बुढ़वा मंगल पर कभी सजती थी तवायफों की महफिल:ढोल, मंजिरा, हारमोनियम पर गाया जाता था फाग, मगध में अब किस हाल में है ये परंपरा

बुढ़वा मंगल पर कभी सजती थी तवायफों की महफिल:ढोल, मंजिरा, हारमोनियम पर गाया जाता था फाग, मगध में अब किस हाल में है ये परंपरा

‘हमारे समय में बुढ़वा मंगल शहर में मनाया जाता था। उस समय बुढ़वा मंगल की शाम होली के बाद आने वाले मंगलवार को टावर चौक के पास विराजमान बाल रूप में हनुमान जी प्रतिमा के सामने बड़ी महफ़िल सजती थी। भजन , होली के पारंपरिक गीत, ढोल मंजीरे हारमोनियम पर गाए जाते थे। पकवान बनवाया जाता था। हनुमान जी को 56 भोग लगते थे। फि वे बांटे जाते थे। उस वक्त शहर की नामचीन तवायफों को आमंत्रित किया जाता था। वे आतीं थीं और प्रस्तुति देतीं थी। केवल गीत संगीत की प्रस्तुति होती थी। उसमे उनके द्वारा नाच नहीं होते थे। रात भर महफ़िल सजती थी। 500 से 1000 लोगों की भीड़ होती थी। बहुत सलीके से लोग इस बुढ़वा मंगल का आनन्द उठाते थे। अब ऐसा देखने को नहीं मिलता है।’ गयाजी के नई गोदाम मोहल्ले में रहने वाले 87 साल के बुजुर्ग अर्जुन प्रसाद ने दैनिक भास्कर से मगध में मनाई जाने वाली बुढ़वा मंगल होली की ये बातें शेयर की। बुजुर्गों ने इस परंपरा के बारे में क्या बताया? आज मगध में बुढ़वा मंगल होली की परंपरा किस हाल में है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट। सबसे पहले जानिए, बुढ़वा मंगल होली को लेकर बुजुर्गों ने क्या कहा? अर्जुन प्रसाद बताते हैं कि होली के बाद मगध क्षेत्र में मनाया जाने वाला बुढ़वा मंगल कभी लोक उत्सव की पहचान हुआ करता था। होली के अगले मंगलवार को गांव-गांव में सामूहिक भोज, फगुआ गीत, ढोल-मांदर और मेल-मिलाप का आयोजन होता था। इसे बुजुर्गों के सम्मान और समाज में आपसी भाईचारे के पर्व के रूप में देखा जाता है। ग्रामीण इलाकों में लोग एक साथ बैठकर पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते थे। बुढ़वा मंगल का उद्देश्य होली की मस्ती के बाद समाज को एक मंच पर लाना और रिश्तों को मजबूत करना माना जाता है। खासकर मगध के गया, नवादा और औरंगाबाद के गांवों में इसकी अलग पहचान रही है। हालांकि बदलते समय के साथ इस परंपरा की चमक फीकी पड़ने लगी है। शहरों में यह आयोजन लगभग खत्म हो गया है, जबकि गांवों में भी सीमित स्तर पर ही कार्यक्रम हो रहे हैं। अर्जुन प्रसाद बताते हैं कि इसी तरह से शहर के विभिन्न कोने में व गांवों में भी बुढ़वा मंगल को छोटे छोटे ग्रुप में पारंपरिक लोकगीत चैतार हुआ करते थे। अब स्वरूप बदल गया है। खास बात यह भी थी कि कहीं कोई उदण्डता नहीं होती थी। बड़े ही अदब व नजाकत के साथ मनाया जाता था। एक से बढ़ कर एक रईस, जमींदार, नवाब व कारोबारी आया करते थे। भगवान हनुमान और भगवान शंकर के नाम पर आयोजित होता था बुढ़वा मंगल नवादा जिले के एक अन्य बुजुर्ग बताते हैं कि जब मेरा मकान गया शहर के गेवाल बिगहा में था तो उस समय बच्चा था। बुढ़वा मंगल भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए आयोजित होता था। उस दौरान गांव से लेकर शहर तक बुढ़वा मंगल को कहीं हनुमान जी के नाम पर तो कहीं शंकर भगवान के नाम पर आयोजित होते थे। पकवान बनते थे। भगवान को भोग लगाए जाते थे। होली के गीत संगीत व चैतार गाए