‘अभी खाना मिल रहा, लेकिन सिलेंडर क्राइसिस ने टेंशन बढ़ाई’:पूर्णिया GMCH में एडमिट मरीज बोले- तीन बार खाना मिल रहा है, जीविका दीदियों ने कहा- पर्याप्त स्टॉक

‘अभी खाना मिल रहा, लेकिन सिलेंडर क्राइसिस ने टेंशन बढ़ाई’:पूर्णिया GMCH में एडमिट मरीज बोले- तीन बार खाना मिल रहा है, जीविका दीदियों ने कहा- पर्याप्त स्टॉक

पूर्णिया गवर्मेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (जीएमसीएच) में मरीजों के लिए जीविका दीदियां खाना बनाती हैं। जीविका दीदियों ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि फिलहाल सिलेंडर का पर्याप्त है। उधर, जीएमसीएच में एडमिट मरीजों ने बताया कि फिलहाल तीन टाइम का खाना और दो वक्त चाय मिल रही है। लेकिन सिलेंडर क्राइसिस की खबर ने टेंशन बढ़ा दी है। GMCH में मरीजों को चाय नाश्ता और खाना परोसने की जिम्मेदारी जीविका के दीदी की रसोई पर है। ऐसे में सिलेंडर क्राइसिस के बीच दैनिक भास्कर की टीम GMCH पूर्णिया पहुंची और कमर्शियल सिलेंडर क्राइसिस से जुड़े हालात का जायजा लिया। जीएमसीएच में 300 से 350 मरीजों के लिए तैयार होता है खाना GMCH में रोजाना करीब 300 से 350 मरीजों के लिए GMCH मे खाना तैयार हो रहा है। इसकी जिम्मेदारी जीविका समूह की दीदी की रसोई संभाल रही है। जीएमसीएच में आम दिनों में करीब 300 से 350 मरीज भर्ती रहते हैं। इन सभी मरीजों के लिए अस्पताल परिसर में ही रसोई चलती है, जहां रोज ताजा भोजन तैयार किया जाता है। मरीजों की संख्या बढ़ने पर उसी अनुपात में भोजन की मात्रा भी बढ़ा दी जाती है। अस्पताल में खाना बनाने से लेकर उसे अलग-अलग वार्ड तक पहुंचाने की जिम्मेदारी जीविका समूह की महिलाओं के पास है। इन्हें आम तौर पर जीविका दीदी के नाम से जाना जाता है। ये महिलाएं सुबह से ही रसोई में जुट जाती हैं और तय मेन्यू के अनुसार भोजन तैयार कर मरीजों तक पहुंचाती हैं। 350 मरीजों के खाना के लिए हर दिन एक सिलेंडर की जरूरत जीविका दीदियों ने बताया कि जब मरीजों की संख्या 300 से 350 के बीच रहती है तो रसोई में रोजाना करीब एक गैस सिलेंडर की खपत होती है। अगर मरीजों की संख्या 400 के पार चली जाती है तो सिलेंडर की जरूरत भी बढ़ जाती है। जीएमसीएच में भर्ती मरीजों को दिन में तीन बार भोजन और सुबह-शाम चाय दी जाती है। सुबह चाय के साथ हल्का नाश्ता। दोपहर में दाल, चावल, भुजिया, दो तरह की सब्जी और सलाद। शाम को चाय के साथ ब्रेड। रात में चावल, दाल और सब्जी दी जाती है। अस्पताल में मरीजों को बिल्कुल मुफ्त में खाना उपलब्ध कराया जाता है। मरीज बोले- समय पर खाना मिल रहा है अस्पताल में भर्ती मरीज सुजीत कुमार का कहना है कि फिलहाल भोजन समय पर मिल रहा है और खाने की गुणवत्ता भी अच्छी है, नियमित समय पर खाना मिल जाता है। खाना ताजा होता है और जीविका दीदियां साफ-सफाई का भी पूरा ध्यान रखती हैं। लेकिन जिस तरह से सिलेंडर संकट की बात सामने आ रही है, उससे डर लग रहा है कि कहीं इसका असर हमारे खाने पर न पड़ जाए। अगर ऐसा हुआ तो मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी बढ़ जाएगी। बाहर का होटल वाला खाना मरीजों के लिए सही भी नहीं होता। मरीज ने कहा- खाना बनना बंद हुआ तो मुश्किल हो जाएगी बायसी से आए मरीज मो असफाक ने बताया कि यहां समय पर नाश्ता और तीन टाइम खाना मिल जाता है। मेन्यू भी बदलता रहता है, इसलिए मरीजों को दिक्कत नहीं होती। लेकिन अगर सिलेंडर की वजह से यहां खाना बनना बंद हो गया तो हमारे लिए बहुत परेशानी हो जाएगी। बायसी से पूर्णिया की दूरी 35 किलोमीटर से ज्यादा है। रोज घर से खाना लाना संभव नहीं है। हमारी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि बाहर से महंगा खाना खरीद सकें। ‘लकड़ी या कोयले के चूल्हे पर खाना बनाने की नौबत नहीं’ जीविका से जुड़े सतीश कुमार का कहना है कि फिलहाल मरीजों को नियमित रूप से नाश्ता और तीनों वक्त का भोजन दिया जा रहा है और गुणवत्ता के साथ-साथ स्वच्छता का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। गैस सिलेंडर संकट की आशंका को देखते हुए जिला प्रशासन को पत्र भेजा गया है, ताकि समय पर पर्याप्त सिलेंडर उपलब्ध कराया