आज के आधुनिक जमाने में कई नए म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट आ चुके हैं, लेकिन आज भी राजस्थान के पारंपरिक वाद्ययंत्रों का चलन बरकरार है। प्रदेश के जैसलमेर में रहने वाले 60 वर्षीय मोहनलाल का परिवार भी कई पीढ़ियों से मोरचंग सहित अलग अलग वाद्ययंत्र बना रहा है। इस मौके जोधपुर में एक कार्यक्रम के सिलसिले में उन्होंने दैनिक भास्कर से बात की।
खास बात ये है कि ये छोटा-सा वाद्य यंत्र मुंह से ही बजाया जाता है। दिखने में छोटा सा, लेकिन ये चंग सुनने में बेहद मधुर लगता है। मोहनलाल ने बताया कि उन्होंने पिताजी से सीखा। पिताजी से पहले दादाजी ने शुरू किया। इसे लकड़ी और धातु से बनाते हैं, जो राजस्थानी लोक संगीत का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने बताया कि विदेशी पर्यटक भी इसकी मिठास सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। मोहनलाल की कला मारवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रख रही है। आने वाले मेले में ये चंग फिर गूंजेगा। मोर चंग क्या है बता दें कि मोर चंग एक पारंपरिक राजस्थानी झांझर जैसा वाद्य यंत्र है। मोर की चोंच जैसी आकृति वाला ये लकड़ी और धातु से बना होता है। दो छोटे चंग (झांझ) एक लकड़ी के फ्रेम से जुड़े होते हैं। इतिहासकारों के अनुसार, ये 200 साल से ज्यादा पुराना है। 19वीं सदी में जैसलमेर-बाड़मेर के लोक कलाकारों ने इसे विकसित किया। भजन, होली और लोक नृत्य में ये मधुर स्वर बिखेरता है। इसे मुंह से ही बजाया जाता है। कलाकार चंग को मुंह में रखकर सांस से कंपन पैदा करता है। जीभ और होंठों से ताल बदलते हैं, जिससे मोर की चहचहाहट जैसे 7-8 स्वर निकलते हैं। दिखने में छोटा, लेकिन धुन इतनी मधुर कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।


