ईरान की करना चाहता है मदद…अफगानिस्तान से जंग में बुरी तरह पिट रहा हैरान परेशान पाकिस्तान

ईरान की करना चाहता है मदद…अफगानिस्तान से जंग में बुरी तरह पिट रहा हैरान परेशान पाकिस्तान

Pakistan Iran relations पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे जटिल कूटनीतिक और सामरिक भंवर में फंसा हुआ है। मध्य पूर्व में सुलगती आग और अपनी ही पश्चिमी सीमा पर जारी खूनी संघर्ष ने पाकिस्तान की विदेश नीति (Pakistan foreign policy) की पोल खोल दी है। एक तरफ अवाम है जो ईरान के साथ खड़ी है, तो दूसरी तरफ सरकार है जो अमेरिका की चौखट पर सजदा कर रही है। सरकार और जनता की सोच में भारी टकराव है और पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति अंतर्विरोधों से भरी हुई है। पाकिस्तान ईरान का मित्र है और वह कह चुका था कि अगर इजरायल ने ईरान पर हमला किया तो वह ईरान का साथ देगा,मगर अब हालात जुदा हैं। गौरतलब है कि शहबाज शरीफ सरकार और सैन्य नेतृत्व खुद को अमेरिका (खासकर ट्रंप गुट) के करीब दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। आईएमएफ (IMF) के कर्ज पर टिकी अर्थव्यवस्था के कारण पाकिस्तान अमेरिका के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता।

ईरान से किए गए वादे से मुकरना (Iran US war)

पाकिस्तान हमेशा से इजरायल का विरोधी रहा है और उसने वादा किया था कि इजरायल के हमले की स्थिति में वह ईरान का साथ देगा। लेकिन आज जब ईरान अमेरिका और इजरायल से सीधा मोर्चा ले रहा है, तो पाकिस्तान मूकदर्शक बना हुआ है।

देश में जनता का आक्रोश (Israel attack)

पकिस्तानी अवाम अमेरिका और इजरायल के सख्त खिलाफ है। अवाम का सीधा सवाल है कि जब ईरान यहूदी और ईसाई ताकतों (इजरायल और अमेरिका) से लड़ रहा है, तो पाकिस्तान उसका साथ देने के बजाय एक दूसरे इस्लामी देश (अफगानिस्तान) से क्यों लड़ रहा है?

रमजान में जंग: शहबाज और मुनीर पर उठती उंगलियां (Geopolitics crisis)

पाकिस्तानी जनता में सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात को लेकर है कि रहमतों के महीने ‘रमजान’ में पाकिस्तान अपनी सेना का इस्तेमाल अफगानिस्तान जैसे इस्लामी देश के खिलाफ कर रहा है। इसके लिए सीधे तौर पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जनता मान रही है कि नेतृत्व सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश को गलत दिशा में ले जा रहा है।

पाकिस्तान अफगानिस्तान से जंग में कैसे पिछड़ रहा है ?

यह एक कड़वी सच्चाई है कि जिस अफगान तालिबान को पाकिस्तान ने कभी पाला-पोसा था, आज वही उसके लिए नासूर बन गया है। पाकिस्तान इस मोर्चे पर कई कारणों से बुरी तरह पिट रहा है।

टीटीपी (TTP) को अफगान तालिबान का मौन समर्थन

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लड़ाके अफगान सीमा के भीतर सुरक्षित पनाहगाहों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे वहां से पाकिस्तान पर हमले करते हैं और वापस लौट जाते हैं। अफगान तालिबान वैचारिक रूप से टीटीपी के करीब है और पाकिस्तान के दबाव के बावजूद उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं कर रहा है।

गुरिल्ला युद्ध और भौगोलिक चुनौती: एक नजर

अफगान लड़ाके डूरंड लाइन (Durand Line) के दुर्गम पहाड़ी इलाकों से भली-भांति वाकिफ हैं। पारंपरिक युद्ध लड़ने वाली पाकिस्तानी सेना के लिए इस ऊबड़-खाबड़ इलाके में गुरिल्ला रणनीति से लड़ना बेहद चुनौतीपूर्ण और नुकसानदेह साबित हो रहा है।

कई मोर्चों पर बंटी पाकिस्तानी सेना

पाकिस्तानी सेना इस वक्त बलूचिस्तान में अलगाववादियों, देश के भीतर राजनीतिक अस्थिरता (इमरान खान समर्थकों का प्रदर्शन), और भारत से सटी पूर्वी सीमा पर उलझी हुई है। ऐसे में पश्चिमी सीमा (अफगानिस्तान) पर पूरा ध्यान केंद्रित करना उसके लिए संभव नहीं हो पा रहा है।

हथियारों और संसाधनों की कमी

पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था का सीधा असर सेना की रसद और संसाधनों पर पड़ रहा है। एक लंबे और थका देने वाले सीमा संघर्ष को जारी रखने के लिए जिस आर्थिक ताकत की जरूरत होती है, वह इस वक्त पाकिस्तान के पास नहीं है।

डूरंड लाइन का विवाद

अफगान तालिबान डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने से इनकार करता है। सीमा पर बाड़ लगाने (Fencing) की पाकिस्तान की कोशिशों को अफगान सैनिकों ने कई बार हिंसक तरीके से उखाड़ फेंका है, जिससे पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा है।

अपनी ही बोई हुई कूटनीतिक फसल काट रहा है पाकिस्तान

बहरहाल, पाकिस्तान आज अपनी ही बोई हुई कूटनीतिक फसल काट रहा है। वह न तो ईरान का सच्चा दोस्त बन पा रहा है और न ही अफगानिस्तान पर अपना पुराना दबदबा कायम रख पा रहा है। घरेलू मोर्चे पर जनता का यह गुस्सा आने वाले दिनों में पाकिस्तान सरकार और सेना के लिए और बड़ी मुसीबतें खड़ी कर सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *