पीबीएम हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी विभाग का वार्ड जर्जर हालत में है। दीवार में सीलन के कारण फॉल्स सीलिंग उखड़ चुकी है। उसी छत के नीचे भर्ती मरीजों की डायलिसिस हो रही है। पास वाले कक्ष को अनसेफ घोषित कर दिया गया है। वहां किसी को भर्ती नहीं किया जाता। सबसे पीछे वाले कक्ष में डायलिसिस की कुछ मशीनें कबाड़ में पड़ी हैं। डायलिसिस के लिए मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। दरअसल पीबीएम हॉस्पिटल का नेफ्रोलॉजी विभाग खुद ही डायलिसिस पर है। न्यूरो साइंसेज की जर्जर बिल्डिंग के एक बड़े हॉल में यह विभाग चल रहा है। वार्ड की छत पर लगी फॉल्स सीलिंग टूटी हुई है। सीलन से दीवारों का प्लास्टर उखड़ चुका है। वहीं बेड पर मरीजों को रखा जा रहा है। हकीकत में पूरा वार्ड ही अनसेफ है। मरीजों के इलाज की सुविधाएं तक पूरी नहीं हैं। कुल 26 मशीन हैं, जिनमें से दो आईसीयू में लगी हैं। दो हेपेटाइटिस मरीजों के लिए रिजर्व रहती हैं। शेष 22 में से 20 काम कर रही हैं। उन पर रोज 60 मरीजों की डायलिसिस का भार है। दस नई मशीनें खरीदने के लिए डेढ़ करोड़ का बजट मंजूरी हो गया था। टेंडर लगाने की तैयारी थी, लेकिन कॉलेज के बजट में कटौती कर दी गई। एक मशीन पर एक दिन में तीन ही डायलिसिस हो रहे पीबीएम हॉस्पिटल में डायलिसिस की कुल 26 मशीनें वर्किंग में हैं। दो आईसीयू में रहती हैं। दो मशीनें हेपेटाइटिस मरीजों के लिए रिजर्व हैं। बाकी 22 में 20 मशीनों पर सुबह आठ बजे से लेकर रात आठ बजे तक करीब 60 मरीजों की डायलिसिस हो रही है। एक मशीन पर औसत तीन मरीजों की ही डायलिसिस हो पाती है। एक मरीज की डायलिसिस में एवरेज तीन से चार घंटे लगते हैं। एक घंटे मरीज को तैयार करने और वापस उपकरण से हटाने में लग जाता है। विभाग में कुल 15 नर्सेज का स्टाफ है। तीन शिफ्ट में ड्यूटी रहती है। कुछ नर्सेज छुट्टी पर रहती हैं। इस हिसाब से एक मशीन पर एक नर्सिंग कर्मी और टेक्नीशियन होना चाहिए, लेकिन स्टाफ की कमी के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा। एक नर्सिंग ऑफिसर पर तीन से चार मरीजों का भार रहता है। कई बार मरीज ज्यादा होने पर डायलिसिस का टाइम भी घटाना पड़ जाता है। डायलिसिस की 24 मशीनें कबाड़ हुईं, कंडम नहीं कर रहे नेफ्रोलॉजी विभाग में डायलिसिस की करीब 13 साल पुरानी 24 मशीनें कबाड़ में पड़ी हैं। दस साल चलने के बाद मैन्युफैक्चरर ने उनकी मेंटिनेंस बंद कर दी। यह मशीनें तीन साल से कबाड़ में पड़ी हैं। इन्हें कंडम घोषित करने के लिए निर्माता कंपनी को कई बार लिख चुके, लेकिन अब तक उनका इंजीनियर नहीं आया। इन मशीनों के कारण एक वार्ड रुका पड़ा है। उधर, मरीजों को भर्ती करने के लिए जगह कम पड़ रही है। किडनी ठीक से काम नहीं करने पर डायलिसिस जरूरी विशेषज्ञों के अनुसार यदि क्रोनिक किडनी रोग है तो किडनी रक्त को ठीक से साफ करने में सक्षम नहीं हो सकती। वेस्टेज प्रोडक्ट्स और फ्लूइड प्रोडक्ट्स आपके शरीर में खतरनाक स्तर तक जमा हो सकते हैं। उपचार न किए जाने पर यह शरीर में कई घातक लक्षण पैदा कर सकता है। ऐसा होने से पहले डायलिसिस रक्त से वेस्टेज प्रोडक्ट्स और फ्लूइड प्रोडक्ट्स को फिल्टर कर देता है। “हमारे पास 26 मशीनें वर्किंग में हैं। किसी मरीज को बिना डायलिसिस नहीं भेजा जाता। वर्क लोड अधिक होने पर जिला अस्पताल से करवाते हैं।”
-डॉ. जितेंद्र फलोदिया, एचओडी, नेफ्रोलॉजी विभाग “डायलिसिस मशीनें खरीदने के लिए बजट मंजूर हो गया था। टेंडर प्रक्रिया शुरू करने वाले थे, लेकिन पैसा ही नहीं आया। अब अप्रैल में पैसा देने की बात कही जा रही है।”
-डॉ. सुरेंद्र वर्मा,प्रिंसिपल, एसपी मेडिकल कॉलेज


