इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पीड़ित का बयान दोबारा रिकॉर्ड करने का निर्देश केवल विशेष परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है। कानून में एक बार बयान दर्ज करने का प्रावधान है। न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आजमगढ़ निवासी कीर्ति वर्मा की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। याची ने रानी की सराय थाने में बीएनएस की धारा 70(1), 352, 351(1), 61(2) के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई है। सही बयान न दर्ज करने का मामला याची के अनुसार उनका बयान सही तरीके से रिकॉर्ड नहीं किया गया और बीएनएसएस की धारा 183 का उल्लंघन हुआ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 183 के तहत बयान आमतौर पर एक बार ही रिकॉर्ड किया जाता है और दोबारा बयान रिकॉर्ड करने का निर्देश केवल उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया जा सकता है।
असाधारण मामलों में ही दोबारा बयान का आदेश दिया जा सकता है, जैसे यदि बयान जबरन लिया गया हो या गलत तरीके से रिकॉर्ड किया गया हो। पीड़ित की सच्चाई पर संदेह होने पर ही पुनः बयान रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि पीड़ित का बयान पढ़कर नहीं सुनाया गया है तो यह उसकी सच्चाई पर संदेह उत्पन्न कर सकता है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, एफटीसी ने 13जनवरी 2026 के आदेश में आवेदन खारिज कर दिया था।याची का बयान दर्ज करने के बाद पढ़ाया गया और हस्ताक्षर कराये गये।कोई ऐसी स्थिति नहीं जिसपर दुबारा बयान दर्ज करने का निर्देश दिया जाय।


