केंद्र सरकार ने ऊर्जा नीति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए एक अप्रैल 2026 से देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 20 प्रतिशत तक एथनॉल मिश्रित और न्यूनतम 95 रॉन वाले पेट्रोल की बिक्री अनिवार्य कर दी है। 17 फरवरी को जारी अधिसूचना में पेट्रोलियम मंत्रालय ने तेल कंपनियों को भारतीय मानक ब्यूरो के विनिर्देशों के अनुसार ई20 पेट्रोल की आपूर्ति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। विशेष परिस्थितियों में कुछ क्षेत्रों को सीमित अवधि के लिए छूट दी जा सकती है, परंतु व्यापक रूप से यह व्यवस्था पूरे देश में लागू होगी।
यह फैसला केवल ईंधन की गुणवत्ता में तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और कृषि अर्थव्यवस्था को साथ लेकर चलने वाली व्यापक रणनीति का हिस्सा है। एथनॉल गन्ने, मक्का और अन्य अनाज से तैयार किया जाता है। यह घरेलू स्तर पर उत्पादित, नवीकरणीय और अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक एथनॉल मिलाने से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी। तेल मंत्रालय के अनुसार 2014-15 से अब तक पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण के कारण देश ने विदेशी मुद्रा में 1.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत की है।
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हम आपको याद दिला दें कि केंद्र सरकार ने जून 2022 में 10 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण का लक्ष्य तय समय से पांच महीने पहले हासिल कर लिया था। इसी सफलता से उत्साहित होकर 20 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य 2030 से पहले यानि 2025-26 कर दिया गया। वर्तमान में देश के अधिकांश पेट्रोल पंपों पर ई20 पेट्रोल उपलब्ध है, लेकिन अब इसे अनिवार्य स्वरूप दिया जा रहा है।
इस नीति का एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू न्यूनतम 95 रॉन पर जोर है। रॉन यानी रिसर्च ऑक्टेन नंबर ईंधन की इंजन नॉकिंग के प्रति प्रतिरोध क्षमता का माप है। नॉकिंग तब होती है जब ईंधन इंजन के भीतर असमान रूप से जलता है, जिससे पिंगिंग जैसी आवाज आती है और समय के साथ इंजन को नुकसान पहुंच सकता है। रॉन जितना अधिक होगा, ईंधन उतना ही अधिक दबाव और कंप्रेशन में स्थिर रहेगा। सरल शब्दों में कहें तो यह ईंधन की दबाव में आत्म नियंत्रण क्षमता है।
एथनॉल का स्वयं का रॉन मान लगभग 108 के आसपास होता है, जो पेट्रोल की तुलना में अधिक है। इसलिए जब पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाया जाता है तो कुल मिश्रण की नॉकिंग प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। हालांकि, इंजन को सुरक्षित रखने के लिए न्यूनतम 95 रॉन अनिवार्य किया गया है, ताकि मिश्रण के बावजूद ईंधन की गुणवत्ता में कोई कमी न आए।
उद्योग सूत्रों का कहना है कि 2023 से 2025 के बीच भारत में निर्मित अधिकांश वाहन ई20 पर चलने के लिए डिजाइन किए गए हैं। ऐसे वाहनों में किसी बड़ी समस्या की आशंका नहीं है। लेकिन पुराने वाहनों के लिए कुछ चुनौतियां सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक माइलेज में तीन से सात प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। इसके अलावा रबड़ और प्लास्टिक के कुछ पुर्जों के जल्दी घिसने या खराब होने की संभावना भी जताई गई है।
देखा जाये तो सरकार के इस निर्णय के व्यापक निहितार्थ कई स्तरों पर दिखाई देंगे। एक तो ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर यह कदम भारत की आयात निर्भरता को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उतार चढ़ाव का सीधा असर भारत के चालू खाते और महंगाई पर पड़ता है। एथनॉल मिश्रण बढ़ने से यह दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।
इसके अलावा, पर्यावरणीय दृष्टि से एथनॉल मिश्रण से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है। एथनॉल अपेक्षाकृत स्वच्छ रूप से जलता है और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने में सहायक होता है। यह भारत के जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप भी है।
साथ ही इससे कृषि क्षेत्र को सीधा लाभ मिलने की संभावना है। गन्ने, मक्का और अन्य अनाज की मांग बढ़ने से किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलेगा। इससे कृषि अधिशेष का बेहतर उपयोग होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिल सकता है। हालांकि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि खाद्य सुरक्षा और ईंधन उत्पादन के बीच संतुलन बना रहे।
समग्र रूप से देखा जाए तो ई20 और 95 रॉन की अनिवार्यता ऊर्जा, पर्यावरण और कृषि को एक साथ जोड़ने वाली नीति है। आने वाले समय में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वाहन अनुकूलन, उपभोक्ता जागरूकता और आपूर्ति तंत्र को किस तरह संतुलित और सुदृढ़ किया जाता है।