जाते थे। अब यह लगभ विलुप्त सा हो गया है। इसका उद्देश्य मूल रूप से भाईचारा था। दूसरा कारण जो समझ आता है वह यह कि होली पर्व को उल्लास से मनाने के पीछे ये बड़ा वर्ग कारोबार में व्यस्त रहता था। वह बाद ही होली मनाया करता था। जो बुढ़वा मंगल तक चलता था। नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद, गया और अरवल में प्रचलित थीो परंपरा होली के अगले दिन मनाई जाने वाली बुढ़वा मंगल परंपरा नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद, गया और अरवल के साथ राजधानी पटना के कुछ इलाकों में प्रचलित थी। इस परंपरा के पीछे कई कहानियां हैं, जिसमें मगध के लोगों का मानना है कि ये परंपरा बुजुर्गों के सम्मान में निभाई जाती थी। ये अकेली ऐसी परंपरा है, जो बुजुर्गों को समर्पित है। अरवल के एक बुजुर्ग बताते हैं कि बचपन से ये परंपरा देखता आ रहा था, लेकिन अब इसकी चर्चा भी नहीं होती है। न आजकल के बच्चे इस परंपरा के बारे में जानते हैं, ये परंपरा हमारे साथ ही चला जाएगा। उन्होंने बताया कि कहानी के मुताबिक, मगध के एक बड़े जमींदार हुआ करते थे, जो एक बार होली वाले दिन ही बीमार पड़ गए थे। अब जानिए, कैसे शुरू हुई होली के अगले दिन की ये परंपरा बुजुर्ग बताते हैं कि जमींदार अपने ही नहीं आसपास के गांव के लोगों की भी मदद करते थे। जब लोगों ने सुना कि जमींदार साहब बीमार पड़ गए हैं, तो फिर कई गांव के लोगों ने उस साल होली नहीं खेली। उधर, जब ये बात जमींदार साहब को पता चला तो उन्होंने पहले तो आश्चर्य व्यक्त किया, फिर कहा कि कोई बात नहीं आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है, कल हम लोग होली खेलेंगे। इसी के बाद से होली के एक दिन बाद बुढ़वा मंगल होली की परंपरा शुरू हो गई। ‘हमारे समय में बुढ़वा मंगल शहर में मनाया जाता था। उस समय बुढ़वा मंगल की शाम होली के बाद आने वाले मंगलवार को टावर चौक के पास विराजमान बाल रूप में हनुमान जी प्रतिमा के सामने बड़ी महफ़िल सजती थी। भजन , होली के पारंपरिक गीत, ढोल मंजीरे हारमोनियम पर गाए जाते थे। पकवान बनवाया जाता था। हनुमान जी को 56 भोग लगते थे। फि वे बांटे जाते थे। उस वक्त शहर की नामचीन तवायफों को आमंत्रित किया जाता था। वे आतीं थीं और प्रस्तुति देतीं थी। केवल गीत संगीत की प्रस्तुति होती थी। उसमे उनके द्वारा नाच नहीं होते थे। रात भर महफ़िल सजती थी। 500 से 1000 लोगों की भीड़ होती थी। बहुत सलीके से लोग इस बुढ़वा मंगल का आनन्द उठाते थे। अब ऐसा देखने को नहीं मिलता है।’ गयाजी के नई गोदाम मोहल्ले में रहने वाले 87 साल के बुजुर्ग अर्जुन प्रसाद ने दैनिक भास्कर से मगध में मनाई जाने वाली बुढ़वा मंगल होली की ये बातें शेयर की। बुजुर्गों ने इस परंपरा के बारे में क्या बताया? आज मगध में बुढ़वा मंगल होली की परंपरा किस हाल में है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट। सबसे पहले जानिए, बुढ़वा मंगल होली को लेकर बुजुर्गों ने क्या कहा? अर्जुन प्रसाद बताते हैं कि होली के बाद मगध क्षेत्र में मनाया जाने वाला बुढ़वा मंगल कभी लोक उत्सव की पहचान हुआ करता था। होली के अगले मंगलवार को गांव-गांव में सामूहिक भोज, फगुआ गीत, ढोल-मांदर और मेल-मिलाप का आयोजन होता था। इसे बुजुर्गों के सम्मान और समाज में आपसी भाईचारे के पर्व के रूप में देखा जाता है। ग्रामीण इलाकों में लोग एक साथ बैठकर पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते थे। बुढ़वा मंगल का उद्देश्य होली की मस्ती के बाद समाज को एक मंच पर लाना और रिश्तों को मजबूत करना माना जाता है। खासकर मगध के गया, नवादा और औरंगाबाद के गांवों में इसकी अलग पहचान रही है। हालांकि बदलते समय के साथ इस परंपरा की चमक फीकी पड़ने लगी है। शहरों में यह आयोजन लगभग खत्म हो गया है, जबकि गांवों में भी सीमित स्तर पर ही कार्यक्रम हो रहे हैं। अर्जुन प्रसाद बताते हैं कि इसी तरह से शहर के विभिन्न कोने में व गांवों में भी बुढ़वा मंगल को छोटे छोटे ग्रुप में पारंपरिक लोकगीत चैतार हुआ करते थे। अब स्वरूप बदल गया है। खास बात यह भी थी कि कहीं कोई उदण्डता नहीं होती थी। बड़े ही अदब व नजाकत के साथ मनाया जाता था। एक से बढ़ कर एक रईस, जमींदार, नवाब व कारोबारी आया करते थे। भगवान हनुमान और भगवान शंकर के नाम पर आयोजित होता था बुढ़वा मंगल नवादा जिले के एक अन्य बुजुर्ग बताते हैं कि जब मेरा मकान गया शहर के गेवाल बिगहा में था तो उस समय बच्चा था। बुढ़वा मंगल भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए आयोजित होता था। उस दौरान गांव से लेकर शहर तक बुढ़वा मंगल को कहीं हनुमान जी के नाम पर तो कहीं शंकर भगवान के नाम पर आयोजित होते थे। पकवान बनते थे। भगवान को भोग लगाए जाते थे। होली के गीत संगीत व चैतार गाए जाते थे। अब यह लगभ विलुप्त सा हो गया है। इसका उद्देश्य मूल रूप से भाईचारा था। दूसरा कारण जो समझ आता है वह यह कि होली पर्व को उल्लास से मनाने के पीछे ये बड़ा वर्ग कारोबार में व्यस्त रहता था। वह बाद ही होली मनाया करता था। जो बुढ़वा मंगल तक चलता था। नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद, गया और अरवल में प्रचलित थीो परंपरा होली के अगले दिन मनाई जाने वाली बुढ़वा मंगल परंपरा नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद, गया और अरवल के साथ राजधानी पटना के कुछ इलाकों में प्रचलित थी। इस परंपरा के पीछे कई कहानियां हैं, जिसमें मगध के लोगों का मानना है कि ये परंपरा बुजुर्गों के सम्मान में निभाई जाती थी। ये अकेली ऐसी परंपरा है, जो बुजुर्गों को समर्पित है। अरवल के एक बुजुर्ग बताते हैं कि बचपन से ये परंपरा देखता आ रहा था, लेकिन अब इसकी चर्चा भी नहीं होती है। न आजकल के बच्चे इस परंपरा के बारे में जानते हैं, ये परंपरा हमारे साथ ही चला जाएगा। उन्होंने बताया कि कहानी के मुताबिक, मगध के एक बड़े जमींदार हुआ करते थे, जो एक बार होली वाले दिन ही बीमार पड़ गए थे। अब जानिए, कैसे शुरू हुई होली के अगले दिन की ये परंपरा बुजुर्ग बताते हैं कि जमींदार अपने ही नहीं आसपास के गांव के लोगों की भी मदद करते थे। जब लोगों ने सुना कि जमींदार साहब बीमार पड़ गए हैं, तो फिर कई गांव के लोगों ने उस साल होली नहीं खेली। उधर, जब ये बात जमींदार साहब को पता चला तो उन्होंने पहले तो आश्चर्य व्यक्त किया, फिर कहा कि कोई बात नहीं आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है, कल हम लोग होली खेलेंगे। इसी के बाद से होली के एक दिन बाद बुढ़वा मंगल होली की परंपरा शुरू हो गई।  

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