13 दिन तक बरसेगा फागुनी रंग, भीलवाड़ा में निकलेगी ‘मुर्दे की सवारी, मांडल में दिखेगा नाहर नृत्य

13 दिन तक बरसेगा फागुनी रंग, भीलवाड़ा में निकलेगी ‘मुर्दे की सवारी, मांडल में दिखेगा नाहर नृत्य
  • मेवाड़ अनूठी लोक परंपराओं के लिए विश्व विख्यात
  • तेरह दिन तक रहता है होली का उल्लास

मेवाड़ अपनी आन-बान-शान के साथ-साथ अपनी अनूठी लोक परंपराओं के लिए भी विश्व विख्यात है। जहां देशभर में होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी के साथ रंगों का उत्सव थम जाता है, वहीं वस्त्र नगरी भीलवाड़ा सहित पूरे मेवाड़ अंचल में होली का उल्लास अगले 13 दिनों तक परवान पर रहेगा। रियासतकालीन मान्यताओं और लोक संस्कृति के संगम के चलते यहाँ अलग-अलग स्थानों पर होली खेलने के तरीके भी निराले हैं।

प्रमुख आकर्षण: परंपराओं का अनूठा संगम

  • भीलवाड़ा शहर में मुर्दे की सवारी : (डोल) शीतला अष्टमी पर यहां ‘मुर्दे की सवारी’ निकालने की अजीबोगरीब परंपरा है। दोपहर बाद निकलने वाली इस सवारी को देखने के लिए जनसैलाब उमड़ता है।
  • मांडल में : नाहर नृत्य का रोमांच धुलंडी के 13 दिन बाद रंग तेरस पर मांडल में प्रसिद्ध नाहर नृत्य का आयोजन होगा। इसमें कलाकार शरीर पर रूई चिपकाकर शेर (नाहर) का रूप धरते हैं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर नृत्य करते हैं।
  • शाहपुरा : पांच दिवसीय फूलडोल मेला रामस्नेही संप्रदाय के केंद्र शाहपुरा में होलिका दहन के साथ ही प्रसिद्ध फूलडोल मेला शुरू हो जाता है। इस बार यह उत्सव 6 दिनों तक चलेगा। यानी 3 से 8 मार्च तक चलेगा।
  • बरूंदनी: लट्ठमार और कोड़ामार होली बरसाने की तर्ज पर बरूंदनी में शीतला अष्टमी पर महिलाएं पुरुषों पर लठ और कोड़े बरसाती हैं, जबकि पुरुष पानी की बौछारों से बचाव करते हैं।
  • भीलवाड़ा: शहर के पुराना भीलवाड़ा में जीनगर समाज की ओर से कोड़ा मार होली खेली जाती है। इसमें महिलाएं देवर पर कोडे बरसाती हैं तो देवर पानी के कडाव में भरे पानी से ढोलची के माध्यम से पानी को बोछार करके अपने को बचाने का प्रयास करता है।
  • विरासत का संरक्षण: यह 13 दिवसीय रंगोत्सव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मेवाड़ की उस गौरवशाली विरासत का प्रतीक है जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है।

इतिहास के झरोखे से: क्यों नहीं खेलती धुलंडी

मेवाड़ के कई हिस्सों, विशेषकर गंगापुर और आसपास के 12 गांवों में धुलंडी के दिन रंग नहीं खेला जाता। माना जाता है कि दशकों पहले मेवाड़ राजपरिवार में हुए शोक के कारण धुलंडी पर रंग खेलना बंद किया गया था। इसके बाद यहाँ सप्तमी या शीतला अष्टमी पर होली खेलने की परंपरा शुरू हुई। इनमें गंगापुर, बोराणा व कोशीथल में सप्तमी तथा पोटला, सहाड़ा व रायपुर में अष्टमी के दिन रंग खेलते है। हालांकि छोटे बच्चे जरूर रंग गुलाल खेलते है।

क्षेत्रवार खास आयोजन एक नज़र में

  • स्थान विशेषता परंपरा
  • कोठिया सप्तमी की होली बाजार में पानी भरकर लकड़ी खींचने की रस्म।
  • जहाजपुर बाबा की बारात मच्छीकरण बाबा की बारात और विवाह की रस्में।
  • बिजौलिया चारभुजा नाथ की सवारी धुलंडी व रंग तेरस पर भगवान के संग फूलों की होली।
  • गुलाबपुरा धुलंडी व अष्टमी दोनों दिन गुलाल से खेला जाता है फाग।

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