देश के 12 करोड़ से अधिक प्राकृतिक पूजक आदिवासियों के लिए आदिवासी/सरना धर्म कोड की मांग अब दिल्ली तक पहुंच चुकी है। बुधवार को झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना समेत अन्य राज्यों के आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में धरना दिया। धरने के बाद प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया। इसमें राष्ट्रीय जनगणना 2027 के पूर्व जनगणना प्रपत्र में सरना कोड देने की मांग की। चेतावनी दी गई कि अगर धर्म कोड नहीं मिला तो होनेवाली राष्ट्रीय गणना का विरोध किया जाएगा। राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति भारत के बैनर तले हुए धरना में संगठन के संयोजक पूर्व मंत्री देव कुमार धान ने बताया कि इस बार करो या मरो की स्थिति है। अगर इस बात चूक गए तो फिर दस साल तक केवल चिल्लाते रह जाओगे। गणना नहीं होने से हमारे हक एवं अधिकार छीने जा रहे हैं। परिसीमन भी जनसंख्या के अनुपात से होना है। अगर संख्या कम हुई तो कई आदिवासी अधिकारों से वंचित हो जाएंगे। 1931 में हमारा धर्म कॉलम था, जिसे 1961 में हटा दिया गया। उसे फिर से बहाल किया जाना चाहिए। इस मौके पर रामलाल उरांव, बेणेश्वर उरांव, तेतर उरांव, शिवा कच्छप, बुधवा उरांव, बलक उरांव अभय भुटकुवंर, प्रेम शाही मुंडा, दर्शन गंझू, आशुतोष सिंह चेरो, अल्मा उरांव, अरविन्द उरांव, दिनेश उरांव, नारायण उरांव, मुड़वा हेरेंज, धर्मपाल भगत, मुसुदी टुडू, सुनिल उरांव कालेश्वर गंझू, शिवशंकर उरांव ने अपने-अपने विचार रखे। देश के 12 करोड़ से अधिक प्राकृतिक पूजक आदिवासियों के लिए आदिवासी/सरना धर्म कोड की मांग अब दिल्ली तक पहुंच चुकी है। बुधवार को झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना समेत अन्य राज्यों के आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में धरना दिया। धरने के बाद प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया। इसमें राष्ट्रीय जनगणना 2027 के पूर्व जनगणना प्रपत्र में सरना कोड देने की मांग की। चेतावनी दी गई कि अगर धर्म कोड नहीं मिला तो होनेवाली राष्ट्रीय गणना का विरोध किया जाएगा। राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति भारत के बैनर तले हुए धरना में संगठन के संयोजक पूर्व मंत्री देव कुमार धान ने बताया कि इस बार करो या मरो की स्थिति है। अगर इस बात चूक गए तो फिर दस साल तक केवल चिल्लाते रह जाओगे। गणना नहीं होने से हमारे हक एवं अधिकार छीने जा रहे हैं। परिसीमन भी जनसंख्या के अनुपात से होना है। अगर संख्या कम हुई तो कई आदिवासी अधिकारों से वंचित हो जाएंगे। 1931 में हमारा धर्म कॉलम था, जिसे 1961 में हटा दिया गया। उसे फिर से बहाल किया जाना चाहिए। इस मौके पर रामलाल उरांव, बेणेश्वर उरांव, तेतर उरांव, शिवा कच्छप, बुधवा उरांव, बलक उरांव अभय भुटकुवंर, प्रेम शाही मुंडा, दर्शन गंझू, आशुतोष सिंह चेरो, अल्मा उरांव, अरविन्द उरांव, दिनेश उरांव, नारायण उरांव, मुड़वा हेरेंज, धर्मपाल भगत, मुसुदी टुडू, सुनिल उरांव कालेश्वर गंझू, शिवशंकर उरांव ने अपने-अपने विचार रखे।


