यूरोप की राइन की तरह बिहार में तरक्की लाएगी गंगा:हटाई जा रही गाद, शिप रिपेयर सेंटर का निर्माण शुरू, बन रहे फ्लोटिंग जेटी

यूरोप की राइन की तरह बिहार में तरक्की लाएगी गंगा:हटाई जा रही गाद, शिप रिपेयर सेंटर का निर्माण शुरू, बन रहे फ्लोटिंग जेटी

अब वो दिन दूर नहीं जब यूरोप की राइन नदी की तरह गंगा का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर सामान ढोने में होगा। गंगा नदी यूपी और बिहार के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलेगी। गंगा के रास्ते यूपी, बिहार से सामान हल्दिया पोर्ट भेजे जाएंगे। यहां से उन्हें अमेरिका-यूरोप निर्यात किया जाएगा। मधुबनी का मखाना हो या मुजफ्फरपुर की लीची, पूरी दुनिया में इन्हें पहुंचाना आसान होगा। गंगा नदी के रास्ते बड़े जहाज से भारी मात्रा में माल ढुलाई के लिए कोलकाता से वाराणसी तक वाटर-वे का निर्माण हो रहा है। गाद हटाई जा रही है। पटना में शिप रिपेयर सेंटर का निर्माण शुरू हो गया है। गंगा नदी में वाटर-वे विकसित करने को लेकर क्या काम हो रहा है? शिप रिपेयरिंग सेंटर के लिए कितना काम हुआ है? वाटर मेट्रो चलाने की क्या तैयारी है? पढ़िए रिपोर्ट…। पहले जानिए, क्यों खास है यूरोप का राइन वाटर-वे राइन नदी दुनिया में सबसे ज्यादा सामान ढोने के लिए इस्तेमाल होने वाली नदियों में से एक है। यह आल्प्स पर्वत पर मौजूद टोमा झील से निकलती है। स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, लिकटेंस्टीन, जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड से होकर बहती है। लंबाई करीब 1230 km है। राइन वाटर-वे पश्चिमी यूरोप का सबसे अहम कमर्शियल वॉटर-वे है। इसका इस्तेमाल स्विट्जरलैंड, लिकटेंस्टीन, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड द्वारा सामान ढोने में होता है। इस नदी में साल में करीब 6,900 जहाज चलते हैं। इनसे हर साल 300 मिलियन टन से ज्यादा सामान ढोया जाता है। ये जहाज केमिकल, अनाज और मिनरल जैसे जरूरी सामान ले जाते हैं। अब, जानिए गंगा को राइन की तरह इस्तेमाल करने के लिए क्या हो रहा है बिहार और उत्तर प्रदेश लैंड लॉक्ड स्टेट हैं। मतलब, इनकी सीमा समुद्र से नहीं लगी। दोनों राज्यों से सामान निर्यात और आयात करने के लिए गुजरात, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के पोर्ट का इस्तेमाल होता है। सामान को सड़क या रेल के रास्ते भेजना पड़ता है। इससे खर्च बढ़ जाती है। पानी के रास्ते सामान ढोने का अवसर उपलब्ध है। इसके लिए गंगा नदी का इस्तेमाल करना होगा। यही वजह है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें मिलकर गंगा वाटर-वे तैयार कर रहीं हैं। राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (NW-1) विकसित किया जा रहा है। वर्तमान में कोलकाता से वाराणसी तक क्रूज और सामान ढोने वाले जहाज चलाए जा रहे हैं। गंगा नदी में भागलपुर के बाद वाराणसी तक गाद की समस्या है। इसके चलते बड़े आकार के जहाज चलाने में परेशानी होती है। बड़े जहाज चलाने के लिए गाद हटाकर चैनल तैयार किया जा रहा है। इससे वाराणसी से पटना होते हुए हल्दिया पोर्ट तक जहाजों को आने-जाने में सुविधा मिलेगी। नदी में