डिफेंस अधिकारी की पत्नी महिला नहीं पुरुष:बच्चा ना होने पर पहुंचे थे अस्पताल, डॉक्टर ने बताया- पेट में ओवेरी की जगह हैं अंडकोष

डिफेंस अधिकारी की पत्नी महिला नहीं पुरुष:बच्चा ना होने पर पहुंचे थे अस्पताल, डॉक्टर ने बताया- पेट में ओवेरी की जगह हैं अंडकोष

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक डिफेंस अधिकारी और उनकी पत्नी की साल 2023 में हुई अरेंज मैरिज के बाद जिंदगी सामान्य और खुशहाल चल रही थी, लेकिन दो साल बाद भी संतान न होने पर जब उन्होंने इलाज शुरू कराया तो एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। जांच में पता चला कि महिला के शरीर में सामान्य महिलाओं की तरह एक्सएक्स क्रोमोजोम नहीं बल्कि पुरुषों वाले एक्सवाई क्रोमोजोम मौजूद हैं। बाहरी रूप से महिला पूरी तरह सामान्य दिखाई देती थीं, लेकिन शरीर के अंदर ओवरी की जगह अविकसित अंडकोष मौजूद थे। इस स्थिति से दंपती को गहरा सदमा लगा। बाद में उन्होंने एम्स भोपाल में विशेषज्ञों से इलाज कराया, जहां दो चरणों में सर्जरी कर समस्या का समाधान किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में पति ने पत्नी का साथ नहीं छोड़ा और उनके साथ जीवनभर रहने का फैसला लिया। संतान न होने पर शुरू हुआ इलाज
मैरिज के समय पत्नी की उम्र करीब 20 वर्ष थी। शादी के बाद दोनों का वैवाहिक जीवन सामान्य रूप से आगे बढ़ रहा था और परिवार के बीच उनका रिश्ता भी मजबूत होता जा रहा था। हालांकि, शादी के दो साल बाद भी जब संतान नहीं हुई तो दंपती चिंतित होने लगे। परिवार को इस बारे में बताए बिना उन्होंने निजी तौर पर इलाज कराने का फैसला किया और भोपाल के एक बड़े निजी अस्पताल में परामर्श लिया। जांच के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि महिला के शरीर में महिलाओं की तरह एक्सएक्स नहीं बल्कि पुरुषों वाले एक्सवाई क्रोमोजोम मौजूद हैं। यह जानकारी सुनकर दंपती पूरी तरह टूट गए और करीब डेढ़ महीने तक इस सदमे से बाहर नहीं निकल सके। बाद में डिफेंस अधिकारी ने हिम्मत दिखाई और स्थिति को स्वीकार करते हुए बेहतर इलाज के लिए एम्स भोपाल जाने का निर्णय लिया। एमआरआई जांच में सामने आई असामान्यता
एम्स में विस्तृत जांच और एमआरआई कराने पर पता चला कि महिला के पेट के निचले हिस्से में, जहां सामान्य रूप से ओवरी होती है, वहां कम विकसित अंडकोष मौजूद हैं। ये अंडकोष लगभग निष्क्रिय थे, जिसके कारण शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बहुत कम था। इसी वजह से रक्त जांच सामान्य दिखाई देती थी और समस्या का पता पहले नहीं चल पाया। कभी नहीं आए पीरियड्स
महिला को कभी मासिक धर्म नहीं आया था। जागरूकता की कमी के कारण परिवार और स्वयं महिला यह मानते रहे कि उम्र बढ़ने के साथ पीरियड्स शुरू हो जाएंगे। शुरुआती समय में इस समस्या को लेकर कुछ इलाज भी कराया गया, लेकिन दवाओं का कोई असर नहीं हुआ क्योंकि शरीर में ओवरी मौजूद ही नहीं थीं। एम्स की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम ने किया इलाज
महिला का इलाज एम्स के यूरोलॉजी, बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी सहित कई विभागों की संयुक्त टीम ने किया। महिला सबसे पहले एम्स के ट्रांसजेंडर क्लीनिक पहुंची थी, जहां विशेषज्ञों ने विस्तृत जांच की। डॉक्टरों को जांच में यह भी पता चला कि महिला के निजी अंगों के भीतर अविकसित पुरुष अंग भी मौजूद था। पति-पत्नी की सहमति से डॉक्टरों ने दो चरणों में सर्जरी करने का निर्णय लिया। पहले चरण में माइक्रो प्लास्टिक सर्जरी तकनीक के जरिए विकसित छोटे पुरुष अंग को हटाया गया। इस प्रक्रिया में केवल उसका ऊपरी हिस्सा और उससे जुड़ी नसों को सुरक्षित रखा गया, ताकि भविष्य में संवेदनशीलता बनी रहे। दूसरे चरण में पेट के अंदर मौजूद अविकसित अंडकोष को भी सर्जरी के माध्यम से निकाल दिया गया। पति ने नहीं छोड़ा साथ
इस पूरे मामले की सबसे खास बात यह रही कि डिफेंस अधिकारी ने अपनी पत्नी का हर परिस्थिति में साथ दिया। उन्होंने न केवल पत्नी को इलाज के लिए मानसिक रूप से तैयार किया बल्कि इस कठिन समय में उन्हें टूटने या अवसाद में जाने से भी बचाया। अधिकारी ने अपनी पत्नी को उसी रूप में स्वीकार किया जैसा वे हैं और दोनों ने जीवनभर पति-पत्नी के रूप में साथ रहने का निर्णय लिया। डॉक्टरों के अनुसार इस स्थिति में दंपती के लिए प्राकृतिक रूप से संतान होना संभव नहीं है। सर्जरी करने वाले डॉक्टर ने बताया कि दंपती ने भविष्य में बच्चा गोद लेने का फैसला किया है। उनके अनुसार यह मामला केवल चिकित्सा विज्ञान से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह समझदारी, संवेदनशीलता और रिश्तों की मजबूती का भी प्रेरणादायक उदाहरण है। हर महीने हो रही 10 से ज्यादा सर्जरी एम्स भोपाल के बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिनव सिंह के अनुसार ऐसे मामलों के लिए यहां विशेष ट्रांसजेंडर क्लीनिक संचालित किया जा रहा है। हर महीने बड़ी संख्या में मरीज यहां परामर्श के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इनमें से लगभग 10 से 12 मरीजों की ही सर्जरी हो पाती है। ऐसे मामलों में करीब 60 प्रतिशत केस मेल से फीमेल और लगभग 40 प्रतिशत फीमेल से मेल परिवर्तन के होते हैं। यह अनुपात समय के साथ बदल भी सकता है। एम्स भोपाल के बर्न एंड प्लास्टिक विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिनव सिंह के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका मुख्य कारण लोगों में बढ़ती जागरूकता और एम्स भोपाल के प्रति भरोसा है।
डॉ. अभिनव ने बताया कि निजी अस्पतालों में इस तरह की सर्जरी बेहद महंगी होती है। एम्स में यह कम खर्च में उपलब्ध है। सर्जरी के साथ काउंसलिंग भी जरूरी
एम्स भोपाल में केवल सर्जरी ही नहीं की जाती, बल्कि मरीजों और उनके परिवार की विस्तृत काउंसलिंग भी की जाती है। डॉक्टर उन्हें अपनी स्थिति को समझने और स्वीकार करने में मदद करते हैं। इसके साथ ही हार्मोन थेरेपी के जरिए शरीर को अंदर से चुनी गई पहचान के अनुरूप विकसित किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर जांच, उपचार और सामाजिक समर्थन मिलने से ऐसे मरीज सामान्य और सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं। ये खबर भी पढ़ें… जिसे 15 साल बेटी समझा, वो बेटा निकला मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में आदिवासी परिवार में जन्मी एक बच्ची को परिवार ने 15 साल तक बेटी की तरह पाला-पोसा। वह पढ़ाई के साथ खेलकूद में भी आगे रही और प्रतिभा के दम पर 2023 के एशियन गेम्स तक पहुंच गई, लेकिन वहां हुए एक ब्लड टेस्ट ने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी।पूरी खबर पढ़ें

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