दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर चर्चा के साथ-साथ चिंता भी बढ़ी है। कई वैश्विक टेक कंपनियों में ऑटोमेशन और एआई आधारित प्रक्रियाओं के चलते छंटनी की खबरें सामने आई हैं। ऐसे में भारत के आईटी सेक्टर और नौकरी बाजार को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या एआई क्रांति यहां भी बड़े पैमाने पर रोजगार पर असर डालेगी।
इसी संबंध में चल रहे एआई समिट के दौरान टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के क्रिथिवसन से जब इस विषय पर सवाल किया गया तो उन्होंने स्थिति को लेकर संतुलित और आश्वस्त करने वाला दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि एआई को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह आईटी क्षेत्र की हर वर्चुअल नौकरी को खत्म करने वाला नहीं है।
मौजूद जानकारी के अनुसार क्रिथिवासन का मानना है कि एआई तकनीक उत्पादकता को 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। इससे कंपनियों को लंबित परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने, नई सेवाओं को विकसित करने और नवाचार की गति बढ़ाने में मदद मिलेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह बदलाव कर्मचारियों की जगह लेने के बजाय उनके काम को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में है।
गौरतलब है कि आईटी उद्योग धीरे-धीरे पारंपरिक समय-आधारित बिलिंग मॉडल से हटकर परिणाम-आधारित मूल्य निर्धारण की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में एआई उपकरण कंपनियों को बेहतर परिणाम देने में मदद कर सकते हैं, जिससे नए कौशल और नई भूमिकाओं की मांग भी पैदा होगी। उदाहरण के तौर पर दवा खोज, स्वचालन समाधान, एआई एप्लिकेशन विकास और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता की आवश्यकता बढ़ सकती है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि एआई के बढ़ते उपयोग से डेटा सेंटर अवसंरचना की मांग में बड़ा इजाफा हो सकता है। अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में भारत को 10 गीगावॉट तक अतिरिक्त डेटा सेंटर क्षमता की आवश्यकता पड़ सकती है। यह विस्तार न केवल तकनीकी निवेश को बढ़ावा देगा, बल्कि निर्माण, संचालन और रखरखाव से जुड़े क्षेत्रों में भी नए रोजगार अवसर पैदा करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि एआई से जुड़े बदलावों का असर अल्पकाल में कौशल संरचना पर जरूर पड़ेगा, लेकिन दीर्घकाल में यह रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर सकता है। बता दें कि भारत का आईटी क्षेत्र वैश्विक आउटसोर्सिंग और डिजिटल सेवाओं का प्रमुख केंद्र है, ऐसे में तकनीकी बदलावों के साथ सामंजस्य बैठाना उद्योग के लिए अनिवार्य है।


