समर्पण बेमिसाल : लाखन सिंह पांच दशक से ‘नाटक’ से बता रहे जिंदगी का सच

समर्पण बेमिसाल : लाखन सिंह पांच दशक से ‘नाटक’ से बता रहे जिंदगी का सच

दिनेश कुमार शर्मा 

अजमेर (Ajmer news). वरिष्ठ रंगकर्मी लाखन सिंह (69) ने नाट्य कला को मंचीय अभिव्यक्ति से कहीं आगे जीवन का उद्देश्य बना लिया। करीब पांच दशक से अधिक की रंगमंच यात्रा में उन्होंने नाटको में ही अपने जीवन की तलाश की और खुद सहित एक पूरी पीढ़ी को नाट्य विधा में तराशा। उन्होंने 100 से अधिक नाटकों का मंचन किया।

रामनगर क्षेत्र के मोतीनगर निवासी लाखन सिंह की स्कूली शिक्षा डीएवी से हुई व बीए प्राइवेट किया। स्कूल के दिनों में ही मिमिक्री और नाटक के जरिए रंगमंच से जुड़ाव हो गया। निर्देशक गोवर्धन दास की स्क्रिप्ट पर उन्होंने 17 वर्ष की उम्र में साथियों के साथ पहला नाटक किया और यहीं से उनके नाट्य जीवन की शुरुआत हो गई। उस दौर में आर्केस्ट्रा के साथ लगभग 40 मिनट के नाटक किए जाते थे ।

पर्ल ड्रामेटिक क्लब से शुरुआत

उन्होंने वर्ष 1976 में ’पर्ल ड्रामेटिक क्लब’ की स्थापना की। वर्ष 1978 में मंगल सक्सेना से नाट्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। फिर संस्था का नाम बदलकर आधुनिक नाट्य कला संस्थान रखा। वर्तमान में वे इसके सचिव, व डॉ. हरबंस सिंह दुआ अध्यक्ष हैं।

रेलवे इंस्टीट्यूट पहला रंगमंच

पिता नानकराम सिंह रेलवे अधिकारी होने से सीनियर रेलवे इंस्टीट्यूट उन्हें आसानी से मिल जाता था। 1976 में उन्होंने ‘विलायत की सैर’ का मंचन किया। 1981 में सूचना केन्द्र के खुले रंगमंच पर मंचित ‘ढाई आखर प्रेम का’ देखने करीब ढाई हजार दर्शक पहुंचे थे।

नाटकों की स्वर्णिम अवधि

1980 से 1985 के बीच उन्होंने शुतुरमुर्ग, सत्य की लड़ाई, जुलूस, ढाई आखर प्रेम का, एक और ब्रह्मचारी, मारे गए बेचारे, विद्रोही स्पार्टाकस, फांसी और तमाशे में तमाशा आदि नाटकों का मंचन किया। इस दौर के रंगमंच कलाकारों में डॉ. भैरवचंद शर्मा, जुगेश सब्बरवाल, अशोक भट्ट, स्विटीली, मीनाक्षी, मंजू चतुर्वेदी और मीना मुखर्जी आदि शामिल रहे।

50 साल में सैकड़ों प्रस्तुति

पांच दशक की रंगमंच यात्रा में उन्होंने 100 से अधिक नाटकों का मंचन किया। इनमें 20 से अधिक डेढ़ घंटे के पूर्ण नाटक, 50 से अधिक एक घंटे के वन एक्ट प्ले और 20 से 30 मिनट के 200 से अधिक नुक्कड़ नाटक शामिल हैं।

युवाओं, बच्चों को दिया मंच

उन्होंने 1983 से 1996 तक सूचना केन्द्र में युवा नाट्य शिविर आयोजित कर 200 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित किया।1996 से अब तक बाल नाट्य शिविरों के जरिए 500 से अधिक बच्चों को अभिनय और मंचन की बारीकियां सिखाईं। प्रशिक्षित कलाकारों में योबी जार्ज, दुर्गा शर्मा, विजय श्रीवास्तव, हेमलता वर्मा, राजेन्द्र सिंह, गौरव व्यास, सौरभ सारस्वत और परवीर बानो जैसे नाम शामिल हैं।

नई पीढ़ी को सौंपी रंगमंच की विरासत

उनके बेटे विकल्प सिंह व बेटी दीक्षा सिंह बिदवई भी रंगमंच से जुड़ी हैं। विकल्प ने मात्र 3 वर्ष की आयु में आगरा में ‘फांसी’ नाटक में अभिनय किया था।

