Director Lakshmipriya Devi expresses racism on discrimination: मणिपुरी भाषा की छोटी-सी फीचर फिल्म ‘बूंग’ ने ब्रिटिश एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन आर्ट्स (बाफ्टा) में देश-विदेश में खूब वाहवाही बटोरी है। ये पहली मणिपुरी फिल्म है, जिसने इतना बड़ा सम्मान हासिल किया है। इसपर फिल्म की राइटर-डायरेक्टर लक्ष्मीप्रिया देवी का कहना है कि इससे पहले भी मणिपुर की कई फिल्में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान पा चुकी हैं।
नॉर्थ-ईस्ट शब्द और भेदभाव करना है गलत
लक्ष्मीप्रिया देवी ने बताया कि रीमा दास की फिल्मों ने कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लिया और अवार्ड भी जीते हैं। साथ ही, उन्होंने 1981 की मणिपुरी फिल्म ‘इमागी निंगथेम’ और 1990 की ‘इशानौ’ का उल्लेख किया, जो विश्व प्रसिद्ध कान्स फिल्म फेस्टिवल सहित कई बड़े मंचों पर दिखाई जा चुकी हैं। ये फिल्में लक्ष्मीप्रिया की मौसी एम के बिनोदिनी देवी के द्वारा लिखी गई थीं।
साथ ही, उन्होंने आगे बताया, “नॉर्थ-ईस्ट भारत से कई फिल्में इंटरनेशनल लेवल पर सामने आई हैं, लेकिन नॉर्थ-ईस्ट में हर कोई खुद को नॉर्थईस्टर्न कहलाना पसंद नहीं करता, वो भी हम जैसे ही भारतीय है, नॉर्थ-ईस्ट शब्द और भेदभाव करना गलत है।” दरअसल, फिल्म ‘बूंग’ मणिपुर की पृष्ठभूमि पर बेस्ड है, लेकिन लक्ष्मीप्रिया ने इसे मणिपुरी पहचान को बढ़ावा देने के लिए नहीं बनाया। ये कहानी उनके बचपन के अनुभवों और पारिवारिक कहानियों से प्रेरित है।

फिल्म ‘बूंग’ एक छोटे लड़के की कहानी है
अगर इसकी कहानी की बात करें तो, फिल्म ‘बूंग’ एक छोटे लड़के की कहानी है, जो अपनी मां को खुश करने के लिए एक खास तोहफा देना चाहता है। अपने दोस्त राजू के साथ वो अपने घर में गैर-मौजूद पिता को वापस लाने के लिए निकल पड़ता है। इसका बाद फिल्म में बूंग का रोल गुगुन किपगेन ने निभाया है।
इतना ही नहीं, लक्ष्मीप्रिया ने आगे बताया कि इस फिल्म की शूटिंग बिना कोई कड़ा प्लान बनाए की गई। उन्होंने इसे “खुशनुमा हादसों की सीरीज” बताया और कहा कि मणिपुर में शमन जैसी मान्यताएं हैं, जिनसे ये फिल्म भी कुछ तरीकों से प्रभावित हुई। फिल्म ‘बूंग’ की सफलता ने न केवल मणिपुरी सिनेमा बल्कि पूरे भारत के इंडिपेंडट फिल्मों के लिए नए अवसर खोले हैं और दर्शकों द्वारा इसे खूब पसंद किया जा रहा है।


