भदोही में पवित्र माह-ए-रमजान का आगाज हो गया है। इसके साथ ही स्थानीय बाजारों में रौनक बढ़ गई है। मुस्लिम समुदाय के लोग सेहरी और इफ्तार के लिए खजूर, फल, मेवे और अन्य खाद्य पदार्थों की खरीदारी में जुटे हैं।रोजा रखने की शुरुआत सुबह सूरज निकलने से पहले ‘सेहरी’ के साथ होती है। सेहरी में ऐसे खाद्य पदार्थ खाए जाते हैं जो दिनभर ऊर्जा प्रदान कर सकें। रोजा रखने से पहले ‘नियत’ करना आवश्यक है, जिसका अर्थ है अल्लाह की रजा के लिए रोजा रखने का दृढ़ इरादा करना। सेहरी में दूध, ब्रेड और अंडे जैसे उत्पादों की मांग अधिक रहती है। शाम को सूर्यास्त के बाद इफ्तार (रोजा खोलना) किया जाता है। इफ्तार के लिए घरों और बाजारों में खजूर, ताजे फल, दही, पकौड़े, इमरती और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों की भारी मांग देखी जा रही है। हालांकि, सेहरी और इफ्तार की वस्तुओं पर महंगाई का असर भी दिख रहा है, लेकिन रोजेदारों के उत्साह के आगे इसका कोई प्रभाव नहीं है। खरीदारी बढ़ने से दुकानदार भी खुश हैं। हाफिज अब्दुल अजीम खां ने बताया कि इस्लाम धर्म में पांच बुनियादी स्तंभ (अरकान-ए-इस्लाम) हैं, जो जीवन का आधार माने जाते हैं। इनमें शहादा (आस्था की गवाही), नमाज, जकात, रोजा और हज शामिल हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मुसलमानों पर पांच वक्त की नमाज फर्ज है और जकात के तहत हर व्यक्ति अपनी कमाई का 2.5% हिस्सा जरूरतमंदों को दान करता है। रोजा इस्लाम का चौथा स्तंभ है।हाफिज आकिब खां के अनुसार, इस्लाम में रमजान को बहुत पाक महीना माना जाता है। इसे इबादत का महीना भी कहते हैं। इसी माह में कुरान-ए-पाक नाजिल हुआ था और इसी माह में हर मोमिन पर रोजा फर्ज करार किया गया। तब से लेकर आज तक मुस्लिम समुदाय के लोग अल्लाह की रजा के लिए रोजे रखते हैं। रमजान में नाजिल हुआ था कुरआन हाफिज फहद अत्तारी ने कहा कि इसी महीने में पवित्र कुरआन उतारा गया,जो कि दुनिया के तमाम इंसानों के लिए जिंदगी गुजारने का एक बेहतरीन नमूना है। इसमें पाक किताब में बताया गया है कि एक इंसान को अपनी जिंदगी किस तरह से गुजारनी चाहिए, इसलिए इस माह में कुरआन की भी ज्यादा से ज्यादा तिलावत (पढ़ाई) की जाती है। तरावीह की नमाज में भी कुरआन सुना जाता है।वैसे तो साल भर कुरआन पढ़ने का सवाब मिलता है,लेकिन रमजान के महीने में ज्यादा सवाब मिलता है।वही वजह है की रमजान में ज्यादातर मुस्लिम कुरआन को पढ़ते हैं। रोजा रखने के फायदे मौलाना कुतुबुद्दीन मिस्बाही ने बताया कि मुसलमान पूरे रमजान माह रोजे रखते हैं,सुबह से शाम तक लोग भूखे रहकर अल्लाह की इबादत करते हैं, फिर शाम को रोजा इफ्तार किया जाता है, रोजा रखने के कई फायदे भी हैं, रोजा रखकर भूखे और प्यासे रहने से इंसान के जिस्म को भी फायदा पहुंचता है,उसके शरीर के सभी अंग रिफ्रेश हो जाते हैं। जिससे बंदे को एक अलग ही ताजगी महसूस होने लगती है,इफ्तार के लिए मुसलमान खजूर से शुरुआत करते हैं। इस महीने ज्यादा से ज्यादा इबादत करें हाफिज व कारी आबिद हुसैन ने बताया कि रमजान का पाक महीना इस्लाम में सबसे ज्यादा बरकत और इबादत वाला माना जाता है। यह सिर्फ भूख-प्यास सहने का नाम नहीं है,बल्कि यह अपने मन और अपनी इच्छाओं पर काबू पाने का एक जरिया है।इस महीने में बंदों को ज्यादा से ज्यादा अल्लाह की इबादत करना चाहिए। महंगाई का असर है, लेकिन बिक्री भी कम नहीं दुकानदार मोहम्मद फरमान ने बताया कि रमजान की तैयारी अच्छी चल रही है। रमजान के मद्देनजर दिल्ली वाले शिरमाल, बाकरखानिया, लक्ष्क्षेवाले परांठे सहित बहुत सारे आइटम है। महंगाई का तो असर है। लेकिन इसमें हम-सब क्या कर सकते हैं। जरुरतों को पूरा करने के लिए रोजेदारों द्वारा सामानों की खरीदारी की जा रही है। रमजान में बिक्री भी काफी बढ़ी हुई है। मौसम भी दे रहा है रोजेदारों का साथ रोजेदार जावेद अख्तर कुरैशी ने कहा कि रमजान की तैयारियां माशाअल्लाह बहुत अच्छे से चल रही है। मौसम भी रोजेदारों का साथ दे रहा है। रोजा रखकर सभी रोजेदार अल्लाह की इबादत में मशगूल हैं। रोजा के साथ की जा रही है इबादत रोजेदार अरमान अली की मानें तो रमजान का महीना इबादतों वाला महीना है। उन्होंने बताया कि माशाअल्लाह रमजान की तैयारियां अच्छी चल रही है। नमाज व तराबीह पढ़ने के साथ ही साथ कुरान-ए-पाक की तिलावत की जा रही है।


