RCA कन्वीनर कुमावत को हटाने की मांग, हाईकोर्ट से खारिज:आरोप पहले ही रद्द, फिर भी तथ्य छिपाया, नहीं मिली राहत

RCA कन्वीनर कुमावत को हटाने की मांग, हाईकोर्ट से खारिज:आरोप पहले ही रद्द, फिर भी तथ्य छिपाया, नहीं मिली राहत

राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) की एडहॉक कमेटी के कन्वीनर दीनदयाल कुमावत को अयोग्य घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस कुलदीप माथुर ने पाया कि याचिकाकर्ता ने एक महत्वपूर्ण तथ्य, कि आरोप तय करने का आदेश हाईकोर्ट की जयपुर पीठ पहले ही रद्द कर चुकी थी, जानबूझकर कोर्ट से छिपाया। जोधपुर के भाटेलाई पुरोहितान निवासी देवीसिंह पुत्र चंपालाल ने याचिका दायर की थी। वे वर्तमान में डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन, जोधपुर के संयुक्त आयोजन सचिव हैं। कोर्ट ने पाया कि याचिका में दो अलग-अलग कारणों से राहत मांगी गई थी। पहला RCA उपनियमों के तहत कुमावत को अयोग्य घोषित कर उनकी नियुक्ति रद्द करना। दूसरा- भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोपों में अनुशासनात्मक एवं कानूनी कार्रवाई का निर्देश। कोर्ट ने इन दोनों को अलग-अलग मानते हुए केवल नियुक्ति विवाद पर फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता के तर्क: पद पर स्वत: अयोग्य याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि बीसीसीआई से संबद्ध आरसीए के उपनियमों के अनुसार जैसे ही किसी सक्षम आपराधिक न्यायालय द्वारा एग्जीक्यूटिव कमेटी के किसी सदस्य के विरुद्ध आरोप तय हो जाते हैं, वह व्यक्ति आरसीए में किसी भी पद पर बने रहने के लिए स्वतः अयोग्य हो जाता है। वकील ने तर्क दिया कि सांभर लेक, जयपुर की सक्षम आपराधिक अदालत ने 18 सितंबर 2025 को कुमावत और अन्य सह-आरोपियों के विरुद्ध आरोप तय किए। वकील ने तर्क दिया कि भले ही जयपुर पीठ ने बाद में उन आरोपों को तकनीकी आधार पर रद्द किया, फिर भी 18 सितंबर 2025 से 1 नवंबर 2025 के बीच कुमावत द्वारा कन्वीनर की हैसियत से लिए गए सभी निर्णय शून्य और अधिकार-क्षेत्र से बाहर हैं। प्रतिवादी के तर्क: याचिका दाखिल होने से पहले का निर्णय वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य ने कोर्ट को बताया कि 18 सितंबर 2025 को 21 व्यक्तियों के खिलाफ एक सामान्य आदेश से आरोप तय किए गए थे। वकील ने तर्क दिया कि सह-आरोपी सुनील कुमार ने जयपुर पीठ में चुनौती दी और जयपुर पीठ ने 1 नवंबर 2025 के विस्तृत आदेश में माना कि आरोपियों की अनुपस्थिति में उनके वकीलों को मौखिक रूप से आरोपों का सार बताया गया था, इसलिए आरोप तय करने का आदेश कानून की नजर में टिकाऊ नहीं है। वकील ने तर्क दिया कि यह निर्णय याचिका दाखिल होने से पूर्व ही आ चुका था, परंतु याचिकाकर्ता ने कोर्ट को गुमराह करने के लिए इसे जानबूझकर छिपाया। पारदर्शिता और ईमानदारी के बिना कोर्ट आया याचिकाकर्ता किसी राहत का हकदार नहीं है। कोर्ट का फैसला: अयोग्यता का आधार ही खत्म कोर्ट ने जयपुर पीठ के 1 नवंबर 2025 के आदेश का अवलोकन करने के बाद पाया कि कुमावत के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश पहले ही रद्द हो चुका है, इसलिए आरसीए उपनियमों के तहत अयोग्यता का आधार ही समाप्त हो गया है। कोर्ट ने 18 सितंबर से 1 नवंबर 2025 के बीच कुमावत के निर्णयों को चुनौती देने के तर्क पर विचार करने से भी इनकार करते हुए कहा- “चूंकि उस प्रासंगिक अवधि में कुमावत की नियुक्ति को कोई चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए उनके द्वारा आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में लिए गए निर्णयों और कार्यों को इतने विलंबित चरण में चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” भ्रष्टाचार की शिकायत पर अलग मंच जाने की छूट जस्टिस कुलदीप माथुर ने स्पष्ट किया कि याचिका में भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोपों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जो मांग की गई थी, वह नियुक्ति विवाद से अलग “कॉज ऑफ एक्शन” यानी कानूनी कारण है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस मुद्दे पर उचित कानूनी मंच पर जाने की छूट दी है। इन सभी आधारों पर कोर्ट ने रिट याचिका, स्टे पेटिशन और सभी लंबित आवेदन खारिज कर दिए।

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