Tere Naam Re Release: पीवीआर और आईनॉक्स के ‘मंथ ऑफ लव’ के तहत 2003 की फिल्म ‘तेरे नाम’ दोबारा सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म का एल्बम और राधे की कल्ट फैन फॉलोइंग आज भी लोगों को आकर्षित करती है। जब आज रिश्तों में कंसेंट, बाउंड्रीज और सम्मान पर खुलकर बात हो रही है, तब तेरे नाम की कहानी समझ से परे लगती है।
प्यार या पीछा करना? (Tere Naam Re Release)
फिल्म में राधे का किरदार निरजरा से इकतरफा प्यार करता है। लेकिन ये प्यार जल्द ही जुनून और जिद में बदल जाता है। वो उसका पीछा करता है, उसे परेशान करता है और यहां तक कि उसे जबरन उठा ले जाता है। असल जिंदगी में ये व्यवहार अपराध की श्रेणी में आता है।
आज के दौर में हम जानते हैं कि ‘ना’ का मतलब ‘ना’ होता है। लेकिन फिल्म में नायिका का ‘ना’ आखिरकार ‘हां’ में बदलवा लिया जाता है। यही वो पॉइंट है जहां फिल्म एक गलत मैसेज देती है कि अगर लड़का लगातार कोशिश करे, चाहे वो गलत ही क्यों न हो, तो लड़की मान ही जाएगी।
टॉक्सिक हीरो का महिमामंडन (Tere Naam Re Release)
हिंदी सिनेमा में लंबे समय से ऐसे पुरुष किरदारों को रोमांटिक बना दिया जाता रहा है, जो असल में बेहद ‘इनसिक्योर’ और ‘टॉक्सिक’ होते हैं। कबीर सिंह हो या एनिमल, जुनून और अधिकार जताने को प्यार का रूप दे दिया जाता है।
तेरे नाम का राधे इस ट्रेंड का शायद सबसे बड़ा उदाहरण है। वो गुस्सैल है, हिंसक है और नियंत्रण की भावना से भरा हुआ है। लेकिन फिल्म उसे बड़े दिल वाला दिखाकर उसके व्यवहार को सही ठहराने की कोशिश करती है। यह दिखाया जाता है कि उसकी नीयत साफ है, इसलिए उसके गलत काम माफ किए जा सकते हैं।
जब माफी भी लड़की ही मांगे (Tere Naam Re Release)
फिल्म का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वो है, जब निरजरा खुद राधे से माफी मांगती है। वो उसके व्यवहार को गलत समझने के लिए खुद को दोषी मानती है। ये सीन दर्शकों को भावुक जरूर करता है, लेकिन एक खतरनाक सोच को मजबूत भी करता है कि अगर पुरुष का प्यार ‘सच्चा’ है, तो उसकी हिंसा भी जायज हो सकती है। आज जब महिलाएं अपने अधिकारों और आत्मसम्मान को लेकर जागरूक हैं, ऐसे दृश्य रूढ़िवीदी और असंवेदनशील लगते हैं।
2026 में इस कहानी की जगह?
फिल्में अपने समय का आईना होती हैं। 2003 में शायद इस कहानी को रोमांटिक त्रासदी की तरह देखा गया हो। लेकिन 2026 में, जब रिश्तों को लेकर सोच बदल रही है, तेरे नाम जैसी कहानी को ‘लव मंथ’ के नाम पर दोबारा पेश करना कई सवाल खड़े करता है।
क्या हमें पुराने कंटेंट को सिर्फ नॉस्टैल्जिया के नाम पर बिना सवाल किए स्वीकार कर लेना चाहिए? या फिर हमें यह समझना चाहिए कि प्यार का मतलब अधिकार नहीं, बराबरी और सम्मान है।


