समस्तीपुर के मनोज कुमार पपीता की प्राकृतिक खेती कर कर रहे हैं। घर बैठे 40 हजार रुपए तक महीने का इनकम हो रहा है। 50 से अधिक लोग भी इनके खेत से पपीता ले जाते हैं और डिलिवरी देते हैं। उनकी भी 15-20 हजार रुपए तक कमाई हो जाती है। प्राकृतिक विधि से उपजे पपीता का स्वाद बाजार में उपलब्ध पपीता के स्वाद से अलग है। इस पपीते की मांग समस्तीपुर के साथ ही सीमावर्ती मुजफ्फरपुर, रोसड़ा, कल्याणपुर आदि इलाकों से लोग करते हैं। हालंकि मांग के हिसाब से मनोज आपूर्ति नहीं कर पाते हैं। किसान मनोज बताते हैं कि पहले यह भी पारंपरिक आलू, गेंहू, मक्का की खेती करते थे। करीब 10 साल पहले यह कृषि वैज्ञान केंद्र विरौली के संपर्क में आए। जहां के वैज्ञानिकों ने लीक से हट कर पपीता की खेती करने की सलाह दी। इसके लिए उन्होंने 15 दिनों की ट्रेनिंग भी दी। जिसके बाद इन्होंने पहले पांच कठ्ठे में खेती की। एक एकड़ में करीब 1000 पपीता के पौधे लगा रखे अच्छी उपज नहीं होने के कारण मनोज को नुकसान हो गया, फिर उन्होंने तायबानी पपीता का पेड़ लगाया, लेकिन लाभ नहीं बढा। केवीके ने फिर प्रोत्साहित किया। अब मनोज पिछले 4 साल से पूना सलेक्सन बीज से प्राकृतिक तरीके से खेती कर रहे हैं। अच्छी उपज के साथ ही इसके स्वाद के कारण डिमांड बढ़ने लगा। अभी एक एकड़ में करीब 1000 पपीता के पौधे लगा रखे हैं। एक पौधे से एक महीने में कम से कम 80 किलो पीपीता तोड़ते हैं। डिमांड के हिसाब से मनोज लोगों को आपूर्ति देते हैं। खास कर अधिकारिक वर्ग इस पपीता को काफी पसंद करता है। 5-6 महीने में पेड़ हो जाते तैयार मनोज ने बताया कि प्राकृतिक तरीके से खेती करने में एक पपीता पेड़ लगाने से लेकर फल आने की प्रक्रिया में 5-6 महीने का समय लगाता है। आठ महीने में पपीता तैयार हो जाता है। इसकी बिक्री शुरू हो जाती है। कैसे तैयार करते हैं खेत मनोज ने बताया कि अच्छी तरह से तैयार खेत में 1.25 x 1.25 मीटर की दूरी पर 50 x 50 x 50 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ दिया जाता है। ताकि गड्ढों को अच्छी तरह धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु वगैरह नष्ट हो जाए। उंची बढ़ने वाली किस्मों के लिए1.8×1.8 मीटर फासला रखते हैं। पौधे लगाने के बाद गड्ढे को मिट्टी और गोबर की खाद, वर्मी मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊंचा रहे। गड्ढे की भराई के बाद सिंचाई की जाती है, जिससे मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाती है।
वैसे पपीते के पौधे जून-जुलाई या फरवरी-मार्च में लगाए जाते हैं, पर ज्यादा बारिश-सर्दी वाले इलाकों में सितंबर या फरवरी-मार्च में लगते हैं। जब तक पौधे अच्छी तरह पनप न जाएं, तब तक रोजाना दोपहर बाद हल्की सिंचाई जरूरी है। समस्तीपुर के मनोज कुमार पपीता की प्राकृतिक खेती कर कर रहे हैं। घर बैठे 40 हजार रुपए तक महीने का इनकम हो रहा है। 50 से अधिक लोग भी इनके खेत से पपीता ले जाते हैं और डिलिवरी देते हैं। उनकी भी 15-20 हजार रुपए तक कमाई हो जाती है। प्राकृतिक विधि से उपजे पपीता का स्वाद बाजार में उपलब्ध पपीता के स्वाद से अलग है। इस पपीते की मांग समस्तीपुर के साथ ही सीमावर्ती मुजफ्फरपुर, रोसड़ा, कल्याणपुर आदि इलाकों से लोग करते हैं। हालंकि मांग के हिसाब से मनोज आपूर्ति नहीं कर पाते हैं। किसान मनोज बताते हैं कि पहले यह भी पारंपरिक आलू, गेंहू, मक्का की खेती करते थे। करीब 10 साल पहले यह कृषि वैज्ञान केंद्र विरौली के संपर्क में आए। जहां के वैज्ञानिकों ने लीक से हट कर पपीता की खेती करने की सलाह दी। इसके लिए उन्होंने 15 दिनों की ट्रेनिंग भी दी। जिसके बाद इन्होंने पहले पांच कठ्ठे में खेती की। एक एकड़ में करीब 1000 पपीता के पौधे लगा रखे अच्छी उपज नहीं होने के कारण मनोज को नुकसान हो गया, फिर उन्होंने तायबानी पपीता का पेड़ लगाया, लेकिन लाभ नहीं बढा। केवीके ने फिर प्रोत्साहित किया। अब मनोज पिछले 4 साल से पूना सलेक्सन बीज से प्राकृतिक तरीके से खेती कर रहे हैं। अच्छी उपज के साथ ही इसके स्वाद के कारण डिमांड बढ़ने लगा। अभी एक एकड़ में करीब 1000 पपीता के पौधे लगा रखे हैं। एक पौधे से एक महीने में कम से कम 80 किलो पीपीता तोड़ते हैं। डिमांड के हिसाब से मनोज लोगों को आपूर्ति देते हैं। खास कर अधिकारिक वर्ग इस पपीता को काफी पसंद करता है। 5-6 महीने में पेड़ हो जाते तैयार मनोज ने बताया कि प्राकृतिक तरीके से खेती करने में एक पपीता पेड़ लगाने से लेकर फल आने की प्रक्रिया में 5-6 महीने का समय लगाता है। आठ महीने में पपीता तैयार हो जाता है। इसकी बिक्री शुरू हो जाती है। कैसे तैयार करते हैं खेत मनोज ने बताया कि अच्छी तरह से तैयार खेत में 1.25 x 1.25 मीटर की दूरी पर 50 x 50 x 50 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ दिया जाता है। ताकि गड्ढों को अच्छी तरह धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु वगैरह नष्ट हो जाए। उंची बढ़ने वाली किस्मों के लिए1.8×1.8 मीटर फासला रखते हैं। पौधे लगाने के बाद गड्ढे को मिट्टी और गोबर की खाद, वर्मी मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊंचा रहे। गड्ढे की भराई के बाद सिंचाई की जाती है, जिससे मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाती है।
वैसे पपीते के पौधे जून-जुलाई या फरवरी-मार्च में लगाए जाते हैं, पर ज्यादा बारिश-सर्दी वाले इलाकों में सितंबर या फरवरी-मार्च में लगते हैं। जब तक पौधे अच्छी तरह पनप न जाएं, तब तक रोजाना दोपहर बाद हल्की सिंचाई जरूरी है।


