बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में आयोजित तीन दिवसीय कृषि मेले में बक्सर के डुमरांव में चल रहे नीलगाय (बनबकरी) पर अनुसंधान ने लोगों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। इस शोध के तहत पाले जा रहे नीलगाय के बच्चों का प्रदर्शन किया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में किसान, वैज्ञानिक और आगंतुक पहुंचे। यह शोध कार्य विश्वविद्यालय के डायरेक्टर रिसर्च डॉ. अनिल कुमार और कुलपति डॉ. डीआर सिंह के निर्देशन में प्रदर्शित किया गया। शोध टीम के मुख्य सदस्य डॉ. सुदय प्रसाद ने नीलगाय पर किए जा रहे अनुसंधान और उसके संभावित लाभों की विस्तृत जानकारी दी। कृषि मेले में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने भी इस शोध कार्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह पहल किसानों की समस्याओं को समाधान में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और इससे भविष्य में किसानों को आर्थिक लाभ मिल सकता है। डुमरांव में कृषि वैज्ञानिकों की टीम कई वर्षों से नीलगाय से जुड़ी समस्याओं और संभावनाओं पर अध्ययन कर रही है। दरअसल, बिहार सहित देश के कई हिस्सों में नीलगाय किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाती है, जिससे किसान लगातार परेशान रहते हैं। इसी समस्या को अवसर में बदलने के उद्देश्य से वैज्ञानिकों ने नीलगाय को पालतू बनाकर उससे आर्थिक लाभ प्राप्त करने की दिशा में शोध शुरू किया है। अनुसंधान का नेतृत्व कर रहे वैज्ञानिक डॉ. सुदय प्रसाद ने बताया कि करीब चार वर्षों से इस विषय पर लगातार अध्ययन किया जा रहा है। स्वभाव, स्वास्थ्य तथा उपयोगिता से जुड़े हर पहलू का निरीक्षण किया शोध के तहत नीलगाय के कुछ बच्चों को लाकर उन्हें पालतू बनाने का प्रयास किया गया। उनके व्यवहार, खान-पान और विकास से जुड़े विभिन्न पहलुओं का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में पाले गए ये बच्चे अब बड़े हो चुके हैं और उनके स्वभाव, स्वास्थ्य तथा उपयोगिता से जुड़े हर पहलू का सूक्ष्म निरीक्षण किया जा रहा है। नीलगाय का गोबर जैविक खेती के लिए उपयोगी
शोध के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार नीलगाय का गोबर पोषक तत्वों से भरपूर पाया गया है, जो जैविक खेती के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि इसके गोबर में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम के साथ-साथ कैल्शियम और मैग्नीशियम भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। ये सभी तत्व मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उसकी जलधारण क्षमता को मजबूत करने में सहायक होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि नीलगाय का गोबर प्राकृतिक खाद, मिट्टी सुधारक, ईंधन और ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य उपयोगी संसाधनों के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे जैविक खेती को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ किसानों की आय के नए स्रोत भी विकसित हो सकते हैं।
114.85 लाख की परियोजना,आर्थिक लाभों पर शोध
नीलगाय पर किए जा रहे इस अनुसंधान के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से 114.85 लाख रुपये की परियोजना को स्वीकृति दी गई है। इस परियोजना के तहत नीलगाय के पालन, व्यवहार अध्ययन और उससे होने वाले संभावित आर्थिक लाभों पर विस्तार से शोध किया जा रहा है।
सबौर कृषि मेला में डुमरांव की शोध टीम द्वारा प्रस्तुत इस प्रयोग को किसानों और वैज्ञानिकों ने काफी सराहा। मेले में पहुंचे किसानों ने भी इस पहल को कृषि के क्षेत्र में एक नई दिशा देने वाला प्रयास बताया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो नीलगाय से होने वाले फसल नुकसान की समस्या का समाधान निकल सकता है और साथ ही किसानों के लिए आय का एक नया विकल्प भी तैयार हो सकता है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में आयोजित तीन दिवसीय कृषि मेले में बक्सर के डुमरांव में चल रहे नीलगाय (बनबकरी) पर अनुसंधान ने लोगों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। इस शोध के तहत पाले जा रहे नीलगाय के बच्चों का प्रदर्शन किया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में किसान, वैज्ञानिक और आगंतुक पहुंचे। यह शोध कार्य विश्वविद्यालय के डायरेक्टर रिसर्च डॉ. अनिल कुमार और कुलपति डॉ. डीआर सिंह के निर्देशन में प्रदर्शित किया गया। शोध टीम के मुख्य सदस्य डॉ. सुदय प्रसाद ने नीलगाय पर किए जा रहे अनुसंधान और उसके संभावित लाभों की विस्तृत जानकारी दी। कृषि मेले में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने भी इस शोध कार्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह पहल किसानों की समस्याओं को समाधान में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और इससे भविष्य में किसानों को आर्थिक लाभ मिल सकता है। डुमरांव में कृषि वैज्ञानिकों की टीम कई वर्षों से नीलगाय से जुड़ी समस्याओं और संभावनाओं पर अध्ययन कर रही है। दरअसल, बिहार सहित देश के कई हिस्सों में नीलगाय किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाती है, जिससे किसान लगातार परेशान रहते हैं। इसी समस्या को अवसर में बदलने के उद्देश्य से वैज्ञानिकों ने नीलगाय को पालतू बनाकर उससे आर्थिक लाभ प्राप्त करने की दिशा में शोध शुरू किया है। अनुसंधान का नेतृत्व कर रहे वैज्ञानिक डॉ. सुदय प्रसाद ने बताया कि करीब चार वर्षों से इस विषय पर लगातार अध्ययन किया जा रहा है। स्वभाव, स्वास्थ्य तथा उपयोगिता से जुड़े हर पहलू का निरीक्षण किया शोध के तहत नीलगाय के कुछ बच्चों को लाकर उन्हें पालतू बनाने का प्रयास किया गया। उनके व्यवहार, खान-पान और विकास से जुड़े विभिन्न पहलुओं का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में पाले गए ये बच्चे अब बड़े हो चुके हैं और उनके स्वभाव, स्वास्थ्य तथा उपयोगिता से जुड़े हर पहलू का सूक्ष्म निरीक्षण किया जा रहा है। नीलगाय का गोबर जैविक खेती के लिए उपयोगी
शोध के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार नीलगाय का गोबर पोषक तत्वों से भरपूर पाया गया है, जो जैविक खेती के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि इसके गोबर में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम के साथ-साथ कैल्शियम और मैग्नीशियम भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। ये सभी तत्व मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उसकी जलधारण क्षमता को मजबूत करने में सहायक होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि नीलगाय का गोबर प्राकृतिक खाद, मिट्टी सुधारक, ईंधन और ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य उपयोगी संसाधनों के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे जैविक खेती को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ किसानों की आय के नए स्रोत भी विकसित हो सकते हैं।
114.85 लाख की परियोजना,आर्थिक लाभों पर शोध
नीलगाय पर किए जा रहे इस अनुसंधान के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से 114.85 लाख रुपये की परियोजना को स्वीकृति दी गई है। इस परियोजना के तहत नीलगाय के पालन, व्यवहार अध्ययन और उससे होने वाले संभावित आर्थिक लाभों पर विस्तार से शोध किया जा रहा है।
सबौर कृषि मेला में डुमरांव की शोध टीम द्वारा प्रस्तुत इस प्रयोग को किसानों और वैज्ञानिकों ने काफी सराहा। मेले में पहुंचे किसानों ने भी इस पहल को कृषि के क्षेत्र में एक नई दिशा देने वाला प्रयास बताया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो नीलगाय से होने वाले फसल नुकसान की समस्या का समाधान निकल सकता है और साथ ही किसानों के लिए आय का एक नया विकल्प भी तैयार हो सकता है।


