कॉकलियर इंप्लांट से सुनने की क्षमता आ सकती है वापिस: डॉ. राजीव कपिला

लुधियाना| इंटरनेशनल कॉकलियर इंप्लांट दिवस के मौके पर ईएनटी स्पेशलिस्ट डॉ. राजीव कपिला ने पहचान और इलाज में देरी के कारण सुनने की क्षमता खोने वाले नवजात और व्यस्कों को आने वाली समस्याओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन(डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 43.2 करोड़ व्यस्क और 36 करोड़ बच्चे सुन पाने में सक्षम नहीं हैं। जो कि विश्व की 5 फीसदी आबादी है। पैदा होने वाले 1000 बच्चों में से 4 बच्चे बहरे पैदा होते हैं, जिन्हें कॉकलियर इंप्लांट की जरूरत होती है। इन चौंकाने वाले आंकड़ों के बावजूद जागरूकता की कमी है। सुनने की क्षमता एक तय स्तर से ज्यादा प्रभावित होने के कारण नवजन्मे बच्चे गूंगे, बहरे पैदा हो सकते हैं। इससे उनके जीवनयापन में मुश्किल आ सकती है। इस समस्या से जूझने वाले बच्चों के लिए कॉकलियर इंप्लांट एक जरिया हो सकता है, जिससे वो बेहतर जीवन जी सकें। पैदा होने के एक साल के अंदर इलाज हो तो बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। 6 साल की उम्र के बाद न्यूरल प्लास्टी के कारण बेहतर रिजल्ट नहीं मिल पाते। सुनने की क्षमता की जांच के लिए पेरेंट्स यह देख सकते हैं कि बच्चा ऊंची आवाज पर रिस्पांस कर रहा है या नहीं, जोर की आवाज पर आंख झपकना, तुरंत उठना, नई आवाज में दिलचस्पी दिखाना, आवाज की दिशा में सिर या आंखों को घूमाना, छोटे-छोटे शब्द बोलना या कॉपी करना से जांचा जा सकता है। अगर बच्चा आवाज पर तुरंत रिस्पांस नहीं करता तो जांच जरुर करवाएं। जल्द पहचान से इलाज भी जल्द संभव होता है। वहीं, व्यस्क जो अपनी सुनने की क्षमता खो देते हैं वो कॉकलियर इंप्लांट से सुनने की क्षमता फिर से हासिल कर सकते हैं। जानकारी न होने के कारण 20 में से 1 व्यस्क ही अपनी सुनने की क्षमता को वापिस हासिल कर सकते हैं।

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