2050 तक राज्य में 250 दिन तक भीषण गर्मी संभव

2050 तक राज्य में 250 दिन तक भीषण गर्मी संभव

चेन्नई. राज्य में 2050 तक हर साल 200 से 250 दिन तक अत्यधिक गर्मी और असुविधाजनक तापमान रह सकते हैं जिससे शहरी आबादी को लंबे समय तक गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। यह चेतावनी ‘अर्बन हीट आइलैंड असेसमेंट एंड स्ट्रैटेजिक गाइडलाइंस फॉर अर्बन कूलिंग इन तमिलनाडु’ नामक रिपोर्ट में दी गई है, जिसे तमिलनाडु क्लाइमेट समिट 4.0 के दौरान जारी किया गया। रिपोर्ट में पहली बार चेन्नई, कोयंबत्तूर, तिरुनेलवेली और तिरुचि के लिए हीट रिस्क इंडेक्स पेश किया गया है।रिपोर्ट के अनुसार चेन्नई में औसत भूमि सतह तापमान 2000 में 29.4 डिग्री सेल्सियस से बढ़कर 2020 में 33.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। वार्ड स्तर के विश्लेषण में पाया गया कि घनी आबादी और निर्माण कार्य वाले क्षेत्रों में तापमान बढ़ने का सीधा संबंध है। चेन्नई कॉरपोरेशन क्षेत्र में 81 प्रतिशत भूमि पर निर्माण हो चुका है जबकि केवल 2 प्रतिशत क्षेत्र ही वन क्षेत्र है, जिससे प्राकृतिक ठंडक की संभावना सीमित रहती है। शोधकर्ताओं ने चेन्नई के कोडुंगैयूर और पेरुंगुडी, कोयंबत्तूर के वल्लालोर कम्पोस्ट यार्ड और तिरुचि के अरियामंगलम के आसपास लगातार उच्च तापमान दर्ज किया है। इन इलाकों में हरियाली की कमी, घनी और अभेद्य सतहें मुख्य कारण बताई गई हैं। औद्योगिक क्षेत्र भी तापमान के लिहाज से हॉटस्पॉट के रूप में सामने आए हैं जिसमें चेन्नई का अंबत्तूर और कोयंबत्तूर का रत्नापुरी प्रमुख हैं। रिपोर्ट में “ग्रीन इनइक्विटी” यानी हरियाली के असमान वितरण की समस्या को भी उजागर किया गया है। चेन्नई के नाचिक्कुप्पम और अयोधिक्कुप्पम जैसे निम्न-आय तटीय इलाकों में एनडीवीआइ (नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स) मान 0 से 0.1 के बीच पाए गए, जबकि यूएचआइ (अर्बन हीट आइलैंड) इंटेंसिटी बेहद ज्यादा है। इन क्षेत्रों में प्रति वर्ग किलोमीटर एक से भी कम पार्क मौजूद हैं।

हीट रेजिलिएंस सेंटर की स्थापना भी सबसे पहले की गई

पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव सुप्रिया साहू ने कहा हीट वेव को राज्य-विशिष्ट आपदा के रूप में अधिसूचित करने वाला देश का पहला राज्य तमिलनाडु बना है और यहां हीट रेजिलिएंस सेंटर की स्थापना भी सबसे पहले की गई है। आइसीएलइआइ साउथ एशिया के कार्यकारी निदेशक इमानी कुमार ने कहा वार्ड स्तर की रूपरेखा से लक्षित कार्रवाई संभव हो सकेगी। यह अध्ययन जलवायु योजना, बुनियादी ढांचे के विकास और प्रशासनिक व्यवस्था में शीतलन को मुख्यधारा में लाने के लिए व्यावहारिक सिफारिशें देता है।

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