAS की मीटिंग हुई। उन्हें इलाके की योजनाओं के अलावा कई तरह का प्रलोभन दिए गए। कई विधायकों को भय भी दिखाया गया। इसके बाद जाकर मिशन सक्सेसफुल हुआ। कांग्रेस ही सॉफ्ट टारगेट क्यों हुई? सब कुछ जानकर अनजान बने रहे नेता बिहार विधानसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस लीडरशिप क्राइसिस से जूझ रही है। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम अपना चुनाव हार गए। भीतरी कलह के कारण प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ज्यादातर बिहार से बाहर ही रह रहे हैं। इसका खामियाजा ये हुआ कि चुनाव के 100 दिन से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी कांग्रेस अभी तक अपना विधायक दल का नेता नहीं चुन पाई है। कांग्रेस के एक विधायक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कांग्रेस लीडरशिप को इस बात की जानकारी थी कि उनके विधायक को तोड़ने की कोशिश की जा रही है। विधायकों ने बताया कि सभी से संपर्क किया जा रहा है। इसके बाद भी कोई सीनियर नेता इस मुद्दे पर सीरियस नहीं हुए। 13 मार्च को विधायकों की एक औपचारिक बैठक करा दी गई, लेकिन इसमें कोई भी सीनियर लीडर शामिल नहीं हुए। लापरवाही इतनी कि कांग्रेस के विधायकों का कायदे से महागठबंधन के कैंडिडेट से परिचय तक नहीं कराया गया था। अब आखिर में NDA को जीत दिलाने वाले महागठबंधन के विधायक को जान लीजिए 1- फैसल रहमान: मां बीमार, सदस्यता पर खतरा मंडरा रहा RJD विधायक फैसल रहमान 2025 के विधानसभा चुनाव में पूर्वी चंपारण जिले के ढाका सीट से जीते हैं। उन्हें सिर्फ 178 वोटों से जीत मिली। उनकी इस जीत को यहीं से BJP प्रत्याशी पवन जायसवाल ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। इन पर फर्जी वोटिंग कराने का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि इनके पक्ष में 400 ऐसे वोट पड़े जो वोटिंग के दिन विदेश में थे। ऐसे में इनकी सदस्यता को ही खतरा है। हालांकि, इन्होंने पार्टी के नेताओं को बताया है कि इनकी मां बीमार हैं और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है। वे वोट देने आना चाहते थे, लेकिन मां की स्थिति ज्यादा बिगड़ने के कारण नहीं आ पाए। 2-सुरेंद्र प्रसाद: उपेंद्र कुशवाहा के साथ वफादारी दिखाई कांग्रेस विधायक सुरेंद्र प्रसाद पश्चिम चंपारण जिला के वाल्मीकिनगर से पहली बार विधायक चुने गए हैं। 2015 में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLSP (अब RLM) से NDA की तरफ से चुनाव लड़ चुके हैं। तब हार गए थे। कुशवाहा समाज से आते हैं। उपेंद्र कुशवाहा के करीबी माने जाते हैं। सुरेंद्र कुशवाहा को आखिरी समय में कांग्रेस की तरफ से टिकट मिला था। सूत्रों की मानें तो उन्हें कांग्रेस से टिकट दिलाने में भी उपेंद्र कुशवाहा का अहम रोल रहा है। ऐसे में जब उपेंद्र को उनकी जरूरत पड़ी तो उन्होंने अपनी वफादारी उनके लिए दिखाई है। 3- मनोज विश्वास- कांग्रेस की पॉलिटिक्स में सेट नहीं हो पा रहे थे कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास फारबिसगंज से पहली बार विधायक बने हैं। केवट मतलब EBC समाज से आते हैं। मनोज विश्वास ने BJP के विद्यासागर केशरी को 221 वोटों से हराया है। इससे पहले JDU और RJD में रह चुके हैं। चुनाव से कुछ वक्त पहले RJD से कांग्रेस में आए थे। कांग्रेस में सेट नहीं हो पा रहे थे। कांग्रेस के कई नेता इन्हें फारबिसगंज से चुनाव लड़ाने के पक्ष में भी नहीं थे। अब मनोज अपने पॉलिटिकल करियर को देखते हुए NDA के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं। 4- मनोहर प्रसाद सिंह-नीतीश का कर्ज अदा किया, नेता नहीं बनाने से नाराज कांग्रेस विधायक मनोहर प्रसाद सिंह मनिहारी से चौथी बार विधायक बने हैं। वह JDU के पुराने नेता रहे हैं। IPS अफसर से रिटायरमेंट के बाद 2005 में JDU से जुड़े। 2010 में JDU के टिकट पर चुनाव जीते थे। 2015 विधानसभा चुनाव में गठबंधन के तहत मनिहारी सीट कांग्रेस को चली गई। नीतीश कुमार ने मनोहर प्रसाद को कांग्रेस में शामिल होने को कहा और कांग्रेस से सिंबल दिलवाया। तब से मनोहर कांग्रेस से चुनाव लड़े और जीते। अब जब नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं तो उन्होंने NDA को अपना समर्थन देकर नीतीश कुमार का कर्ज अदा कर दिया। ये कांग्रेस के विधायक दल का नेता भी बनना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस उन्हें ये पद देने से बच रही थी। इसके कारण भी उनकी नाराजगी की चर्चा थी। दिसंबर 2025। चुनाव नतीजे के 10 दिन बाद विधानसभा का शीतकालीन सत्र चल रहा था। सभी विधायक शपथ ले लिए थे। इस बीच अचानक कांग्रेस के नए विधायकों के साथ NDA के बड़े नेताओं की सीक्रेट मीटिंग की बात लीक हो गई। मीटिंग के बाद ये चर्चा होने लगी कि कांग्रेस के विधायक कभी भी टूट कर NDA के किसी दल का दामन थाम सकते हैं। तब सभी इस बात से हैरान थे कि 202 विधायकों की बंपर जीत के बाद NDA आखिर 6 विधायकों वाली कांग्रेस में सेंधमारी क्यों करेगी? लेकिन, तब किसी को इस बात की भनक नहीं थी कि NDA ने मार्च में होने वाले राज्यसभा चुनाव की तैयारी दिसंबर में शुरू कर दी थी। अब नतीजे सामने हैं। दैनिक भास्कर के एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में समझिए कैसे जरूरी नंबर्स कम होने के बाद भी बीजेपी ने अपने प्रदेश महामंत्री शिवेश राम को 5वां कैंडिडेट बनाकर दांव खेला। किस तरह कांग्रेस के विधायकों को तोड़ा गया। NDA के मिशन 5-0 के सूत्रधार कौन-कौन हैं। क्यों कांग्रेस के विधायक ही टूटे? सबसे पहले समझिए हुआ क्या… सोमवार को राज्यसभा की 5 सीटों के लिए चुनाव हुआ। इसमें 6 कैंडिडेट मैदान में थे। NDA की तरफ से 5 कैंडिडेट CM नीतीश कुमार, BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, RLM के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा, केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर और BJP के प्रदेश महामंत्री शिवेश राम। जबकि RJD की तरफ से अमरेंद्र धारी सिंह को उम्मीदवार बनाया गया था। एक विधायक को जीताने के लिए 41 विधायकों के वोट की जरूरत थी। NDA के 202 विधायक हैं। ऐसे में 5 सीट जीतने के लिए 3 विधायक कम पड़ रहे थे। जबकि AIMIM और BSP का समर्थन मिलने के बाद RJD के कैंडिडेट की जीत आसान लग रही थी। लेकिन, चुनाव से पहले एकजुट दिख रहे विपक्ष को झटका तब लगा जब कांग्रेस के 3 विधायक और RJD के एक विधायक वोट डालने ही नहीं पहुंचे। ऐसा नहीं कि ये सब अचानक हुआ। एक-एक चीज पूरी प्लानिंग के तहत हुई। अब इस ऑपरेशन के किरदार को समझिए सम्राट की लीडरशिप में NDA के बड़े नेताओं ने फिल्डिंग सेट की आखिर चुनाव के तुरंत बाद ऑपरेशन लोटस सफल कैसे हुआ? इसके लिए हमने महागठबंधन और NDA के 10 से ज्यादा विधायक और प्रदेश स्तर के कई नेताओं से बात की और समझा। बातचीत में एक बात कॉमन निकली कि इसकी तैयारी दिसंबर से ही शुरू कर दी गई थी। इसमें एक नेता नहीं, बल्कि NDA के कई बड़े नेता शामिल रहे। महागठबंधन की एक पार्टी के विधायक ने भास्कर को बताया कि उनकी पहली मीटिंग जदयू नेता और मंत्री अशोक चौधरी के आवास पर हुई थी। उन्हें प्रलोभन दिया गया था कि उस पार्टी का अब कोई फ्यूचर नहीं है। उसे छोड़कर NDA के पाले में आ जाएं। विधायकों को तोड़ने के लिए उनकी जाति के नेता भी लगे हुए थे। इसके अलावा नेताओं के पुराने संबंध को भुनाया गया। इतना ही नहीं, इलाकावार भी नेताओं को जिम्मेदारी दी गई थी। इन सबकी अगुआई डिप्टी CM सम्राट चौधरी कर रहे थे। नेताओं के साथ फाइनल डील सम्राट ही कर रहे थे। इनकी कोशिश ज्यादा विधायकों को तोड़ने की थी, लेकिन कुछ विधायकों के सामने इनकी दाल नहीं गल पाई। सीनियर IAS भी डील में शामिल रहे, योजनाओं का प्रलोभन दिया गया इस ऑपरेशन में केवल नेताओं को नहीं लगाया गया था, बल्कि सीनियर स्तर के IAS भी इस पूरे डील में शामिल रहे हैं। कांग्रेस के एक विधायक ने भास्कर को बताया कि उनसे लगातार दो बार सीनियर IAS की मीटिंग हुई। उन्हें इलाके की योजनाओं के अलावा कई तरह का प्रलोभन दिए गए। कई विधायकों को भय भी दिखाया गया। इसके बाद जाकर मिशन सक्सेसफुल हुआ। कांग्रेस ही सॉफ्ट टारगेट क्यों हुई? सब कुछ जानकर अनजान बने रहे नेता बिहार विधानसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस लीडरशिप क्राइसिस से जूझ रही है। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम अपना चुनाव हार गए। भीतरी कलह के कारण प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ज्यादातर बिहार से बाहर ही रह रहे हैं। इसका खामियाजा ये हुआ कि चुनाव के 100 दिन से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी कांग्रेस अभी तक अपना विधायक दल का नेता नहीं चुन पाई है। कांग्रेस के एक विधायक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कांग्रेस लीडरशिप को इस बात की जानकारी थी कि उनके विधायक को तोड़ने की कोशिश की जा रही है। विधायकों ने बताया कि सभी से संपर्क किया जा रहा है। इसके बाद भी कोई सीनियर नेता इस मुद्दे पर सीरियस नहीं हुए। 13 मार्च को विधायकों की एक औपचारिक बैठक करा दी गई, लेकिन इसमें कोई भी सीनियर लीडर शामिल नहीं हुए। लापरवाही इतनी कि कांग्रेस के विधायकों का कायदे से महागठबंधन के कैंडिडेट से परिचय तक नहीं कराया गया था। अब आखिर में NDA को जीत दिलाने वाले महागठबंधन के विधायक को जान लीजिए 1- फैसल रहमान: मां बीमार, सदस्यता पर खतरा मंडरा रहा RJD विधायक फैसल रहमान 2025 के विधानसभा चुनाव में पूर्वी चंपारण जिले के ढाका सीट से जीते हैं। उन्हें सिर्फ 178 वोटों से जीत मिली। उनकी इस जीत को यहीं से BJP प्रत्याशी पवन जायसवाल ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। इन पर फर्जी वोटिंग कराने का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि इनके पक्ष में 400 ऐसे वोट पड़े जो वोटिंग के दिन विदेश में थे। ऐसे में इनकी सदस्यता को ही खतरा है। हालांकि, इन्होंने पार्टी के नेताओं को बताया है कि इनकी मां बीमार हैं और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है। वे वोट देने आना चाहते थे, लेकिन मां की स्थिति ज्यादा बिगड़ने के कारण नहीं आ पाए। 2-सुरेंद्र प्रसाद: उपेंद्र कुशवाहा के साथ वफादारी दिखाई कांग्रेस विधायक सुरेंद्र प्रसाद पश्चिम चंपारण जिला के वाल्मीकिनगर से पहली बार विधायक चुने गए हैं। 2015 में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLSP (अब RLM) से NDA की तरफ से चुनाव लड़ चुके हैं। तब हार गए थे। कुशवाहा समाज से आते हैं। उपेंद्र कुशवाहा के करीबी माने जाते हैं। सुरेंद्र कुशवाहा को आखिरी समय में कांग्रेस की तरफ से टिकट मिला था। सूत्रों की मानें तो उन्हें कांग्रेस से टिकट दिलाने में भी उपेंद्र कुशवाहा का अहम रोल रहा है। ऐसे में जब उपेंद्र को उनकी जरूरत पड़ी तो उन्होंने अपनी वफादारी उनके लिए दिखाई है। 3- मनोज विश्वास- कांग्रेस की पॉलिटिक्स में सेट नहीं हो पा रहे थे कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास फारबिसगंज से पहली बार विधायक बने हैं। केवट मतलब EBC समाज से आते हैं। मनोज विश्वास ने BJP के विद्यासागर केशरी को 221 वोटों से हराया है। इससे पहले JDU और RJD में रह चुके हैं। चुनाव से कुछ वक्त पहले RJD से कांग्रेस में आए थे। कांग्रेस में सेट नहीं हो पा रहे थे। कांग्रेस के कई नेता इन्हें फारबिसगंज से चुनाव लड़ाने के पक्ष में भी नहीं थे। अब मनोज अपने पॉलिटिकल करियर को देखते हुए NDA के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं। 4- मनोहर प्रसाद सिंह-नीतीश का कर्ज अदा किया, नेता नहीं बनाने से नाराज कांग्रेस विधायक मनोहर प्रसाद सिंह मनिहारी से चौथी बार विधायक बने हैं। वह JDU के पुराने नेता रहे हैं। IPS अफसर से रिटायरमेंट के बाद 2005 में JDU से जुड़े। 2010 में JDU के टिकट पर चुनाव जीते थे। 2015 विधानसभा चुनाव में गठबंधन के तहत मनिहारी सीट कांग्रेस को चली गई। नीतीश कुमार ने मनोहर प्रसाद को कांग्रेस में शामिल होने को कहा और कांग्रेस से सिंबल दिलवाया। तब से मनोहर कांग्रेस से चुनाव लड़े और जीते। अब जब नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं तो उन्होंने NDA को अपना समर्थन देकर नीतीश कुमार का कर्ज अदा कर दिया। ये कांग्रेस के विधायक दल का नेता भी बनना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस उन्हें ये पद देने से बच रही थी। इसके कारण भी उनकी नाराजगी की चर्चा थी।