कई शहरों में दे चुके हैं प्रस्तुति

अजमेर के बच्चों की टीम को लेकर वे आगरा, गुड़गांव, बड़ौदा, दिल्ली, जयपुर और कोटा आदि शहरों में भी नाटकों की प्रस्तुति कर चुके हैं। जिससे बच्चों को अनुभव और शहर की नाट्य प्रतिभा को अन्य शहरों में पहचान मिली।

एनएसडी से मिल चुका है सम्मान

नाट्य क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2015 में पटेल मैदान में जिला प्रशासन की ओर से उन्हें सम्मानित किया गया। वृंदावन के राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव बांसुरी रंगोत्सव में श्री हरिराम व्यास अवार्ड समेत कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। हाल ही में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की ओर से भी सम्मानित किया गया।

पुस्तक प्रकाशन की तैयारी

वे अपने चर्चित नाटकों को पुस्तक रूप में प्रकाशित कराने की प्रक्रिया में भी जुटे हुए हैं। इनमें फांसी, तमाशे में तमाशा, नाटक में नाटक पश्चाताप, मारे गए बैचारे जैसे नाटक शामिल हैं। बाल नाटकों का एक संग्रह प्रकाशित करने की योजना भी है। इसमें उनके लिखे नाटक उत्तराधिकारी, गुड़िया का ब्याह भी नहीं, मां तुझे सलाम और 5 लाख दहेज शामिल किए जाएंगे।

नई प्रस्तुति की तैयारी

इन दिनों वे के. पी. सक्सेना की स्क्रिप्ट पर आधारित ‘गज, फुट, इंच’ नाटक की रिहर्सल में व्यस्त हैं। इस नाटक में 9 कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। इसमें लड़कों के साथ लड़कियां भी लड़कों के किरदार निभा रही हैं।

घर की छत पर बनाया मिनी थिएटर

नई पीढ़ी को नाटक सिखाने के उद्देश्य से उन्होंने घर की छत पर 100 दर्शक क्षमता का ‘लाखन मिनी थिएटर’ तैयार किया है। इस मंच पर लगभग 10 नाटकों का मंचन किया जा चुका है। इनमें मम्मी अकेला क्यों छोड़ गई, नाटक नहीं, नाटक में नाटक पश्चाताप, मां तुझे सलाम और गुड़िया का ब्याह भी नहीं जैसे नाटक शामिल हैं।

नाटक के जरिए समाज को संदेश

लाखन सिंह के नाटक केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनमें सामाजिक सरोकार भी प्रमुख रहे। उनके नाटकों में समाज की बुराइयों, राजनीतिक विसंगतियों और कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य किया जाता रहा है। साथ ही राष्ट्रप्रेम और सामाजिक जागरूकता का संदेश भी दिया जाता है। गुजरात के कच्छ में आए भूकंप के बाद उन्होंने नाटक मंचन के माध्यम से राशि एकत्रित की और 11 हजार रुपए जिला प्रशासन के माध्यम से पीड़ितों की सहायता के लिए भेजे।

बदलती नाट्य संस्कृति पर विचार

उनका मानना है कि समय के साथ नाटकों की प्रकृति में बदलाव आया है। उनके अनुसार पहले लोग नाटक देखने के लिए स्वयं पहुंचते थे, जबकि अब उन्हें निमंत्रण देना पड़ता है। कई स्थानों पर दर्शकों के लिए अल्पाहार और भोजन की व्यवस्था भी करनी पड़ती है। उनका कहना है कि पहले नाटक कहानी और संदेश प्रधान होते थे, जबकि आज उनमें गायन और नृत्य का प्रभाव अधिक दिखाई देता है और मनोरंजन का पक्ष प्रमुख हो गया है।

शॉर्टहैंड सीखी, फिर हजारों को सिखाई 

वर्ष 1975 में लाखन सिंह ने नौकरी के लिए शॉर्टहैंड सीखी थी, जो बाद में उनकी कमाई का माध्यम भी बनी। युवावस्था में वे शॉर्टहैंड सिखाकर और नाटक मंचन कर अपनी आजीविका चलाते थे। उस समय लगभग 15 रुपए मासिक तक की कमाई हो जाती थी। वर्ष 1978 से अब तक उनके सिखाए 1000 से अधिक विद्यार्थियों का चयन सरकारी नौकरियों में हो चुका है, जिनमें से कई अब सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।

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