जा सके और मरीजों के भोजन की व्यवस्था प्रभावित न हो। अभी तक अस्पताल में लकड़ी या कोयले के चूल्हे पर खाना बनाने की नौबत नहीं आई है। पूर्णिया गवर्मेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (जीएमसीएच) में मरीजों के लिए जीविका दीदियां खाना बनाती हैं। जीविका दीदियों ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि फिलहाल सिलेंडर का पर्याप्त है। उधर, जीएमसीएच में एडमिट मरीजों ने बताया कि फिलहाल तीन टाइम का खाना और दो वक्त चाय मिल रही है। लेकिन सिलेंडर क्राइसिस की खबर ने टेंशन बढ़ा दी है। GMCH में मरीजों को चाय नाश्ता और खाना परोसने की जिम्मेदारी जीविका के दीदी की रसोई पर है। ऐसे में सिलेंडर क्राइसिस के बीच दैनिक भास्कर की टीम GMCH पूर्णिया पहुंची और कमर्शियल सिलेंडर क्राइसिस से जुड़े हालात का जायजा लिया। जीएमसीएच में 300 से 350 मरीजों के लिए तैयार होता है खाना GMCH में रोजाना करीब 300 से 350 मरीजों के लिए GMCH मे खाना तैयार हो रहा है। इसकी जिम्मेदारी जीविका समूह की दीदी की रसोई संभाल रही है। जीएमसीएच में आम दिनों में करीब 300 से 350 मरीज भर्ती रहते हैं। इन सभी मरीजों के लिए अस्पताल परिसर में ही रसोई चलती है, जहां रोज ताजा भोजन तैयार किया जाता है। मरीजों की संख्या बढ़ने पर उसी अनुपात में भोजन की मात्रा भी बढ़ा दी जाती है। अस्पताल में खाना बनाने से लेकर उसे अलग-अलग वार्ड तक पहुंचाने की जिम्मेदारी जीविका समूह की महिलाओं के पास है। इन्हें आम तौर पर जीविका दीदी के नाम से जाना जाता है। ये महिलाएं सुबह से ही रसोई में जुट जाती हैं और तय मेन्यू के अनुसार भोजन तैयार कर मरीजों तक पहुंचाती हैं। 350 मरीजों के खाना के लिए हर दिन एक सिलेंडर की जरूरत जीविका दीदियों ने बताया कि जब मरीजों की संख्या 300 से 350 के बीच रहती है तो रसोई में रोजाना करीब एक गैस सिलेंडर की खपत होती है। अगर मरीजों की संख्या 400 के पार चली जाती है तो सिलेंडर की जरूरत भी बढ़ जाती है। जीएमसीएच में भर्ती मरीजों को दिन में तीन बार भोजन और सुबह-शाम चाय दी जाती है। सुबह चाय के साथ हल्का नाश्ता। दोपहर में दाल, चावल, भुजिया, दो तरह की सब्जी और सलाद। शाम को चाय के साथ ब्रेड। रात में चावल, दाल और सब्जी दी जाती है। अस्पताल में मरीजों को बिल्कुल मुफ्त में खाना उपलब्ध कराया जाता है। मरीज बोले- समय पर खाना मिल रहा है अस्पताल में भर्ती मरीज सुजीत कुमार का कहना है कि फिलहाल भोजन समय पर मिल रहा है और खाने की गुणवत्ता भी अच्छी है, नियमित समय पर खाना मिल जाता है। खाना ताजा होता है और जीविका दीदियां साफ-सफाई का भी पूरा ध्यान रखती हैं। लेकिन जिस तरह से सिलेंडर संकट की बात सामने आ रही है, उससे डर लग रहा है कि कहीं इसका असर हमारे खाने पर न पड़ जाए। अगर ऐसा हुआ तो मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी बढ़ जाएगी। बाहर का होटल वाला खाना मरीजों के लिए सही भी नहीं होता। मरीज ने कहा- खाना बनना बंद हुआ तो मुश्किल हो जाएगी बायसी से आए मरीज मो असफाक ने बताया कि यहां समय पर नाश्ता और तीन टाइम खाना मिल जाता है। मेन्यू भी बदलता रहता है, इसलिए मरीजों को दिक्कत नहीं होती। लेकिन अगर सिलेंडर की वजह से यहां खाना बनना बंद हो गया तो हमारे लिए बहुत परेशानी हो जाएगी। बायसी से पूर्णिया की दूरी 35 किलोमीटर से ज्यादा है। रोज घर से खाना लाना संभव नहीं है। हमारी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि बाहर से महंगा खाना खरीद सकें। ‘लकड़ी या कोयले के चूल्हे पर खाना बनाने की नौबत नहीं’ जीविका से जुड़े सतीश कुमार का कहना है कि फिलहाल मरीजों को नियमित रूप से नाश्ता और तीनों वक्त का भोजन दिया जा रहा है और गुणवत्ता के साथ-साथ स्वच्छता का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। गैस सिलेंडर संकट की आशंका को देखते हुए जिला प्रशासन को पत्र भेजा गया है, ताकि समय पर पर्याप्त सिलेंडर उपलब्ध कराया जा सके और मरीजों के भोजन की व्यवस्था प्रभावित न हो। अभी तक अस्पताल में लकड़ी या कोयले के चूल्हे पर खाना बनाने की नौबत नहीं आई है।  

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