शोध पत्रों से आगे बढ़ उत्पाद आधारित होनी चाहिए पीएचडी

शोध पत्रों से आगे बढ़ उत्पाद आधारित होनी चाहिए पीएचडी

मिलिंद कुमार शर्मा – प्रोफेसर, एमबीएम यूनिवर्सिटी, जोधपुर,

आज जब भारत स्वयं को ज्ञान और नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करना चाहता है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि विश्वविद्यालयों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पीएचडी को अधिक व्यावहारिक, समाजोपयोगी और उद्योग आधारित बनाया जाए। इस संदर्भ में चीन का वह शिक्षा मॉडल अत्यंत प्रासंगिक है, जिसमें पीएचडी डिग्री केवल शोध-पत्रों पर ही नहीं, अपितु विश्वविद्यालय में किसी नए उत्पाद, प्रोटोटाइप या तकनीकी समाधान के आविष्कार पर भी आधारित हो सकती है।

यदि भारतीय विश्वविद्यालय इस मॉडल को अपनाते हैं, तो शोध की दिशा में गुणात्मक वृद्धि होने की प्रबल संभावना है। वर्तमान व्यवस्था में पीएचडी प्राय: सैद्धांतिक विमर्श और प्रकाशन-केंद्रित होती है, जिससे कई बार शोध प्रयोगशालाओं से बाहर निकल समाज या उद्योग तक नहीं पहुंच पाता है, जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के शोध विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की शोभा बढ़ाने के अतिरिक्त किसी उपयोग के नहीं होते हैं।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उत्पाद-आधारित पीएचडी प्रणाली शोधार्थियों को वास्तविक समस्याओं की पहचान करने और उनके व्यावहारिक समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित करेगी। इससे विश्वविद्यालय मात्र ज्ञान उत्पादन के केंद्र न रहकर नवाचार और तकनीकी विकास के पहिये बन सकते हैं। यह रेखांकित करना यहां उचित होगा कि इस परिवर्तन में नियामक संस्थाओं की भूमिका भी नि:संदेह अत्यंत निर्णायक सिद्ध होगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यदि पीएचडी मूल्यांकन के मानदंडों में पेटेंट, प्रोटोटाइप, तकनीकी हस्तांतरण और स्टार्टअप सृजन को मान्यता देता है, तो विश्वविद्यालयों को स्पष्ट दिशा मिलेगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग पाठ्यक्रम संरचना में लचीलापन लाकर उद्योग-सहयोग आधारित शोध, सह-मार्गदर्शन और बहु-विषयक परियोजनाओं को बढ़ावा दे सकता है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि अकादमिक गुणवत्ता बनी रहे और नवाचार को भी समान महत्व मिले।

लंबे-लंबेे शोध एवं साहित्य समीक्षा की अनिवार्यता समाप्त कर पीएचडी शोधार्थियों के लिए ‘प्रोडक्ट डिजाइन एंड डेवलपमेंट’ विषय कोर्स वर्क में सम्मिलित किए जाने की अनुशंसा की जा सकती है। सीधे उत्पाद या तकनीक आधारित शोध को प्रोत्साहन मिलने से शोधार्थी लंबी और उबाऊ शोध प्रकाशन प्रक्रिया से भी बच सकेंगे। इसके अतिरिक्त परीक्षकों के लिए भी शोध परखना सरल होगा और यह पूरा शोध चक्रीय समय को बचा पाएगा। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संस्थानों में इस संस्कृति को संस्थागत रूप दे सकती है। यह उद्योग-अकादमिक साझेदारी के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश, वित्तीय प्रोत्साहन और मान्यता तंत्र विकसित कर सकती है, जिससे विश्वविद्यालयों में विकसित उत्पाद स्थानीय और राष्ट्रीय उद्योग की आवश्यकताओं से सक्रिय रूप से जुड़े हों।

यदि नियामक एजेंसियां इस पहल को रैंकिंग, मान्यता और वितीय सहायता से जोड़ें, तो विश्वविद्यालय स्वाभाविक रूप से नवाचार-केंद्रित पीएचडी की ओर अग्रसर होने को प्रेरित होंगे। इस मॉडल से उद्योग भी लाभान्वित होंगे। जब विश्वविद्यालयों में शोध सीधे उत्पाद या तकनीक के रूप में सामने आएगा, तो छोटे और मध्यम उद्योग, जिनके पास बड़े अनुसंधान एवं विकास संसाधन नहीं होते, विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर समस्याओं का समाधान पा सकेंगे। इससे तकनीक का स्थानीयकरण होगा, आयात पर निर्भरता घटेगी और क्षेत्रीय स्तर पर रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिलेगा। स्टेम स्नातकों और शोधार्थियों को उत्पाद-आधारित पीएचडी केवल पाठ्यक्रम या परीक्षाओं तक सीमित न रख, अपितु प्रयोग, नवाचार और जोखिम लेने की मानसिकता विकसित करने के लिए भी प्रेरित करेगी।

जब विफलता को सीख की प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जाएगा, तब सृजनात्मकता स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। यही प्रक्रिया आगे चलकर स्टार्टअप संस्कृति को सुदृढ़ करेगी। यह संकल्प लिया जाना चाहिए कि विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित न रहे, अपितु समाज, उद्योग और राष्ट्र के लिए ठोस समाधान गढऩे का माध्यम भी बने।

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