लखनऊ के राज्य संग्रहालय में रविवार को ‘कला अभिरुचि पाठ्यक्रम’ की व्याख्यान श्रृंखला के तहत विशेष चर्चा की । इस कार्यक्रम का विषय ‘व्हाई वन शुड विजिट द म्यूजियम’ (संग्रहालय क्यों जाना चाहिए) था।यह आयोजन संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के सहयोग से हुईं।इस व्याख्यान में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संग्रहालय विज्ञान विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष ऊषा रानी तिवारी मुख्य वक्ता रहीं। डॉ. मीनाक्षी खेमका ने मुख्य वक्ता ऊषा रानी तिवारी का स्वागत करते हुए उनका संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। व्याख्यान का मुख्य उद्देश्य लोगों को संग्रहालयों के महत्व और उनकी भूमिका के प्रति जागरूक करना था। अपने व्याख्यान में ऊषा रानी तिवारी ने स्पष्ट किया कि हर वह स्थान संग्रहालय नहीं होता जहां पुरानी वस्तुएं रखी हों। उन्होंने बताया कि संग्रहालय की एक स्पष्ट परिभाषा और उद्देश्य होता है। संग्रहालय शिक्षा और ज्ञान साझा करने का एक महत्वपूर्ण मंच इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्यूजियम (आईकॉम) द्वारा दी गई नई परिभाषा के अनुसार, संग्रहालय समाज की सेवा करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था है।आईकॉम के अनुसार, संग्रहालय मूर्त और अमूर्त विरासत का शोध, संरक्षण, संग्रह और प्रदर्शन करते हैं। वे सभी के लिए खुले, समावेशी और सुलभ होते हैं, जो विविधता, स्थिरता और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देते हैं। इसके साथ ही , संग्रहालय शिक्षा, मनोरंजन और ज्ञान साझा करने का एक महत्वपूर्ण मंच भी प्रदान करते हैं। मुख्य वक्ता ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संग्रहालयों का उदाहरण देते हुए एक चिंताजनक पहलू पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज तकनीकी उपकरणों के बढ़ते उपयोग के कारण लोग संग्रहालयों से दूर हो रहे हैं। मोबाइल और डिजिटल माध्यमों ने लोगों का ध्यान बांट दिया है, जिससे संग्रहालयों में रुचि घट रही है। चित्रों और उदाहरणों के माध्यम से संग्रहालयों की जानकारी दी हालांकि, ऊषा रानी तिवारी ने कहा कि संग्रहालय का प्रत्यक्ष अनुभव आज भी अनमोल है और डिजिटल माध्यम इसका विकल्प नहीं हो सकते। उन्होंने चित्रों और उदाहरणों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के संग्रहालयों की जानकारी दी और उनके महत्व पर विस्तार से चर्चा की।कार्यक्रम के अंत में, निदेशक विनय कुमार सिंह ने मुख्य वक्ता ऊषा रानी तिवारी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन सहायक निदेशक मीनाक्षी खेमका ने किया।


