टोंक। पीपलू उपखंड का सन्देडा क्षेत्र जैविक खेती की नई पहचान बनकर उभर रहा है। यहां शुरू हुई जैविक बेर की खेती ने न केवल किसानों की सोच बदली है, बल्कि कम लागत और कम पानी में लाखों की आमदनी का भरोसेमंद मॉडल भी पेश किया है। खेतों में लहलहाते जैविक बेर अब पीपलू की नई पहचान बनते जा रहे हैं। बनवाड़ा भुरवाली क्षेत्र में भी किसानों ने इस खेती की शुरुआत कर दी है।
कोरोना संकट से निकली नई राह
कोरोना काल में जब रोजगार के साधन ठप पड़ गए, तब सन्देडा के किसान दीनदयाल जाट ने हालात को अवसर में बदलने का निर्णय लिया। यूट्यूब पर खेती से जुड़े वीडियो देखकर उन्होंने जैविक बेर की खेती शुरू की। पहले ही साल करीब 1000 पौधे लगाए, जिनसे उम्मीद से ज्यादा उत्पादन मिला। सफलता से उत्साहित होकर अगले साल फिर 1000 पौधे लगाए गए। ये सभी पौधे चित्तौड़गढ़ से मंगवाए गए थे।
चार किस्मों से कर रहे काम
गांव में भाल सिंधूरी, रेड कश्मीर, थाई एप्पल और मिस इंडिया की खेती की जा रही है, जिनमें भाल सिंधूरी किस्म सबसे ज्यादा लोकप्रिय और अधिक पैदावार देने वाली साबित हो रही है।

चार किसानों से शुरू हुआ सफर, अब 50 बीघा में फैलाव
शुरुआत में दीनदयाल जाट के साथ प्रहलाद और हंसराज सहित चार किसानों ने 6 बीघा में इस खेती का प्रयोग शुरू किया। जब खेतों से अच्छा मुनाफा सामने आया, तो आसपास के किसान भी प्रेरित हुए। आज सन्देडा गांव में कई और किसान इस खेती से जुड़ चुके हैं और करीब 50 बीघा क्षेत्र में जैविक बेर की खेती हो रही है। अब यह खेती पूरे पीपलू उपखंड में तेजी से फैल रही है और सन्देडा फार्म जैविक खेती का मॉडल बन चुका है।
जयपुर से दिल्ली तक बढ़ी मांग
सन्देड़ा क्षेत्र में उगाए जा रहे जैविक बेरों की बाजार में जबरदस्त मांग है। किसान पिकअप वाहनों के जरिए अपनी उपज सीधे दिल्ली, जयपुर, अजमेर और नागौर की मंडियों तक पहुंचा रहे हैं। बाजार में इन बेरों का भाव 30 से 40 रुपए प्रति किलो तक मिल रहा है, जिससे किसानों को सीधा और बेहतर मुनाफा हो रहा है। जैविक बेर की खेती की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत और कम पानी की आवश्यकता है।

फैक्ट फाइल
- एक बीघा में लगभग 200 पौधे
- सालभर में केवल 2–3 बार सिंचाई की जरूरत
- साल में एक बार जैविक स्प्रे
- पहले ही साल से फल देना शुरू
उत्पादन का अनुमान
- पहले साल में 10–15 किलो प्रति पौधा
- तीन साल बाद 50 किलो से लेकर एक क्विंटल तक प्रति पौधा
- एक बीघा भूमि से 2 से 2.5 लाख रुपए तक की आमदनी
सरकार से मिले सहयोग
किसान दीनदयाल जाट का कहना है कि जब उन्होंने इस खेती की शुरुआत की थी, तब किसी प्रकार की सब्सिडी नहीं मिली। यदि बागवानी फसलों पर सरकारी अनुदान मिले, तो और अधिक किसान इस ओर आकर्षित होंगे।
दीनदयाल चौधरी का कहना है कि जैविक खेती भविष्य की खेती है, लेकिन इसके लिए सरकार से पर्याप्त सहयोग और तकनीकी सहायता मिलनी चाहिए।
इनका कहना है-
पहले पीपलू में उद्यान विभाग की ओर से केवल अमरूद, पपीता और नींबू पर सब्सिडी दी जाती थी, लेकिन अब विभाग की सभी फसलों पर अनुदान उपलब्ध होगा। -राम अवतार गुर्जर, सहायक कृषि अधिकारी, पीपलू


