हम सालभर पर्यावरण प्रदूष्रण और संरक्षण पर केवल चर्चा करते हैं। लेकिन इस बार होली पर हर प्रदेशवासी एक पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे सकता है। आपको करना कुछ नहीं है, केवल होलिका दहन के लिए हरे-भरे पेड़ों की कटाई करने के बजाय गो-काष्ठ (गोबर से बनी लकड़ी) का उपयोग करें। और यह गो-काष्ठ भी आपको प्रदेश के 129 गोशालाओं में नि:शुल्क मिल जाएगा। इससे एक तरफ पेड़ों की कटाई रुकेगी वहीं पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।
पेड़ों की लकड़ी जलने के बाद उसकी राख फेंक दी जाती है, लेकिन गो-काष्ठ की राख एक बेहतरीन जैविक खाद के रूप में खेतों में उपयोग की जा सकती है। इससे जलने से हानिकारक काला धुआं नहीं निकलता और आंखों में जलन की समस्या पैदा नहीं होती है।
इस बार राजस्थान गोपालन विभाग ने यह अनूठी पहल की है। प्रदेश की जिन गोशालाओं में 1000 से अधिक गोवंश पंजीकृत हैं, उसी गोशाला में गो-काष्ठ बनाने की मशीन उपलब्ध करवाई गई है। शुरुआती दौर में 100 चयनित गोशालाओं में मशीन उपलब्ध करवाई गई थी। अब प्रदेश की 129 गोशालाओं में मशीन लगी हुई है। गत वर्ष बाड़मेर जिले की 6 गोशालाओं को गो-काष्ठ मशीन उपलब्ध करवाई है, जहां से आमजन आसानी से होलिका दहन हेतु निःशुल्क गो-काष्ठ ले सकते हैं।
वैज्ञानिक पहलू : वायुमंडल में सूक्ष्म कीटाणु खत्म होते हैं
विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य लकड़ी की तुलना में गो-काष्ठ में नमी की मात्रा मात्र 2-3 प्रतिशत होती है, जिसके कारण इसके दहन से हानिकारक काला धुआं नहीं निकलता। आंखों में जलन की समस्या पैदा नहीं होती है। इसकी उच्च ऊर्जा क्षमता और 8000 कैलोरिफिक वैल्यू इसे होलिका दहन के लिए आदर्श ईंधन बनाती है। इसके जलने से निकलने वाली गैसें वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश कर वातावरण को आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों रूपों में शुद्ध करने का सामर्थ्य रखती हैं।
राख से संवरेगी खेतों की सेहत
गो-काष्ठ के जलने के बाद बची हुई राख एक बेहतरीन जैविक खाद के रूप में कार्य करती है। इस राख को खेतों और बगीचों में डालकर मिट्टी की उर्वरता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाया जा सकता है। साथ ही किसानों की लागत घटाकर आत्मनिर्भर, जैविक और सतत खेती को प्रोत्साहित करती है।
इन गोशालाओं में मिलेगा गो-काष्ठ
1. श्री गोपाल गोशाला गेंहू रोड, बाड़मेर
2. कांजी हाउस नंदी गोशाला, नगर परिषद बाड़मेर
3. श्री मोहन गोशाला दांता, बाड़मेर
4. श्री मामडियाई गोशाला सेवा समिति, आकड़ली बक्शीराम, पचपदरा
5. श्री सुमेर गोशाला, बाड़मेर
6. श्री जीव दया गौ सेवा संघ गोशाला, सिवाना
हर साल होलिका दहन के लिए लाखों टन हरी लकड़ियों का उपयोग होता आया है, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। इसे देखते हुए यह पहल की है। आमजन से आग्रह है कि वे ‘हरित होली: गो-काष्ठ होली’ का संकल्प लेकर पर्यावरण संरक्षण में सहभागी बनें।
– डॉ. नारायणसिंह सोलंकी, संयुक्त निदेशक, पशुपालन विभाग
गो-काष्ठ का उपयोग न केवल हमारी सांस्कृतिक आस्था के अनुरूप है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे जहां पेड़ों की कटाई में कमी आएगी, वहीं वनों का संरक्षण होगा तथा कार्बन उत्सर्जन भी घटेगा।
-डाॅ. अजयनाथ गोस्वामी, जिला गोशाला प्रभारी, गोपालन विभाग, बाड़मेर
गो-काष्ठ उत्पादन
– 30-40 क्विंटल प्रतिदिन एक गोशाला में (औसतन 35 क्विंटल लगभग)
– 210 क्विंटल प्रतिदिन बाड़मेर जिले की छह गोशालाओं में
– 4515 क्विंटल प्रति दिन प्रदेश की 129 गोशालाओं में


