बिहार में शराबबंदी का मुद्दा फिर से गरमा गया है। 10 साल बाद इसकी समीक्षा की मांग भरी सदन में सरकार में साझेदार दल के विधायक ने कर दी है। वहीं, कांग्रेस ने शराब की होम डिलीवरी का दावा किया है। मांझी ने इस कानून को राज्य के लिए आर्थिक जोखिम करार दिया है। क्या नीतीश सरकार 10 साल बाद शराबबंदी को खत्म करेगी या कानून में ढील देगी। इस कानून से राज्य को फायदा है कि नुकसान। नीतीश कुमार क्यों खत्म नहीं करना चाहते। इन सवालों का जवाब जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…। सवाल-1ः बिहार में कब से शराबबंदी कानून लागू है? जवाबः अप्रैल 2016 में नीतीश सरकार ने बिहार में शराबबंदी कर दी। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कम करना, स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था ठीक करना था। यह पॉलिसी बिहार प्रोहिबिशन एंड एक्साइज एक्ट, 2016 पर आधारित है, जो शराब के उत्पादन, बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है। सवाल-2ः शराबबंदी कानून की समीक्षा करने की बातें कब-कब उठी? जवाबः बिहार में शराबबंदी कानून की समीक्षा की डिमांड समय-समय पर होती रही है। इसमें विपक्ष के नेता से लेकर सत्ताधारी दल के नेता तक शामिल हैं। ताजा डिमांड नीतीश सरकार में साझीदार राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) विधायक माधव आनंद ने की है। 17 फरवरी को माधव आनंद ने विधानसभा में कहा, ‘अब समय आ गया है जब इस कानून की व्यापक समीक्षा होनी चाहिए। इसे बेहतर ढंग से लागू करने, जागरूकता बढ़ाने और जहां जरूरी हो, वहां संशोधन किए जाने चाहिए।’ सवाल-3ः बिहार में शराबबंदी के फैसले की क्या नीतीश कुमार समीक्षा करेंगे? जवाबः इसकी संभावना बहुत कम है। माधव आनंद की डिमांड को मंत्री विजय कुमार चौधरी ने खारिज कर दिया। सवाल-4ः नीतीश कुमार क्यों शराबबंदी की समीक्षा नहीं करेंगे? जवाबः यह सीधे तौर पर वोटबैंक से जुड़ा मामला है। नीतीश कुमार ने शराबबंदी को लागू कर महिला वोटरों को अपनी तरफ किया है। महिलाओं में नीतीश कुमार की पैठ इस तरह के कानून से ही है। इसे ऐसे समझिए… प्रशांत किशोर ने शराबबंदी खत्म करने की बात कही, हार गए सवाल-5ः बिहार को शराबबंदी से नुकसान है या फायदा? जवाबः शराबबंदी कानून के फायदा और नुकसान को दो पैमाने पर नापा जाएगा। 1- सामाजिक आधारः महिलाओं पर हिंसा कम हुए शराबबंदी से राज्य को कुछ बड़े सामाजिक फायदे हुए हैं, खासकर स्वास्थ्य और परिवारिक हिंसा के मामले में। शराबबंदी से पहले (2015-16) में NFHS-4 के मुताबिक, बिहार में 29% पुरुष और 1% से कम महिलाएं शराब का सेवन करती थीं। शराबबंदी के बाद (2019-21) में NFHS-5 के मुताबिक, पुरुषों में शराब का सेवन 41.78% कम हुआ (साप्ताहिक/रोज), जबकि महिलाओं में 69.56% कमी आई। हालांकि, अवैध शराब (जैसे ताड़ी या देशी शराब) का सेवन बढ़ा। द लैंसेट जर्नल की रिपोर्ट (International Food Policy Research Institute) के मुताबिक… NFHS-5 सर्वे के मुताबिक… 2. आर्थिक आधारः हर साल 20 हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान शराब बिक्री से बिहार को एक्साइज ड्यूटी (शराब पर टैक्स) मिलता था। यह राज्य की कुल GSDP (सकल घरेलू उत्पाद) का लगभग 1% था और राज्य के अपने टैक्स राजस्व का 15% से ज्यादा हिस्सा था। बिहार में शराबबंदी का मुद्दा फिर से गरमा गया है। 10 साल बाद इसकी समीक्षा की मांग भरी सदन में सरकार में साझेदार दल के विधायक ने कर दी है। वहीं, कांग्रेस ने शराब की होम डिलीवरी का दावा किया है। मांझी ने इस कानून को राज्य के लिए आर्थिक जोखिम करार दिया है। क्या नीतीश सरकार 10 साल बाद शराबबंदी को खत्म करेगी या कानून में ढील देगी। इस कानून से राज्य को फायदा है कि नुकसान। नीतीश कुमार क्यों खत्म नहीं करना चाहते। इन सवालों का जवाब जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…। सवाल-1ः बिहार में कब से शराबबंदी कानून लागू है? जवाबः अप्रैल 2016 में नीतीश सरकार ने बिहार में शराबबंदी कर दी। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कम करना, स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था ठीक करना था। यह पॉलिसी बिहार प्रोहिबिशन एंड एक्साइज एक्ट, 2016 पर आधारित है, जो शराब के उत्पादन, बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है। सवाल-2ः शराबबंदी कानून की समीक्षा करने की बातें कब-कब उठी? जवाबः बिहार में शराबबंदी कानून की समीक्षा की डिमांड समय-समय पर होती रही है। इसमें विपक्ष के नेता से लेकर सत्ताधारी दल के नेता तक शामिल हैं। ताजा डिमांड नीतीश सरकार में साझीदार राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) विधायक माधव आनंद ने की है। 17 फरवरी को माधव आनंद ने विधानसभा में कहा, ‘अब समय आ गया है जब इस कानून की व्यापक समीक्षा होनी चाहिए। इसे बेहतर ढंग से लागू करने, जागरूकता बढ़ाने और जहां जरूरी हो, वहां संशोधन किए जाने चाहिए।’ सवाल-3ः बिहार में शराबबंदी के फैसले की क्या नीतीश कुमार समीक्षा करेंगे? जवाबः इसकी संभावना बहुत कम है। माधव आनंद की डिमांड को मंत्री विजय कुमार चौधरी ने खारिज कर दिया। सवाल-4ः नीतीश कुमार क्यों शराबबंदी की समीक्षा नहीं करेंगे? जवाबः यह सीधे तौर पर वोटबैंक से जुड़ा मामला है। नीतीश कुमार ने शराबबंदी को लागू कर महिला वोटरों को अपनी तरफ किया है। महिलाओं में नीतीश कुमार की पैठ इस तरह के कानून से ही है। इसे ऐसे समझिए… प्रशांत किशोर ने शराबबंदी खत्म करने की बात कही, हार गए सवाल-5ः बिहार को शराबबंदी से नुकसान है या फायदा? जवाबः शराबबंदी कानून के फायदा और नुकसान को दो पैमाने पर नापा जाएगा। 1- सामाजिक आधारः महिलाओं पर हिंसा कम हुए शराबबंदी से राज्य को कुछ बड़े सामाजिक फायदे हुए हैं, खासकर स्वास्थ्य और परिवारिक हिंसा के मामले में। शराबबंदी से पहले (2015-16) में NFHS-4 के मुताबिक, बिहार में 29% पुरुष और 1% से कम महिलाएं शराब का सेवन करती थीं। शराबबंदी के बाद (2019-21) में NFHS-5 के मुताबिक, पुरुषों में शराब का सेवन 41.78% कम हुआ (साप्ताहिक/रोज), जबकि महिलाओं में 69.56% कमी आई। हालांकि, अवैध शराब (जैसे ताड़ी या देशी शराब) का सेवन बढ़ा। द लैंसेट जर्नल की रिपोर्ट (International Food Policy Research Institute) के मुताबिक… NFHS-5 सर्वे के मुताबिक… 2. आर्थिक आधारः हर साल 20 हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान शराब बिक्री से बिहार को एक्साइज ड्यूटी (शराब पर टैक्स) मिलता था। यह राज्य की कुल GSDP (सकल घरेलू उत्पाद) का लगभग 1% था और राज्य के अपने टैक्स राजस्व का 15% से ज्यादा हिस्सा था।


