जज पर झूठे आरोप लगाने के मामले में कार्रवाई रद्द:हाईकोर्ट– नियमों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, 6 हफ्ते में रजिस्ट्रार जनरल को रिपोर्ट सौंपे

जज पर झूठे आरोप लगाने के मामले में कार्रवाई रद्द:हाईकोर्ट– नियमों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, 6 हफ्ते में रजिस्ट्रार जनरल को रिपोर्ट सौंपे

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया है। इस व्यक्ति पर एक न्यायिक अधिकारी (जज) के खिलाफ झूठे आरोप लगाने का मामला दर्ज किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि यह कार्रवाई कानून में तय प्रक्रिया का पालन किए बिना शुरू की गई थी, इसलिए इसे जारी नहीं रखा जा सकता। हाईकोर्ट ने मामले की याचिका स्वीकार करते हुए कलंदरा और उससे जुड़ी सभी आगे की कार्रवाई रद्द कर दी। साथ ही डीजीपी को निर्देश दिया कि पुलिस के लिए चलाए गए जागरूकता कार्यक्रम की कंप्लायंस रिपोर्ट 6 हफ्ते के भीतर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को सौंपी जाए। जस्टिस सुमीत गोयल की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस स्टेशन हैबोवाल के एसएचओ द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने दाखिल किया गया कलंदरा कानून के अनुसार सही नहीं था। कोर्ट ने बताया कि इस मामले में मूल शिकायत एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को दी गई थी, इसलिए अगर शिकायत झूठी पाई जाती है तो कार्रवाई भी उसी अधिकारी या उससे बड़े अधिकारी द्वारा शुरू की जानी चाहिए थी। ज्यूडिशियल ऑफिसर के खिलाफ शिकायत जानकारी के अनुसार एक व्यक्ति ने एक ज्यूडिशियल ऑफिसर के खिलाफ शिकायत की थी, जिसे बाद में लुधियाना के पुलिस कमिश्नर के स्तर पर वरिष्ठ अधिकारी द्वारा जांच के लिए भेजा गया। जांच में आरोप साबित नहीं हुए और यह माना गया कि शिकायत झूठी थी। इसके बाद पुलिस स्टेशन हैबोवाल के एसएचओ को पंजाब पुलिस एक्ट की धारा 66 के तहत कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए गए। एसएचओ ने मजिस्ट्रेट के सामने कलंदरा दाखिल किया, जिस पर मजिस्ट्रेट ने 11 जून 2018 को नोटिस जारी कर दिया। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दी चुनौती याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि यह कार्रवाई कानून के खिलाफ है। उसका कहना था कि उसने शिकायत एक बड़े पुलिस अधिकारी को दी थी और जांच भी उसी स्तर पर हुई थी। ऐसे में अगर शिकायत झूठी पाई जाती है तो कार्रवाई वही अधिकारी या उससे बड़ा अधिकारी ही शुरू कर सकता है, न कि उससे छोटा अधिकारी। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने बिना कानूनी जांच किए और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर विचार किए बिना ही नोटिस जारी कर दिया। हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 195 के अनुसार कुछ मामलों में मुकदमा तभी चल सकता है जब संबंधित सरकारी अधिकारी या उससे वरिष्ठ अधिकारी लिखित शिकायत करे। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में शिकायत पुलिस कमिश्नर को दी गई थी, लेकिन कलंदरा एक अधीनस्थ अधिकारी यानी एसएचओ ने दाखिल किया। यह कानून के प्रावधानों के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट को पहले यह देखना चाहिए था कि मामला सुनवाई के योग्य है या नहीं, लेकिन बिना जांच के ही नोटिस जारी कर दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि कई बार झूठी शिकायतें करके न्याय व्यवस्था को परेशान किया जाता है। ऐसे मामलों को रोकने के लिए कानून में विशेष प्रावधान बनाए गए हैं, जैसे पंजाब पुलिस एक्ट की धारा 66, आईपीसी की धारा 182 और भारतीय न्याय संहिता की धारा 217। कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 195 और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 215 के तहत तय प्रक्रिया का पालन करना बहुत जरूरी है। इन नियमों को नजरअंदाज करना कानून का गलत इस्तेमाल है और इससे कोर्ट का समय और सरकारी संसाधन बेकार होते हैं। डीजीपी को दिए निर्देश हाईकोर्ट ने पंजाब के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) को निर्देश दिया कि राज्य भर के पुलिस अधिकारियों के लिए एक जागरूकता कार्यक्रम चलाया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि CrPC की धारा 195 और BNSS की धारा 215 का सख्ती से पालन हो। साथ ही कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यह जांच की जाए कि संबंधित एसएचओ ने कलंदरा दाखिल करते समय गलती की थी या जानबूझकर ऐसा किया था।

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