जहाज चलाने के लिए चाहिए कम से कम 3 मीटर गहराई भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) के अनुसार कोलकाता से भागलपुर तक गंगा नदी की गहराई अच्छी है। यहां तक नदी में माल ढोने वाले बड़े जहाजों की आवाजाही में परेशानी नहीं है। भागलपुर से पटना तक गंगा नदी में गाद अधिक है। इससे गहराई कम हो गई है। नदी में जहाजों को चलने के लिए कम के कम 45 मीटर चौड़ाई में पानी की गहराई 3 मीटर होनी चाहिए। इससे कम गहराई होने पर जहाज के नदी की गाद में फंसने का खतरा रहता है। कार्गो शिप चलाने के लिए जरूरी कम से कम 3 मीटर की गहराई बनाए रखने के लिए गंगा नदी की खुदाई की जा रही है। अभियान के तौर पर यह काम किया जा रहा है। बड़े ड्रेजिंग शिप से दीघा और अन्य घाटों के पास नदी की खुदाई की जा रही है। IWAI के अनुसार, गाद हटाकर चैनल गहरा किया जा रहा है ताकि जहाजों को आने-जाने में परेशानी नहीं हो। क्या है NW-1, जिसके तहत हल्दिया से वाराणसी तक बन रहा जलमार्ग? पश्चिम बंगाल के हल्दिया से उत्तर प्रदेश के वाराणसी के बीच गंगा और हुगली नदी में राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (NW-1) विकसित किया जा रहा है। 1986 में इसे NW-1 घोषित किया गया था। इसके बाद से IWAI इस जलमार्ग को विकसित कर रहा है। हल्दिया से वाराणसी तक इसकी लंबाई 1390 km है। JMVP (जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट) के तहत 5369.18 करोड़ रुपए की लागत से इसे विकसित किया जा रहा है। बिहार के सारण के कालूघाट में इंटर मल्टी मॉडल टर्मिनल (IMMT) बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य बिहार से नेपाल और पश्चिम बंगाल के बीच कार्गो आवागमन सुगम बनाना है। सामान नेपाल से सड़क मार्ग होते हुए कालुघाट और फिर यहां से कार्गो जहाज के माध्यम से हल्दिया पोर्ट पहुंचेंगे। इसी रास्ते से हल्दिया से बड़े-बड़े कंटेनर वापस कालुघाट आएंगे। कालुघाट व्यापारिक हब के रूप में उभरेगा। बिहार में विकसित होंगे 7 नेशनल वाटर-वे ग्रामीण विकास और ट्रांसपोर्ट मंत्री श्रवण कुमार के अनुसार बिहार में गंगा समेत सात नेशनल वाटर-वे डेवलप किया जाएगा। इससे व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। बिहार इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट का बड़ा हब बनेगा। बिहार में गंगा, गंडक, कोसी और सोन समेत सात नेशनल वाटर-वे हैं। इनकी कुल लंबाई 1,187km है। गंगा के साथ ही कोसी और सोन नदियों में ड्रेजिंग की जाएगी ताकि जहाजों को चलने के लिए जरूरी गहराई मिल सके। क्यों फायदे का सौदा है पानी के रास्ते सामान ढोना? सामान ढोने के लिए जलमार्ग सबसे सस्ता साधन है। मंत्री श्रवण कुमार ने पिछले महीने कोच्चि में अंतर्देशीय जलमार्ग विकास परिषद (IWDC) की बैठक में बताया था कि जलमार्ग से माल ढुलाई की औसत लागत 1.3 रुपए प्रति टन-किमी है। इसका मतलब है कि पानी के रास्ते एक टन सामान 1 किलोमीटर दूर ले जाने की लागत 1.3 रुपए है। वहीं, रेल द्वारा एक टन सामान एक किलोमीटर दूर ले जाने पर 2.41 रुपए और सड़क मार्ग से ढोने पर 3.62 रुपए लगते हैं। सामान ढोने के लिए जलमार्ग का इस्तेमाल करने से न सिर्फ ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट कम होगी। बल्कि रोड ट्रैफिक भी 30-40% तक कम होगा। जलमार्ग से बिहार के युवाओं को मिलेगा रोजगार बिहार में जलमार्ग विकसित होने से राज्य के युवाओं को रोजगार मिलेगा। पानी के जहाज चलाने, रखरखाव, मरम्मत जैसे अन्य काम के लिए कुशल युवाओं की जरूरत होगी। स्किल्ड मैनपावर बनाने के लिए पटना में मौजूद नेशनल इनलैंड नेविगेशन इंस्टीट्यूट (NINI) को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के तौर पर विकसित किया जा रहा है। इसकी गाइडेंस में बक्सर, भागलपुर और दरभंगा में इनलैंड वाटरवे नेविगेशन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोले जाएंगे।
अब जानिए, पटना में वाटर मेट्रो और शिप रिपेयर सेंटर के लिए हो रहे कौन से काम पटना में वाटर मेट्रो चलाने की तैयारी पूरे जोरशोर से चल रही है। इसके लिए दीघा घाट, गांधी घाट और कंगन घाट पर फ्लोटिंग जेटी का निर्माण किया जा रहा है। वाटर मेट्रो से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर आकार ले रहे हैं। हालांकि सबसे बड़ी परेशानी गंगा नदी की कम गहराई है। पटना शहर की तरफ किनारे पर कई जगह बहुत अधिक गाद है। इसे हटाकर वाटर चैनल तैयार किया जा रहा है। चैनल में कम से कम 45 मीटर चौड़ाई में नदी की गहराई तीन मीटर से अधिक रखनी है। पटना सिटी के दुजारा में बन रहा वाटर मेट्रो के लिए यार्ड पटना सिटी के दुजारा में 50 करोड़ रुपए की लागत से यार्ड बनाया जा रहा है। यहां वाटर मेट्रो में चलाए जाने वाले क्रूज की मरम्मत होगी। यहां सिविल वर्क शुरू हो गई है। वाटर मेट्रो के लिए बन रहे फ्लोटिंग जेटी पटना में पहले चरण में वाटर मेट्रो की शुरुआत दीघा से कंगन घाट के बीच होगी। दीघा घाट से चलने के बाद वाटर मेट्रो एनआईटी पटना स्थित गांधी घाट, गायघाट और कंगन घाट पर रुकेगी। गांधी घाट और गायघाट में बंदरगाह तैयार है। दीघा की तरह कंगन घाट पर फ्लोटिंग जेटी का निर्माण किया जा रहा है। पर्यटक वाटर मेट्रो से गंगा के घाटों का आनंद लेंगे। इससे पटना में ट्रैफिक का बोझ कम होगा। केरल के कोच्चि के बाद पटना देश का दूसरा शहर होगा, जहां वाटर मेट्रो शुरू होगी। दियारा में बन रहा शिप रिपेयर सेंटर पटना में 300 करोड़ रुपए की लागत से शिप रिपेयरिंग सेंटर बनाया जा रहा है। इसके लिए पटना के दियारा में दीघा-सोनपुर बिज्र के पूरब 5 एकड़ जमीन मुहैया कराई गई थी। यहां माल ढुलाई और पर्यटन में इस्तेमाल होने वाले जहाजों की मरम्मत होगी। इस सेंटर पर एक बार में चार जहाजों की मरम्मत होगी। यहां लिफ्ट लगेगा, जिससे खराब जहाज को नदी के पानी से उठाकर खुले स्थान पर रखा जाएगा। इसके बाद उसकी मरम्मत होगी। जहाज को ठीक करने के बाद लिफ्ट से गंगा नदी में डाला जाएगा। नए सेंटर बन जाने के बाद खराब होने पर जहाज को मरम्मत के लिए कोलकाता या बनारस नहीं ले जाना पड़ेगा। उन्हें पटना में ही ठीक कर दिया जाएगा। इससे पैसे और समय की बचत होगी। शिप रिपेयरिंग सेंटर बनाए जाने का काम शुरू हो गया है। कंटीले तार से जमीन की घेराबंदी कर दी गई है। छह फीट ऊंचे कंक्रीट के पीलर पर कांटे वाले तार लगाए गए हैं। दूसरी तरफ शिपयार्ड के पास गंगा नदी की गहराई तेजी से बढ़ाई जा रही है। गाद हटाने वाली मशीन दिन-रात काम कर रही है। यार्ड के पास जमीन लेवलिंग का काम किया जा रहा है। अब वो दिन दूर नहीं जब यूरोप की राइन नदी की तरह गंगा का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर सामान ढोने में होगा। गंगा नदी यूपी और बिहार के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलेगी। गंगा के रास्ते यूपी, बिहार से सामान हल्दिया पोर्ट भेजे जाएंगे। यहां से उन्हें अमेरिका-यूरोप निर्यात किया जाएगा। मधुबनी का मखाना हो या मुजफ्फरपुर की लीची, पूरी दुनिया में इन्हें पहुंचाना आसान होगा। गंगा नदी के रास्ते बड़े जहाज से भारी मात्रा में माल ढुलाई के लिए कोलकाता से वाराणसी तक वाटर-वे का निर्माण हो रहा है। गाद हटाई जा रही है। पटना में शिप रिपेयर सेंटर का निर्माण शुरू हो गया है। गंगा नदी में वाटर-वे विकसित करने को लेकर क्या काम हो रहा है? शिप रिपेयरिंग सेंटर के लिए कितना काम हुआ है? वाटर मेट्रो चलाने की क्या तैयारी है? पढ़िए रिपोर्ट…। पहले जानिए, क्यों खास है यूरोप का राइन वाटर-वे राइन नदी दुनिया में सबसे ज्यादा सामान ढोने के लिए इस्तेमाल होने वाली नदियों में से एक है। यह आल्प्स पर्वत पर मौजूद टोमा झील से निकलती है। स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, लिकटेंस्टीन, जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड से होकर बहती है। लंबाई करीब 1230 km है। राइन वाटर-वे पश्चिमी यूरोप का सबसे अहम कमर्शियल वॉटर-वे है। इसका इस्तेमाल स्विट्जरलैंड, लिकटेंस्टीन, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड द्वारा सामान ढोने में होता है। इस नदी में साल में करीब 6,900 जहाज चलते हैं। इनसे हर साल 300 मिलियन टन से ज्यादा सामान ढोया जाता है। ये जहाज केमिकल, अनाज और मिनरल जैसे जरूरी सामान ले जाते हैं। अब, जानिए गंगा को राइन की तरह इस्तेमाल करने के लिए क्या हो रहा है बिहार और उत्तर प्रदेश लैंड लॉक्ड स्टेट हैं। मतलब, इनकी सीमा समुद्र से नहीं लगी। दोनों राज्यों से सामान निर्यात और आयात करने के लिए गुजरात, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के पोर्ट का इस्तेमाल होता है। सामान को सड़क या रेल के रास्ते भेजना पड़ता है। इससे खर्च बढ़ जाती है। पानी के रास्ते सामान ढोने का अवसर उपलब्ध है। इसके लिए गंगा नदी का इस्तेमाल करना होगा। यही वजह है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें मिलकर गंगा वाटर-वे तैयार कर रहीं हैं। राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (NW-1) विकसित किया जा रहा है। वर्तमान में कोलकाता से वाराणसी तक क्रूज और सामान ढोने वाले जहाज चलाए जा रहे हैं। गंगा नदी में भागलपुर के बाद वाराणसी तक गाद की समस्या है। इसके चलते बड़े आकार के जहाज चलाने में परेशानी होती है। बड़े जहाज चलाने के लिए गाद हटाकर चैनल तैयार किया जा रहा है। इससे वाराणसी से पटना होते हुए हल्दिया पोर्ट तक जहाजों को आने-जाने में सुविधा मिलेगी। नदी में जहाज चलाने के लिए चाहिए कम से कम 3 मीटर गहराई भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) के अनुसार कोलकाता से भागलपुर तक गंगा नदी की गहराई अच्छी है। यहां तक नदी में माल ढोने वाले बड़े जहाजों की आवाजाही में परेशानी नहीं है। भागलपुर से पटना तक गंगा नदी में गाद अधिक है। इससे गहराई कम हो गई है। नदी में जहाजों को चलने के लिए कम के कम 45 मीटर चौड़ाई में पानी की गहराई 3 मीटर होनी चाहिए। इससे कम गहराई होने पर जहाज के नदी की गाद में फंसने का खतरा रहता है। कार्गो शिप चलाने के लिए जरूरी कम से कम 3 मीटर की गहराई बनाए रखने के लिए गंगा नदी की खुदाई की जा रही है। अभियान के तौर पर यह काम किया जा रहा है। बड़े ड्रेजिंग शिप से दीघा और अन्य घाटों के पास नदी की खुदाई की जा रही है। IWAI के अनुसार, गाद हटाकर चैनल गहरा किया जा रहा है ताकि जहाजों को आने-जाने में परेशानी नहीं हो। क्या है NW-1, जिसके तहत हल्दिया से वाराणसी तक बन रहा जलमार्ग? पश्चिम बंगाल के हल्दिया से उत्तर प्रदेश के वाराणसी के बीच गंगा और हुगली नदी में राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (NW-1) विकसित किया जा रहा है। 1986 में इसे NW-1 घोषित किया गया था। इसके बाद से IWAI इस जलमार्ग को विकसित कर रहा है। हल्दिया से वाराणसी तक इसकी लंबाई 1390 km है। JMVP (जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट) के तहत 5369.18 करोड़ रुपए की लागत से इसे विकसित किया जा रहा है। बिहार के सारण के कालूघाट में इंटर मल्टी मॉडल टर्मिनल (IMMT) बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य बिहार से नेपाल और पश्चिम बंगाल के बीच कार्गो आवागमन सुगम बनाना है। सामान नेपाल से सड़क मार्ग होते हुए कालुघाट और फिर यहां से कार्गो जहाज के माध्यम से हल्दिया पोर्ट पहुंचेंगे। इसी रास्ते से हल्दिया से बड़े-बड़े कंटेनर वापस कालुघाट आएंगे। कालुघाट व्यापारिक हब के रूप में उभरेगा। बिहार में विकसित होंगे 7 नेशनल वाटर-वे ग्रामीण विकास और ट्रांसपोर्ट मंत्री श्रवण कुमार के अनुसार बिहार में गंगा समेत सात नेशनल वाटर-वे डेवलप किया जाएगा। इससे व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। बिहार इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट का बड़ा हब बनेगा। बिहार में गंगा, गंडक, कोसी और सोन समेत सात नेशनल वाटर-वे हैं। इनकी कुल लंबाई 1,187km है। गंगा के साथ ही कोसी और सोन नदियों में ड्रेजिंग की जाएगी ताकि जहाजों को चलने के लिए जरूरी गहराई मिल सके। क्यों फायदे का सौदा है पानी के रास्ते सामान ढोना? सामान ढोने के लिए जलमार्ग सबसे सस्ता साधन है। मंत्री श्रवण कुमार ने पिछले महीने कोच्चि में अंतर्देशीय जलमार्ग विकास परिषद (IWDC) की बैठक में बताया था कि जलमार्ग से माल ढुलाई की औसत लागत 1.3 रुपए प्रति टन-किमी है। इसका मतलब है कि पानी के रास्ते एक टन सामान 1 किलोमीटर दूर ले जाने की लागत 1.3 रुपए है। वहीं, रेल द्वारा एक टन सामान एक किलोमीटर दूर ले जाने पर 2.41 रुपए और सड़क मार्ग से ढोने पर 3.62 रुपए लगते हैं। सामान ढोने के लिए जलमार्ग का इस्तेमाल करने से न सिर्फ ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट कम होगी। बल्कि रोड ट्रैफिक भी 30-40% तक कम होगा। जलमार्ग से बिहार के युवाओं को मिलेगा रोजगार बिहार में जलमार्ग विकसित होने से राज्य के युवाओं को रोजगार मिलेगा। पानी के जहाज चलाने, रखरखाव, मरम्मत जैसे अन्य काम के लिए कुशल युवाओं की जरूरत होगी। स्किल्ड मैनपावर बनाने के लिए पटना में मौजूद नेशनल इनलैंड नेविगेशन इंस्टीट्यूट (NINI) को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के तौर पर विकसित किया जा रहा है। इसकी गाइडेंस में बक्सर, भागलपुर और दरभंगा में इनलैंड वाटरवे नेविगेशन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोले जाएंगे।
अब जानिए, पटना में वाटर मेट्रो और शिप रिपेयर सेंटर के लिए हो रहे कौन से काम पटना में वाटर मेट्रो चलाने की तैयारी पूरे जोरशोर से चल रही है। इसके लिए दीघा घाट, गांधी घाट और कंगन घाट पर फ्लोटिंग जेटी का निर्माण किया जा रहा है। वाटर मेट्रो से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर आकार ले रहे हैं। हालांकि सबसे बड़ी परेशानी गंगा नदी की कम गहराई है। पटना शहर की तरफ किनारे पर कई जगह बहुत अधिक गाद है। इसे हटाकर वाटर चैनल तैयार किया जा रहा है। चैनल में कम से कम 45 मीटर चौड़ाई में नदी की गहराई तीन मीटर से अधिक रखनी है। पटना सिटी के दुजारा में बन रहा वाटर मेट्रो के लिए यार्ड पटना सिटी के दुजारा में 50 करोड़ रुपए की लागत से यार्ड बनाया जा रहा है। यहां वाटर मेट्रो में चलाए जाने वाले क्रूज की मरम्मत होगी। यहां सिविल वर्क शुरू हो गई है। वाटर मेट्रो के लिए बन रहे फ्लोटिंग जेटी पटना में पहले चरण में वाटर मेट्रो की शुरुआत दीघा से कंगन घाट के बीच होगी। दीघा घाट से चलने के बाद वाटर मेट्रो एनआईटी पटना स्थित गांधी घाट, गायघाट और कंगन घाट पर रुकेगी। गांधी घाट और गायघाट में बंदरगाह तैयार है। दीघा की तरह कंगन घाट पर फ्लोटिंग जेटी का निर्माण किया जा रहा है। पर्यटक वाटर मेट्रो से गंगा के घाटों का आनंद लेंगे। इससे पटना में ट्रैफिक का बोझ कम होगा। केरल के कोच्चि के बाद पटना देश का दूसरा शहर होगा, जहां वाटर मेट्रो शुरू होगी। दियारा में बन रहा शिप रिपेयर सेंटर पटना में 300 करोड़ रुपए की लागत से शिप रिपेयरिंग सेंटर बनाया जा रहा है। इसके लिए पटना के दियारा में दीघा-सोनपुर बिज्र के पूरब 5 एकड़ जमीन मुहैया कराई गई थी। यहां माल ढुलाई और पर्यटन में इस्तेमाल होने वाले जहाजों की मरम्मत होगी। इस सेंटर पर एक बार में चार जहाजों की मरम्मत होगी। यहां लिफ्ट लगेगा, जिससे खराब जहाज को नदी के पानी से उठाकर खुले स्थान पर रखा जाएगा। इसके बाद उसकी मरम्मत होगी। जहाज को ठीक करने के बाद लिफ्ट से गंगा नदी में डाला जाएगा। नए सेंटर बन जाने के बाद खराब होने पर जहाज को मरम्मत के लिए कोलकाता या बनारस नहीं ले जाना पड़ेगा। उन्हें पटना में ही ठीक कर दिया जाएगा। इससे पैसे और समय की बचत होगी। शिप रिपेयरिंग सेंटर बनाए जाने का काम शुरू हो गया है। कंटीले तार से जमीन की घेराबंदी कर दी गई है। छह फीट ऊंचे कंक्रीट के पीलर पर कांटे वाले तार लगाए गए हैं। दूसरी तरफ शिपयार्ड के पास गंगा नदी की गहराई तेजी से बढ़ाई जा रही है। गाद हटाने वाली मशीन दिन-रात काम कर रही है। यार्ड के पास जमीन लेवलिंग का काम किया जा रहा है।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *